- Friday World September 09 2026
दिल्ली, 6 सितंबर की दोपहर
दक्षिण दिल्ली का सत्य निकेतन। दिल्ली यूनिवर्सिटी साउथ कैंपस के हजारों छात्रों का घर। वही इलाका जहाँ 12 हजार रुपये प्रति बेड, 15 रुपये यूनिट बिजली देकर छात्र एक कमरे में 2-3 लोग रहते हैं, सिर्फ एक सपने के लिए।
शनिवार दोपहर करीब 1:34 बजे 'हॉस्टल डेज' नाम की 5 मंजिला PG इमारत ताश के पत्तों की तरह भरभराकर गिर गई। बेसमेंट में रिपेयर चल रही थी, ऊपर 40-50 साल पुरानी जर्जर बिल्डिंग। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक चीखें ऐसी थीं कि पूरा बाजार थम गया।
सरकारी रिपोर्ट बनाम जमीन की हकीकत
सरकारी आंकड़ा कहता है 1 मौत, कुछ घायल। लेकिन स्थानीय लोग, छात्र और NSUI का आरोप है कि मलबे में 30 से 50 छात्र दबे थे। कई छात्रों के परिजनों का कहना है कि उनके बच्चों से दोपहर बाद संपर्क टूट गया और अभी तक कोई सूची जारी नहीं हुई। 15 से अधिक छात्र लापता बताए जा रहे हैं।
सबसे दिल दहलाने वाला सच ये था कि जो बच्चे बेसमेंट और मलबे में फंसे थे, वो अंदर से फोन कर रहे थे। एक वीडियो कॉल तक आई। विधायक अनिल शर्मा ने खुद माना कि "छात्र अंदर से फोन कर रहे हैं।" दिल्ली यूनिवर्सिटी की साउथ कैंपस डायरेक्टर ने भी इसकी पुष्टि की। मतलब बच्चे जिंदा थे, लोकेशन बता रहे थे, मदद मांग रहे थे।
फिर सवाल उठता है, उस सबसे नाजुक वक्त पर सत्य निकेतन के आसपास इंटरनेट ठप कैसे हो गया? छात्रों का आरोप है कि इलाके में जैमर लगे थे, नेटवर्क गायब था। जब बच्चे मदद मांग रहे हों, तब इंटरनेट बंद करने का क्या तुक है?
यहां कोई प्रदर्शन नहीं था, कोई भीड़ नहीं थी, कोई कानून-व्यवस्था का संकट नहीं था जिसे रोकने के लिए इंटरनेट शटडाउन चाहिए। फिर क्यों? क्या इसलिए कि रेस्क्यू की नाकामी के वीडियो, चीखते हुए बच्चों की आवाजें बाहर न जाएं?
जब NDRF, फायर ब्रिगेड और पुलिस के देर से पहुंचने के आरोप लग रहे हों, जब बेसिक JCB तक समय पर अरेंज न हो पा रही हो, तब सरकार का पहला रिफ्लेक्स सच को दबाना कैसे हो सकता है? ये वही पैटर्न है - गलती सुधारो मत, गलती की जानकारी रोक दो।
Blinkit vs सरकार - शर्मनाक तुलना
इस हादसे ने एक और शर्मनाक तस्वीर दिखाई। बताया जा रहा है कि Blinkit की प्राइवेट एम्बुलेंस, सरकारी CATS एम्बुलेंस और अस्पताल की एम्बुलेंस से पहले मौके पर पहुंच गई। अगर एक ग्रॉसरी डिलीवरी कंपनी आपसे तेज रेस्क्यू कर सकती है, तो आप किस बात का टैक्स लेते हैं? किस बात का वोट लेते हैं?
लोग गुस्से में कह रहे हैं, अगर सरकारें नहीं चल रही हैं तो कुछ सेक्टर के CEO को ही उधार ले लो, कम से कम लॉजिस्टिक्स तो संभाल लेंगे।
PR मुख्यमंत्री का वीडियो
और इस बीच कैमरे में एक और दृश्य कैद हुआ। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता बगल वाली झुकी हुई इमारत पर चढ़कर फोन पर बात करते हुए वीडियो बनवा रही हैं, फिर कैमरे की तरफ देखकर साड़ी ठीक कर रही हैं।
मैडम, आप मुख्यमंत्री हैं। आपके पहुंचने के बाद भी अगर आपको किसी को फोन करना पड़ रहा है, तो सिस्टम आपके कंट्रोल में है ही नहीं। मुख्यमंत्री मौके पर निर्देश देने जाती है, PR शूट करने नहीं। जब बच्चे मलबे में फोन करके जान बचा रहे हों, तब आपको फोन पर बात करने का नाटक नहीं, JCB को फोन करके बुलाना था।
सवाल जो मोदी सरकार से पूछे जाने चाहिए
1. सत्य निकेतन में PG माफिया सालों से कैसे चल रहा है? 40 साल पुरानी बिल्डिंग को 5 मंजिल PG में बदलने की इजाजत किसने दी? MCD ने क्या जांच की?
2. NDRF और फायर ब्रिगेड की टाइमिंग क्या थी? PCR कॉल 1:34 पर गई, पहली टीम कितने बजे पहुंची?
3. इंटरनेट क्यों बंद हुआ? क्या लिखित आदेश था? किस अधिकारी ने जैमर लगाने को कहा? अगर नहीं लगाया तो नेटवर्क ठप क्यों था, इसकी जांच कहाँ है?
4. लापता छात्रों की आधिकारिक सूची क्यों नहीं जारी हो रही? DU के कॉलेजों को अपने क्लासरूम में छात्रों को सुलाना पड़ रहा है, सरकार के पास लिस्ट क्यों नहीं?
5. मुआवजा 1 करोड़ की मांग कर रहे छात्र। सरकार कितना देगी और दोषी बिल्डर पर कार्रवाई कब?
आज सत्य निकेतन के छात्र बैग पैक करके घर जा रहे हैं। कह रहे हैं - "अब यहां नहीं रहना।" ये सिर्फ एक इमारत नहीं गिरी, दिल्ली में पढ़ने आए गरीब और मध्यम वर्ग के छात्रों का भरोसा गिरा है।
सरकार इमारतें तो फिर बना देगी, लेकिन अगर हर हादसे के बाद इंटरनेट बंद करके सच को ही मलबे में दबा दिया गया, तो बचेगा क्या?
यह हादसा नहीं, हत्या है - सिस्टम की लापरवाही से की गई हत्या। और इस हत्या पर पर्दा डालना, उससे भी बड़ा अपराध है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World September 09 2026
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