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Monday, 28 September 2026

नागरिकता तय करना चुनाव आयोग का काम नहीं, गृह मंत्रालय का है: SIR मुद्दे पर पूर्व जज सुधांशु धूलिया का बड़ा बयान

नागरिकता तय करना चुनाव आयोग का काम नहीं, गृह मंत्रालय का है: SIR मुद्दे पर पूर्व जज सुधांशु धूलिया का बड़ा बयान
-Friday World September 28,2026 
देश में वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर राजनीति तेज हो गई है, इसी बीच सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस सुधांशु धूलिया ने एक बड़ा संवैधानिक बयान देकर चर्चा छेड़ दी है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि, "किसी भी व्यक्ति की नागरिकता तय करना चुनाव आयोग का काम नहीं है।"

शुक्रवार को एक कार्यक्रम में बोलते हुए जस्टिस धूलिया ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई फैसलों में पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि नागरिकता तय करने का अधिकार सिर्फ केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में आता है। चुनाव आयोग का काम वोटर लिस्ट बनाना और उसे शुद्ध रखना है, नागरिकता के सबूत मांगना नहीं।

बिहार SIR का क्या है मामला?

दरअसल इस बयान की जड़ जुलाई 2025 में है। तब बिहार में वोटर लिस्ट के SIR को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। उस बेंच में जस्टिस धूलिया और जस्टिस जॉयमाल्य बागची थे। तब उन्होंने SIR पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था, लेकिन चुनाव आयोग को कहा था कि आधार कार्ड, वोटर आईडी और राशन कार्ड जैसे सामान्य दस्तावेजों पर भी विचार करो, बहुत ज्यादा सख्त शर्तें मत लगाओ।

शुक्रवार को उसी टिप्पणी पर सफाई देते हुए उन्होंने कहा, "उस समय मैं सिर्फ एक-दो दिन के लिए वेकेशन जज था। मेरे सामने पूरी दलीलें नहीं हुई थीं। किसी ने SIR पर रोक लगाने की मांग नहीं की थी, इसलिए मैंने रोक का आदेश नहीं दिया, लेकिन आधार समेत अन्य दस्तावेजों को लेकर अंतरिम आदेश दिया था।"

वोटर के लिए नागरिक होना जरूरी, पर...

जस्टिस धूलिया ने कहा कि हां, वोटर के लिए भारतीय नागरिक होना जरूरी है, यह संविधान का अनुच्छेद 326 कहता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि चुनाव आयोग हर वोटर से नागरिकता का सबूत मांगे। यह काम Citizenship Act, 1955 के तहत गृह मंत्रालय का है।

चुनाव आयोग में आंतरिक आपत्ति पर क्या बोले?

उनसे यह भी पूछा गया था कि रिपोर्ट्स के मुताबिक चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार चुनाव आयोग के फैसलों पर रिकॉर्ड पर आपत्ति दर्ज कराई है।

इस पर जस्टिस धूलिया ने कहा कि अगर चुनाव आयोग के फैसले सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त के स्तर पर ही लिए जा रहे हैं, तो यह एक गंभीर मामला है। हालांकि अभी पूरी स्थिति स्पष्ट नहीं है, इसलिए इस पर अभी से किसी नतीजे पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।

गोवा के 97 वोटरों का मामला

गोवा में 97 वोटरों के नाम फाइनल लिस्ट में शामिल नहीं होने पर मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखा था। इस पर जस्टिस धूलिया ने कहा कि अदालत की अवमानना (Contempt) तभी मानी जाएगी जब यह साबित हो कि आदेश का जानबूझकर उल्लंघन हुआ है। हो सकता है कि चुनाव आयोग ने निर्देश दिए हों, लेकिन निचले स्तर के किसी अधिकारी ने उसका पालन न किया हो।

कुल मिलाकर, जस्टिस धूलिया का बयान एक बार फिर साफ करता है कि भारत में नागरिकता और मताधिकार दो अलग-अलग चीजें हैं और दोनों की सीमा संविधान ने तय की है।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World September 28,2026 


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