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Tuesday, 22 September 2026

अमेरिका की धरती से ईरान की दहाड़ - "हमें हमदर्दी नहीं, हिसाब चाहिए!" - अराघची ने UNGA में दुनिया को दिया खुला पैगाम

अमेरिका की धरती से ईरान की दहाड़ - "हमें हमदर्दी नहीं, हिसाब चाहिए!" - अराघची ने UNGA में दुनिया को दिया खुला पैगाम
-Friday World September 22,2026 
न्यूयॉर्क। जब ईरान के विदेश मंत्री डॉ. अब्बास अराघची का विमान अमेरिका की जमीन पर उतरा, तो दुनिया को उम्मीद थी कि शायद तेहरान कुछ नरम लहजे में बात करेगा। लेकिन हुआ ठीक इसका उल्टा। अराघची ने अमेरिका पहुंचते ही ऐसा आक्रामक रुख अपनाया जिसने संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के गलियारों से लेकर वाइट हाउस तक हलचल मचा दी।

कैमरों के सामने, बिना किसी लाग-लपेट के उन्होंने कह दिया - "ईरान को किसी की हमदर्दी नहीं चाहिए, हमें सीधा हिसाब चाहिए।"

यह सिर्फ एक बयान नहीं था, यह पूरी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर एक करारा तमाचा था।

 "मगरमच्छ के आंसू" बंद करो - अराघची का सबसे तीखा तंज

अराघची ने अपने भाषण में पश्चिमी देशों के दोहरे मापदंड पर सीधा हमला बोला। उन्होंने कहा,

> "अगर ईरान जैसे किसी देश में कहीं एक व्यक्ति को भी कोई परेशानी होती है, तो दुनिया भर में मगरमच्छ के आंसू बहाए जाते हैं और हंगामा खड़ा कर दिया जाता है। लेकिन जब हमारे खिलाफ इतने बड़े जुर्म हुए, तो हमें कोई गंभीर निंदा तक नहीं मिली।"

यह "क्रोकोडाइल टीयर्स" वाला जुमला अराघची का नया हथियार बन गया है। कुछ दिन पहले ही फ्रांस के विदेश मंत्री जीन-नोएल बैरो ने ईरान पर मानवाधिकारों का आरोप लगाया था, तो अराघची ने उन्हें अल्जीरिया में फ्रांस के औपनिवेशिक नरसंहार की याद दिला दी थी, जहाँ 15 लाख अल्जीरियाई मारे गए थे। तब भी उन्होंने कहा था - "बस करिए मगरमच्छ के आंसू, जनाब बैरो।"

अमेरिका में भी उन्होंने उसी तेवर को जारी रखा।

 168 मासूमों का हिसाब कौन देगा?

अपने सबसे भावुक और आक्रामक हिस्से में अराघची ने उस जख्म को दुनिया के सामने रखा जिसे ईरान कभी नहीं भूल पाया। उन्होंने बताया कि वे UNGA का मंच इसलिए इस्तेमाल करेंगे ताकि दुनिया को बता सकें कि युद्ध में ईरान ने 168 मासूम बच्चों को खोया है।

यह आंकड़ा 28 फरवरी 2026 को मिनाब के शजरे तैयबा स्कूल पर हुए हमले से जुड़ा है। ईरान के अनुसार इस हमले में 120 छात्र और 26 शिक्षक समेत कुल 168 लोग मारे गए थे और 110 से ज्यादा घायल हुए थे। ईरानी जांच में दावा किया गया था कि स्कूल पर 3 सटीक टॉमहॉक मिसाइलें दागी गई थीं।

अराघची का सवाल था - जब अमेरिका और इजराइल के ऑपरेशन में हमारे स्कूल के बच्चे मारे जाते हैं, तब दुनिया की मानवता कहाँ चली जाती है? तब कोई निंदा प्रस्ताव क्यों नहीं आता?

