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यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Tuesday, 27 October 2026

October 27, 2026

Former Miss Switzerland Accuses Donald Trump of Rape in 1993; White House Strongly Denies Claim*

Former Miss Switzerland Accuses Donald Trump of Rape in 1993; White House Strongly Denies Claim
-Friday World Oct 28,2026 
U.S. President Donald Trump is once again facing serious allegations involving women. Former Miss Switzerland finalist and model Beatrice Keul has claimed that Trump raped her at New York’s Plaza Hotel in November 1993. The allegation appears in a staff report released by Democrats on the House Judiciary Committee, which examines Trump’s alleged connections to Jeffrey Epstein. The White House has completely rejected the claims, calling them false and politically motivated.

At the time of the alleged incident, Keul was about 24 years old and worked as a model while also holding a position in financial services in Switzerland. She had been a finalist in the 1992 Miss Switzerland contest. In November 1993 she travelled to New York and Atlantic City to take part in the Donald J. Trump American Dream Pageant. According to the report, during a press luncheon at the Plaza Hotel (then owned by Trump), he approached her and offered to help arrange a U.S. visa and admission to New York University.

Keul told committee staff that a Trump representative later invited her to a hotel suite. Once inside, she alleged, Trump grabbed her from behind and forcibly raped her. The report states that her dress was torn and that she suffered bleeding and bruising. She described the assault as “brutal.” Afterwards, according to her account, Trump repeated his offers of help with a visa and university admission and told her to remain silent, saying “the show must go on.” Keul completed the pageant and returned to Switzerland.

It is worth noting that in a 2024 interview with the Daily Mail, Keul described the same encounter differently. At that time she spoke of unwanted kissing, groping, and an attempt to lift her dress, but said she managed to stop the advances and that the situation did not escalate further. The 2026 Democratic staff report records a more severe allegation. The report itself footnotes the difference between the two accounts. No formal criminal charges have been filed in connection with Keul’s claim, and the matter has not been tested in court.

A White House spokesperson dismissed the allegations as entirely false, stating that “none of these allegations are true” and describing the report as a political attempt to smear the president ahead of the midterm elections. Trump and his allies have previously rejected similar accusations.

Trump has faced multiple high-profile controversies involving women. In the Stormy Daniels case, a New York court convicted him on 34 felony counts related to hush-money payments made to conceal an alleged affair before the 2016 election. In a civil case brought by writer E. Jean Carroll, a jury found him liable for sexual abuse. The latest report forms part of a broader Democratic examination of Trump’s past links to Epstein and includes accounts from several other women.

These latest claims remain unproven allegations. No independent verification or judicial ruling has confirmed them. Such accusations often intensify during election periods in American politics. Republicans have characterised the Democratic staff report as a partisan attack timed for the midterms, while supporters of the accuser emphasise the seriousness of her statement to congressional investigators.

Beatrice Keul currently lives in Switzerland. After the 1993 events she declined further involvement in Trump-related pageants. The narrative centres on alleged promises of career help, pressure, and a demand for silence, yet no formal legal process has begun.

Only further investigation, if any occurs, can clarify the facts. For now the allegation and the White House denial continue to generate public discussion. While Trump holds the presidency, claims of this nature remain a focus of both political debate and media coverage.


Sajjadali Nayani ✍
Friday World Oct 28,2026 

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October 27, 2026

पूर्व मिस स्विट्जरलैंड का गंभीर आरोप: डोनाल्ड ट्रंप पर 1993 के दुष्कर्म का दावा, व्हाइट हाउस ने खारिज किया

पूर्व मिस स्विट्जरलैंड का गंभीर आरोप: डोनाल्ड ट्रंप पर 1993 के दुष्कर्म का दावा, व्हाइट हाउस ने खारिज किया
-Friday World Oct 28,2026 
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर महिलाओं से जुड़े गंभीर आरोपों के घेरे में आ गए हैं। पूर्व मिस स्विट्जरलैंड फाइनलिस्ट और मॉडल बीट्रिस क्यूल (Beatrice Keul) ने आरोप लगाया है कि नवंबर 1993 में न्यूयॉर्क के प्लाजा होटल में ट्रंप ने उनके साथ जबरन दुष्कर्म किया था। यह दावा अमेरिकी हाउस ज्यूडिशियरी कमिटी के डेमोक्रेटिक स्टाफ द्वारा जारी एक रिपोर्ट में सामने आया है, जो ट्रंप के जेफ्री एपस्टीन से कथित संबंधों की जांच से जुड़ी है। व्हाइट हाउस ने इन सभी आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है और इन्हें राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित बताया है।

