-Sajjadali Nayani ✍
Friday World September 29,2026
ईरान के नक्शे पर नजर डालें तो उत्तर में विशाल कैस्पियन सागर और दक्षिण में फ़ारस की खाड़ी (पर्शियन गल्फ) दिखाई देते हैं। दोनों के बीच सैकड़ों किलोमीटर पहाड़, रेगिस्तान और ऊंचाई का अंतर है। फिर भी दशकों से एक सवाल बार-बार उठता रहा है – क्या ईरान अपने इलाके में एक नहर बनाकर इन दोनों जल निकायों को जोड़ सकता है? इस विशाल परियोजना को “ईरानरूद” (Iranrud यानी ईरान की नदी) कहा जाता है।
यह विचार नया नहीं है। उन्नीसवीं सदी के अंत में रूसी इंजीनियरों ने इसकी चर्चा शुरू की थी। काजार काल के दौरान भी कुछ ईरानी अभिजात वर्ग में यह चर्चा चली। आधुनिक तकनीकी रूप में इसे 1960 के दशक में ईरानी इंजीनियर हूमन फरज़ाद ने प्रस्तुत किया। तब से पश्चिमी और पूर्वी दो मुख्य मार्गों पर चर्चा होती रही है।
पश्चिमी मार्ग लगभग 950 किलोमीटर लंबा प्रस्तावित है। इसमें सेफिदरूद और करून जैसी नदियों का इस्तेमाल करने की बात कही गई है, लेकिन बीच में अलबोर्ज और ज़ाग्रोस पर्वत श्रृंखलाओं को पार करना होगा, जहां ऊंचाई 1800 मीटर से भी ज्यादा हो सकती है। पूर्वी मार्ग और लंबा है – करीब 1465 से 1600 किलोमीटर। यह दश्त-ए-लूत और दश्त-ए-कवीर जैसे रेगिस्तानी इलाकों से गुजरते हुए ओमान की खाड़ी या फ़ारस की खाड़ी तक पहुंचने की कल्पना करता है।
अगर यह नहर कभी बन जाए तो इसके संभावित फायदे बड़े हैं। मध्य एशिया के देशों (जो समुद्र से दूर हैं) के लिए फ़ारस की खाड़ी और हिंद महासागर तक सीधा जलमार्ग खुल जाएगा। तेल, गैस, पेट्रोकेमिकल और अन्य सामानों का ट्रांजिट आसान हो सकता है। ईरान के लिए समुद्री परिवहन, बंदरगाहों का विकास, लॉजिस्टिक्स और औद्योगिक क्षेत्रों को बढ़ावा मिल सकता है। कुछ समर्थक मानते हैं कि नहर से वाष्पीकरण से क्षेत्र में वर्षा बढ़ सकती है और रेगिस्तानी इलाकों को आंशिक रूप से हरियाली मिल सकती है। भू-राजनीतिक रूप से भी यह ईरान को उत्तर-दक्षिण कॉरिडोर में और मजबूत बना सकता है।
लेकिन चुनौतियां भी उतनी ही विशाल हैं। सबसे बड़ी बाधा पहाड़ी इलाका और ऊंचाई का भारी अंतर है। कैस्पियन सागर का जल स्तर खुले समुद्र से अलग है और लवणता भी अलग है। नहर में पर्याप्त पानी बनाए रखने के लिए भारी मात्रा में पानी की जरूरत पड़ेगी। निर्माण लागत सैकड़ों अरब डॉलर तक पहुंच सकती है। पर्यावरणीय प्रभाव गंभीर हो सकते हैं – खारे पानी का मीठे पानी के स्रोतों में घुसना, स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान, बाढ़ का खतरा और रेगिस्तानी इलाकों में नमक का जमाव। नेविगेशन के लिए गहरी और चौड़ी नहर बनाना, लॉक सिस्टम लगाना और लगातार रखरखाव करना भी इंजीनियरिंग की बड़ी चुनौती है।
हाल के वर्षों में ईरान ने पूर्ण नहर के बजाय रेल और मल्टीमॉडल कॉरिडोर पर ज्यादा ध्यान दिया है। रश्त-कैस्पियन रेलवे जैसी परियोजनाएं कैस्पियन सागर को देश के रेल नेटवर्क से जोड़कर उत्तर-दक्षिण अंतरराष्ट्रीय परिवहन कॉरिडोर (INSTC) को मजबूत कर रही हैं। इससे रेल के जरिए कैस्पियन से फ़ारस की खाड़ी तक सामान पहुंचाना संभव हो रहा है। वर्तमान भू-राजनीतिक परिस्थितियों में कैस्पियन सागर की महत्ता बढ़ी है, लेकिन पूर्ण नौगम्य नहर अभी भी कागजी योजनाओं और बहस का विषय बनी हुई है। कई अध्ययनों में इसे आर्थिक और पर्यावरणीय दृष्टि से व्यावहारिक नहीं माना गया है।
ईरानरूद एक साहसिक सपना है। यह भौगोलिक बाधाओं को पार करने की मानवीय इच्छा का प्रतीक है। चाहे यह कभी पूरी तरह साकार हो या न हो, यह चर्चा ईरान की रणनीतिक सोच, जल प्रबंधन और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी की प्राथमिकताओं को समझने का मौका जरूर देती है। पहाड़, रेगिस्तान और समुद्र के बीच यह परियोजना याद दिलाती है कि प्रकृति की चुनौतियों के सामने इंजीनियरिंग कितनी शक्तिशाली और कितनी सीमित हो सकती है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World September 29,2026
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