- Friday World September 29,2026
अस्सी के दशक की शुरुआत याद कीजिए। मध्य-पूर्व में एक नया समीकरण बन रहा था। ईरान क्रांति के बाद अपनी पहचान और शक्ति को फिर से गढ़ रहा था। उसके उभरते प्रभाव को देखकर अमेरिका और रूस जैसी महाशक्तियों की भौंहें चढ़ गईं। उन्हें लगता था कि अगर ईरान को नहीं रोका गया तो क्षेत्रीय संतुलन पूरी तरह बदल जाएगा। उसी रणनीति के तहत एक मोहरा तैयार किया गया—सद्दाम हुसैन।
सितंबर 1980 में इराक ने ईरान पर हमला बोल दिया। यह कोई साधारण सीमा विवाद नहीं था। यह एक लंबी, खूनी और विनाशकारी जंग की शुरुआत थी जो आठ साल तक चली। दोनों देशों के संसाधन, अर्थव्यवस्था और युवा पीढ़ी इस युद्ध में झुलस गई। लाखों सैनिक और आम नागरिक मारे गए। शहर तबाह हुए, तेल के कुएँ जलने लगे और पूरा क्षेत्र अशांति के चक्रव्यूह में फँस गया।
उस समय दुनिया के कई हिस्से सद्दाम हुसैन को ‘मर्द-ए-मुजाहिद’ कहकर सराहते थे। लाखों माता-पिता ने अपने बच्चों का नाम उनके नाम पर रखा। लेकिन आज जब हम इतिहास को निष्पक्ष दृष्टि से देखते हैं तो सच्चाई कुछ और नजर आती है। सद्दाम उस बड़े खेल का एक मोहरा भर थे। महाशक्तियों ने क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता को भड़काकर दोनों देशों को कमजोर करने की कोशिश की। जंग खत्म होने के बाद जब सद्दाम की उपयोगिता समाप्त हो गई तो अमेरिका ने 2003 में इराक पर हमला किया और 2006 में सद्दाम को फाँसी दे दी। ठीक उसी अंदाज में जैसे कुछ साल पहले ओसामा बिन लादेन के साथ किया गया था। मोहरे का अंत अक्सर वही होता है—जब वह अपने स्वामी के लिए बोझ बन जाए।
इस पूरी कहानी में एक बात साफ झलकती है। अमेरिका ने वियतनाम से लेकर पनामा, इराक, सीरिया, लीबिया, अफगानिस्तान और कई अन्य देशों में अपनी इच्छा थोपने की कोशिश की। कुछ जगहों पर सफल रहा, कुछ जगहों पर घुटने टेकने पड़े। लेकिन एक देश ऐसा रहा जिसने इस दबाव को सिरे से नकार दिया—ईरान। और एक नेता ऐसा रहा जिसने कभी समझौता नहीं किया—आयतुल्लाह अली खामनेई।
खामनेई के नेतृत्व में ईरान ने भारी प्रतिबंधों के बावजूद अपनी संप्रभुता बनाए रखी। आर्थिक दबाव, सैन्य धमकियाँ और कूटनीतिक अलगाव—सब कुछ झेलकर भी ईरान आज मध्य-पूर्व में एक महत्वपूर्ण शक्ति बना हुआ है। वह न सिर्फ क्षेत्रीय मामलों में सक्रिय है बल्कि वैश्विक राजनीति में भी अपनी आवाज रखता है। सद्दाम का इराक आज भी अस्थिरता और बाहरी प्रभावों से जूझ रहा है, जबकि ईरान अपनी नीतियों पर कायम है। इतिहास का तराजू जब दोनों को तौलता है तो खामनेई की दृढ़ता का पलड़ा भारी पड़ता है।
भारत के नजरिए से देखें तो यह कूटनीतिक इतिहास और भी दिलचस्प हो जाता है। सद्दाम हुसैन के शासनकाल में इराक ने भारत के साथ व्यावहारिक रिश्ते बनाए रखे। संकट के समय सस्ता तेल उपलब्ध कराया और कश्मीर जैसे मुद्दों पर भारत के पक्ष में खड़ा रहा। दूसरी ओर, ईरान ने भारत को सामरिक अवसर दिए। चाबहार पोर्ट और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) के जरिए भारत को मध्य एशिया और रूस तक पहुँचने का वैकल्पिक रास्ता मिला। भारत ने अपनी पारंपरिक बैलेंसिंग कूटनीति का परिचय देते हुए दोनों देशों के साथ दरवाजे खुले रखे। न किसी एक पक्ष के साथ पूरी तरह बँधा, न किसी को पूरी तरह नकारा। यही संतुलन भारत की विदेश नीति की ताकत है।
इस पूरे इतिहास से एक बड़ी सीख निकलती है। जो देश महाशक्तियों के मोहरे बन जाते हैं, उनका भविष्य अक्सर अस्थिर और विनाशकारी होता है। सद्दाम हुसैन की मिसाल इसके सामने है। इसके विपरीत जो राष्ट्र अपनी संप्रभुता, आत्मनिर्भरता और खुद्दारी पर अड़े रहते हैं, वे लंबे समय में मजबूत निकलते हैं। ईरान की कहानी इसी दृढ़ता की कहानी है। प्रतिबंधों के बावजूद अपनी परमाणु नीति, क्षेत्रीय प्रभाव और आंतरिक व्यवस्था पर नियंत्रण रखना आसान नहीं था। लेकिन खामनेई के नेतृत्व में ईरान ने यह साबित किया कि बाहरी दबाव के आगे घुटने टेकना जरूरी नहीं।
आज जब दुनिया फिर से नई शक्ति संरचनाओं की ओर बढ़ रही है, तब यह इतिहास और प्रासंगिक हो जाता है। मध्य-पूर्व में शक्ति संतुलन बदल रहा है। ईरान की भूमिका, उसकी प्रतिरोध की क्षमता और उसके गठबंधन सब चर्चा में हैं। साथ ही भारत जैसे देशों के लिए यह याद दिलाने वाला है कि कूटनीति में संतुलन कितना महत्वपूर्ण है। न किसी एक शक्ति का अंधानुकरण, न किसी विरोध का अंधा विरोध। अपनी राष्ट्रीय हितों को केंद्र में रखकर रिश्ते बनाना ही सही रास्ता है।
इतिहास हमें सिखाता है कि ताकत सिर्फ हथियारों और संसाधनों में नहीं होती। ताकत उस दृढ़ इच्छाशक्ति में होती है जो अपनी जमीन, अपनी नीति और अपनी पहचान की रक्षा करती है। सद्दाम हुसैन का अंत और आयतुल्लाह खामनेई का लंबा नेतृत्व—दोनों ही इस सच्चाई के दो पहलू हैं। एक मोहरे की कहानी है, दूसरी संप्रभुता की।
जो देश अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं और बाहरी दबावों के आगे नहीं झुकते, वे समय के साथ मजबूत होते हैं। ईरान की यह यात्रा उसी सिद्धांत की जीवंत मिसाल है। भविष्य भी उन्हीं का होगा जो अपनी संप्रभुता की कीमत समझते हैं और उसके लिए डटे रहते हैं।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World September 29,2026
#IranSovereignty #KhameneiLegacy #SaddamHusseinHistory #IranIraqWar #MiddleEastPolitics #Geopolitics #SovereignNations #USForeignPolicy #BalancingDiplomacy #HistoricalLessons