बीट्रिस क्यूल उस समय लगभग 24 वर्ष की थीं और मॉडलिंग के साथ-साथ स्विट्जरलैंड में वित्तीय सेवाओं में काम कर रही थीं। वे 1992 में मिस स्विट्जरलैंड प्रतियोगिता में फाइनलिस्ट रह चुकी थीं। नवंबर 1993 में वे डोनाल्ड जे. ट्रंप अमेरिकन ड्रीम पेजेंट में भाग लेने न्यूयॉर्क और अटलांटिक सिटी आई थीं। रिपोर्ट के अनुसार, प्लाजा होटल (जो उस समय ट्रंप के स्वामित्व में था) में आयोजित एक प्रेस लंच के दौरान ट्रंप ने उनसे बात की और अमेरिकी वीजा तथा न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में एडमिशन दिलाने में मदद का वादा किया।

क्यूल के अनुसार, बाद में एक प्रतिनिधि के माध्यम से उन्हें होटल के एक सुइट में बुलाया गया। वहां पहुंचने के बाद ट्रंप ने कथित तौर पर पीछे से पकड़कर उनके साथ जबरन संबंध बनाए। रिपोर्ट में उनके बयान के हवाले से कहा गया है कि इस दौरान उनके कपड़े फट गए थे और शरीर पर चोट के निशान तथा खून आने जैसे प्रभाव पड़े थे। उन्होंने इसे “ब्रूटल” बताया। घटना के बाद ट्रंप ने फिर से वीजा और यूनिवर्सिटी की मदद का वादा दोहराया और चुप रहने को कहा, साथ ही “द शो मस्ट गो ऑन” जैसे शब्द कहे। क्यूल ने पेजेंट पूरा किया और स्विट्जरलैंड लौट गईं।

यह ध्यान देने योग्य है कि 2024 में क्यूल ने Daily Mail को दिए इंटरव्यू में घटना को अलग तरीके से वर्णित किया था। उस समय उन्होंने मुख्य रूप से अवांछित चुंबन, छूने और ड्रेस उठाने की कोशिश का जिक्र किया था, लेकिन कहा था कि आगे की बात नहीं बढ़ी। 2026 की रिपोर्ट में उनका बयान अधिक गंभीर आरोप के रूप में दर्ज है। डेमोक्रेटिक स्टाफ रिपोर्ट में इस अंतर का भी उल्लेख किया गया है। अभी तक इस आरोप पर कोई आधिकारिक आपराधिक केस दर्ज नहीं हुआ है और अदालत में इसकी जांच नहीं हुई है।

व्हाइट हाउस के प्रवक्ता ने इन आरोपों को पूरी तरह झूठा बताया है। एक बयान में कहा गया कि “इनमें से कोई भी आरोप सच नहीं है” और इसे मिडटर्म चुनावों से पहले राष्ट्रपति को बदनाम करने का राजनीतिक प्रयास करार दिया गया। ट्रंप पक्ष ने पहले भी ऐसी कई आरोपों को खारिज किया है।

ट्रंप पहले भी महिलाओं से जुड़े विवादों में रहे हैं। 2016 के राष्ट्रपति चुनाव से पहले पोर्न स्टार स्टॉर्मी डेनियल्स के साथ कथित संबंध छुपाने के लिए 1,30,000 डॉलर के हश मनी भुगतान के मामले में न्यूयॉर्क कोर्ट ने उन्हें 34 मामलों में दोषी ठहराया था। ई. जीन कैरोल के सिविल केस में भी उन्हें यौन शोषण के लिए जिम्मेदार ठहराया जा चुका है। नई रिपोर्ट एपस्टीन से जुड़ी व्यापक जांच का हिस्सा है, जिसमें कई महिलाओं के आरोप शामिल हैं।

