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Tuesday, 29 September 2026

उज्जैन की शाही मस्जिद: 636 साल पुराना इतिहास, सड़क चौड़ीकरण और सिंहस्थ 2028 का उज्जैन

उज्जैन की शाही मस्जिद: 636 साल पुराना इतिहास, सड़क चौड़ीकरण और सिंहस्थ 2028 का उज्जैन 
- Friday World September 29,2026 
                     प्रतीकात्मक तस्वीर 
मध्य प्रदेश के पवित्र शहर उज्जैन में सिंहस्थ कुंभ 2028 की तैयारियों के दौरान सड़क चौड़ीकरण का काम चल रहा है। इसी प्रक्रिया में छतरी चौक स्थित शाही मस्जिद के एक हिस्से को हटाने की योजना ने 28 सितंबर 2026 को तनाव पैदा कर दिया। पूरी मस्जिद को गिराने का कोई प्रस्ताव नहीं था। प्रस्तावित 15 मीटर चौड़ी सड़क के अलाइनमेंट में आने वाले उसके एक छोटे हिस्से को हटाने की बात थी। रविवार देर रात प्रशासन और मस्जिद कमेटी के बीच सहमति बन गई थी कि प्रभावित हिस्सा खुद हटा लिया जाएगा। लेकिन सोमवार सुबह बड़ी संख्या में लोग जमा हो गए, पुलिस के साथ झड़प हुई और आंसू गैस के गोले छोड़े गए। इलाके में भारी पुलिस बल तैनात किया गया।

यह विवाद सिर्फ वर्तमान की घटना नहीं है। इसके पीछे शाही मस्जिद का लंबा और ऐतिहासिक अतीत जुड़ा है। वक्फ़ बोर्ड के दस्तावेज़ में मस्जिद के निर्माण का साल 1390 दर्ज है। बीबीसी द्वारा देखे गए इस रिकॉर्ड के अनुसार मस्जिद का नाम “शाही मस्जिद” है और इसका निर्माण मुस्लिम समुदाय के सहयोग तथा चंदे से हुआ था। इस हिसाब से मस्जिद लगभग 636 साल पुरानी है।

इंदौर के इतिहासकार और संरक्षण विशेषज्ञ ज़फ़र अंसारी इसे मुग़ल काल से पहले के मालवा सल्तनत काल से जोड़ते हैं। उनके अनुसार उज्जैन और मध्य भारत के पुराने ऐतिहासिक रिकॉर्ड तथा अन्य इमारतों की बनावट शैली को देखने से स्पष्ट होता है कि यह संरचना मुग़ल काल से पहले की है। मस्जिद की वास्तुकला, मीनारें और निर्माण शैली मालवा क्षेत्र की सल्तनतकालीन इमारतों से मिलती-जुलती है। ऐसी बनावट मध्य प्रदेश के मांडू और चंदेरी इलाकों में भी देखने को मिलती है।

1925 का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ और भी रोचक तथ्य सामने लाता है। तत्कालीन ग्वालियर स्टेट के टाउन इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट के चेयरमैन द्वारा जारी पत्र में मस्जिद को “मोचियान की मस्जिद” कहा गया था। उस समय मस्जिद में मीनारें नहीं थीं। पत्र में चौक और सड़क सुधार के लिए मस्जिद से जुड़ी कुछ जमीन (आराजी) लेने की बात कही गई थी, लेकिन “ख़ास मस्जिद” को छोड़कर। साथ ही दरवाजे, अहाते की दीवार सुधारने और मीनारें बनाने का उल्लेख भी था।

1946 का एक नक्शा भी मस्जिद प्रबंधन द्वारा अदालत में प्रस्तुत किया गया। 4 मई 1946 के इस नक्शे पर डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज, उज्जैन, ग्वालियर स्टेट की मुहर और हस्ताक्षर बताए गए हैं। इसमें शाही मस्जिद की स्थिति साफ दिखाई गई है। दस्तावेज़ों में दक्षिणी हिस्से में दो मज़ार, मुख्य नमाज़ की जगह और अन्य हिस्सों का उल्लेख मिलता है।

वक्फ़ रिकॉर्ड में इसे “वक्फ़ मस्जिद पंच मोचियान (शाही मस्जिद)” के नाम से दर्ज किया गया। इसे वक्फ़ एक्ट 1954 के तहत दर्ज किया गया और 13 सितंबर 1985 को मध्य प्रदेश गजट में वक्फ़ संपत्ति घोषित किया गया। बाद में वक्फ़ एक्ट 1995 के तहत भी पंजीकृत रहा। संपत्ति रिकॉर्ड में कुल क्षेत्रफल लगभग 4,600 वर्ग फुट दर्ज है, जिसमें 19 दुकानें और दो मकान भी शामिल हैं। वक्फ़ नियमों के अनुसार ऐसी संपत्ति का ट्रांसफर प्रबंधक के अधिकार में नहीं है और किसी भी कार्रवाई में वक्फ़ बोर्ड को सूचित करना जरूरी है।

मस्जिद पक्ष ने प्रशासन को आपत्ति पत्र में वैकल्पिक रास्ते का सुझाव दिया था। दक्षिण दिशा की एक कमर्शियल बिल्डिंग की ओर सड़क बढ़ाने या पूर्व दिशा के फुटपाथ को सड़क में शामिल करने का प्रस्ताव रखा गया। संविधान के अनुच्छेद 14, 25, 26 और 300ए का हवाला देते हुए कार्रवाई पर सवाल उठाए गए। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 9 सितंबर को पहली याचिका खारिज करते हुए मास्टर प्लान का पालन जरूरी बताया। अदालत ने कहा कि प्रशासन ने प्रक्रिया का पालन किया और आपत्ति दर्ज कराने का मौका दिया गया। नगर निगम का तर्क था कि यह सड़क गोपाल मंदिर से महाकाल मंदिर और क्षिप्रा नदी तक जाती है। सिंहस्थ, शाही सवारी और पेशवाई के दौरान यहां भारी संख्या में श्रद्धालु आते हैं, इसलिए सड़क चौड़ीकरण आवश्यक है। बाद में दो जजों की बेंच में अपील के दौरान 3 फीट तक का हिस्सा गिराने पर सहमति हो गई।

उज्जैन के इतिहास पर काम करने वाले प्रोफेसर शंकरलाल वरे कहते हैं कि शहर में अलग-अलग धर्मों और समुदायों के लोग लंबे समय से साथ रहते आए हैं। एक-दूसरे के धार्मिक आयोजनों और परंपराओं में भागीदारी की मिसालें भी रही हैं। इतिहासकार ज़फ़र अंसारी भी उज्जैन के इस साझा सामाजिक जीवन का उल्लेख करते हैं। शाही मस्जिद गोपाल मंदिर और महाकाल क्षेत्र के पास पुराने शहर के उस हिस्से में स्थित है जहां धार्मिक स्थल, बाजार और रिहायशी इलाका एक-दूसरे के बेहद करीब हैं।

शाही मस्जिद सिर्फ एक धार्मिक इमारत नहीं, बल्कि उज्जैन के बहु-धार्मिक और ऐतिहासिक ताने-बाने का हिस्सा है। सिंहस्थ 2028 की तैयारियां शहर के विकास और धार्मिक स्थलों के संरक्षण के बीच संतुलन की परीक्षा हैं। इतिहास बताता है कि उज्जैन सदियों से सह-अस्तित्व का प्रतीक रहा है। वर्तमान विवाद को सुलझाने में भी यही भावना काम आ सकती है।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World September 29,2026 

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