 "ईरान निहत्था और बेबस है" - अमेरिकी दावे की उड़ाई धज्जियां

अमेरिका पहुंचने से ठीक पहले अराघची ने पेंटागन की एक रिपोर्ट को आधार बनाकर अमेरिका के ही दावों का मजाक उड़ाया था। अमेरिका में कुछ हलकों में कहा जा रहा था कि ईरान अब निहत्था और बेबस हो चुका है।

अराघची ने अमेरिकी रक्षा विभाग के इंस्पेक्टर जनरल की रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें खुद माना गया था कि ईरानी हमलों ने कुवैत, बहरीन, कतर, UAE, सऊदी अरब, इराक, ओमान और जॉर्डन में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों की सैकड़ों इमारतों को नुकसान पहुंचाया या नष्ट कर दिया। रिपोर्ट के मुताबिक चार देशों में अमेरिकी राजनयिक परिसरों को 18.4 करोड़ डॉलर का नुकसान हुआ, 4 F-15E लड़ाकू विमान, एक A-10, कई हेलीकॉप्टर और 30 तक MQ-9 रीपर ड्रोन नष्ट या क्षतिग्रस्त हुए।

अराघची ने इसे "हिमखंड की सिर्फ चोटी" बताया और कहा कि यह साबित करता है कि ईरान कमजोर नहीं है।

 UN पर से भरोसा खत्म - अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर सवाल

अराघची ने सबसे बड़ा हमला संयुक्त राष्ट्र पर ही कर दिया। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने में नाकाम रहने की वजह से संयुक्त राष्ट्र पर से भरोसा पूरी तरह खत्म हो चुका है। कुछ देश ऐसे बर्ताव कर रहे हैं मानो अंतरराष्ट्रीय नियम उन पर लागू ही नहीं होते।

उनका इशारा साफ तौर पर अमेरिका और उसके सहयोगियों की तरफ था। उनका कहना था कि जब अंतरराष्ट्रीय कानून सिर्फ कमजोर देशों पर लागू हो और ताकतवर देश उसे अपने हिसाब से तोड़ें-मरोड़ें, तो उस संस्था का क्या मतलब रह जाता है?

 वेनेजुएला नहीं है ईरान

अपने एक अन्य बयान में, जो अब अमेरिका में और भी ज्यादा प्रासंगिक हो गया है, अराघची ने कहा था - "यह वेनेजुएला नहीं है, जहाँ आप किसी एक व्यक्ति को पकड़ लें और बाकी लोग पीछे हट जाएं। धमकी उसी को दी जाती है जो डरता हो। हमने तय कर लिया है कि इस रास्ते पर किसी भी पल मौत का सामना करना पड़ सकता है, इसलिए हमें डराया नहीं जा सकता।"

उन्होंने खुलासा किया था कि अमेरिका ने रियायतों के बदले बिजली संयंत्र और बुनियादी ढांचे के निर्माण का लालच भी दिया था, जिसे उन्होंने साफ तौर पर ठुकरा दिया। उनका संदेश था - न रिश्वत चलेगी, न धमकी।

 दुनिया के लिए क्या है संदेश?

अराघची का यह अमेरिका दौरा सिर्फ एक कूटनीतिक यात्रा नहीं है। यह ईरान की नई विदेश नीति का ऐलान है। ईरान अब रक्षात्मक नहीं, आक्रामक कूटनीति पर चल रहा है। वह अब खुद को पीड़ित के तौर पर पेश नहीं कर रहा, बल्कि एक दावेदार के तौर पर पेश कर रहा है जो अंतरराष्ट्रीय मंच पर बराबरी और जवाबदेही मांग रहा है।

अमेरिका की धरती पर खड़े होकर, अमेरिकी मीडिया के कैमरों के सामने यह कहना कि "हमें आपकी हमदर्दी नहीं चाहिए" - यह एक सोची-समझी रणनीति है। इससे ईरान अपने देश के अंदर एक मजबूत छवि बना रहा है और बाहर की दुनिया, खासकर ग्लोबल साउथ को यह संदेश दे रहा है कि पश्चिमी वर्चस्व को चुनौती दी जा सकती है।

अब देखना यह होगा कि वाशिंगटन इस सीधी चुनौती का जवाब कैसे देता है। क्या यह टकराव और बढ़ेगा, या यही आक्रामकता किसी नई बातचीत का रास्ता खोलेगी? एक बात तय है, अराघची ने अमेरिका पहुंचते ही खेल के नियम बदल दिए हैं।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World September 22,2026 

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