ये आरोप अभी केवल दावे के स्तर पर हैं। कोई स्वतंत्र सत्यापन या अदालती फैसला नहीं आया है। अमेरिकी राजनीति में ऐसे आरोप अक्सर चुनावी मौसम में तेज हो जाते हैं। मिडटर्म चुनावों के करीब डेमोक्रेट्स द्वारा जारी यह रिपोर्ट रिपब्लिकन पक्ष द्वारा राजनीतिक हमला बताई जा रही है, जबकि आरोप लगाने वाली महिला के बयान को गंभीरता से लिया जा रहा है।

बीट्रिस क्यूल फिलहाल स्विट्जरलैंड में रहती हैं। उन्होंने 1993 की घटना के बाद ट्रंप से जुड़े अन्य कार्यक्रमों में भाग लेने से इनकार कर दिया था। पूरी कहानी में वादा, दबाव और चुप्पी बनाए रखने की बातें दोहराई गई हैं, लेकिन कानूनी प्रक्रिया अभी शुरू नहीं हुई है।

इस मामले में आगे की जांच, अगर कोई हो, तो ही सच्चाई सामने आएगी। फिलहाल यह आरोप और खंडन दोनों सार्वजनिक चर्चा का विषय बने हुए हैं। राष्ट्रपति पद पर रहते हुए ट्रंप पर लगे ऐसे आरोप राजनीतिक और मीडिया दोनों मोर्चों पर चर्चा का केंद्र बने हुए हैं।

Sajjadali Nayani ✍
Friday World Oct 28,2026 


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October 27, 2026

हुती मिसाइलों का हमला: रियाद के रक्षा मंत्रालय और सऊदी की सबसे बड़ी तेल रिफाइनरी पर दावा, सऊदी ने कहा—मिसाइलें हवा में नष्ट

हुती मिसाइलों का हमला: रियाद के रक्षा मंत्रालय और सऊदी की सबसे बड़ी तेल रिफाइनरी पर दावा, सऊदी ने कहा—मिसाइलें हवा में नष्ट
-Friday World Oct 28,2026 
यमन के ईरान-समर्थित हुती विद्रोहियों ने मंगलवार को सऊदी अरब के सबसे संवेदनशील ठिकानों पर बैलिस्टिक मिसाइल हमलों का दावा किया है। हुती सैन्य प्रवक्ता यह्या सरी ने कहा कि उनके बलों ने राजधानी रियाद स्थित सऊदी रक्षा मंत्रालय को सीधा निशाना बनाया और पूर्वी प्रांत में स्थित देश की सबसे बड़ी तेल रिफाइनरी रास तनूरा पर भी मिसाइल दागी। इन दावों के बाद पूरे क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है। 

हुतियों के अनुसार रक्षा मंत्रालय पर किया गया हमला “सीधा” था। उन्होंने नजरान एयरपोर्ट पर दो सैन्य परिवहन विमानों और खमीस मुशैत स्थित एयरबेस को भी निशाना बनाने का दावा किया। रास तनूरा रिफाइनरी पर हुए हमले से वहां भीषण आग लगने का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यह सऊदी की सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा सुविधाओं में से एक है। रास तनूरा रोजाना लगभग 5 लाख 50 हजार बैरल तेल प्रोसेस करने की क्षमता रखती है और सऊदी तेल निर्यात का प्रमुख केंद्र है।

 सऊदी पक्ष ने अलग तस्वीर पेश की। सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने बताया कि रियाद की ओर दागी गई दो बैलिस्टिक मिसाइलों को हवा में ही नष्ट कर दिया गया। पूर्वी प्रांत की ओर आने वाली कुछ और मिसाइलों को भी रोक लिया गया। रियाद में धमाकों की आवाजें सुनाई दीं और नागरिकों को मोबाइल अलर्ट के जरिए सुरक्षित स्थानों पर जाने की सलाह दी गई। सऊदी सिविल डिफेंस के अनुसार मिसाइलें रोकते समय गिरे मलबे से एक इमारत, निर्माण स्थल और एक वाहन को नुकसान पहुंचा। रास तनूरा इलाके में आग की खबर आई थी। ब्लूमबर्ग और समुद्री सुरक्षा एजेंसी वैन्गार्ड के अनुसार सुबह-सुबह ही आग पर काबू पा लिया गया। हालांकि नुकसान की वास्तविक सीमा और तेल लोडिंग संचालन पर क्या असर पड़ा, यह अभी स्पष्ट नहीं है।

 सऊदी अधिकारियों ने रिफाइनरी पर हुए हमले की तत्काल आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। यह घटना अलग-थलग नहीं है। सितंबर से हुतियों ने सऊदी अरब पर हमले तेज कर दिए हैं। इससे पहले रियाद एयरपोर्ट को भी कुछ समय के लिए बंद करना पड़ा था। मध्य पूर्व में अमेरिका-ईरान संबंधित तनाव के बीच ये हमले और चिंताजनक बन गए हैं।

 सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच मक्का में रक्षा सहयोग के समझौते भी हाल ही में हुए हैं। मिस्र की संसद ने राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी के अनुरोध पर सऊदी को रक्षात्मक सैन्य समर्थन देने की मंजूरी दे दी है। हुती नेता मोहम्मद अली अल-हुती ने इस फैसले को यमन के खिलाफ “युद्ध की घोषणा” के समान बताया और कहा कि उनका समूह किसी भी गठबंधन से नहीं डरता। विशेषज्ञों का मानना है कि हुतियों के ये हमले सिर्फ सऊदी अरब के खिलाफ नहीं, बल्कि क्षेत्रीय ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक तेल बाजार पर भी दबाव बनाने की कोशिश हैं। रास तनूरा जैसी सुविधा पर हमले की खबर से अंतरराष्ट्रीय बाजार में सतर्कता बढ़ जाती है, भले ही वास्तविक नुकसान सीमित हो। सऊदी वायु रक्षा प्रणाली ने अब तक कई मिसाइलों को रोकने का दावा किया है, लेकिन हुतियों की मिसाइल क्षमता और ईरान से कथित समर्थन को लेकर चिंता बनी हुई है। वर्तमान में दोनों पक्ष अपने-अपने दावे पर अड़े हुए हैं। हुती “सफल हमलों” का प्रचार कर रहे हैं, जबकि सऊदी पक्ष ज्यादातर मिसाइलों को रोकने और नुकसान को नियंत्रित रखने की बात कर रहा है। क्षेत्र में पहले से ही कई मोर्चों पर तनाव है। ऐसे में यह घटना मध्य पूर्व की सुरक्षा स्थिति को और जटिल बना सकती है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय स्थिति पर नजर रखे हुए है, क्योंकि किसी भी बड़े संघर्ष का असर न सिर्फ क्षेत्र, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर भी पड़ सकता है।

 Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World Oct 28,2026 

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October 27, 2026

पाकिस्तान में प्रेस फ्रीडम पर संकट गहराया: पत्रकारों ने सेंसरशिप और कानूनी उत्पीड़न के खिलाफ मोर्चा खोला

पाकिस्तान में प्रेस फ्रीडम पर संकट गहराया: पत्रकारों ने सेंसरशिप और कानूनी उत्पीड़न के खिलाफ मोर्चा खोला
-Friday World Oct 28,2026 
इस्लामाबाद में हाल ही में एक महत्वपूर्ण गोलमेज परिषद आयोजित हुई, जिसमें पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकारों, मीडिया यूनियनों, राजनीतिक नेताओं, नागरिक समाज के प्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों ने भाग लिया। इस बैठक का मकसद प्रेस की स्वतंत्रता पर बढ़ते खतरों के खिलाफ एकजुट होकर लड़ना था। सेंसरशिप, कानूनी उत्पीड़न, आर्थिक असुरक्षा और डिजिटल संचार पर लगाए गए सख्त प्रतिबंधों ने स्वतंत्र पत्रकारिता को कमजोर कर दिया है। प्रतिभागियों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए समन्वित प्रयास करने का संकल्प लिया।

बैठक की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार नासिर जैदी ने की, जबकि मुनीजा जहाँगीर ने इसका संचालन किया। इसमें हामिद मीर, मुजीब-उर-रहमान शमी, नजम सेठी, आस्मा शिराजी, अरिफा नूर जैसे जाने-माने पत्रकारों के साथ-साथ बलूचिस्तान, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा, पंजाब, आजाद जम्मू-कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान के पत्रकार यूनियन प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। चर्चा का फोकस यह था कि कैसे स्वतंत्र अभिव्यक्ति के रक्षकों को मजबूत किया जाए और अभिव्यक्ति की आजादी का दायरा बढ़ाया जाए।

पीईसीए कानून और कानूनी उत्पीड़न की शिकायतें

हामिद मीर ने प्रिवेंशन ऑफ इलेक्ट्रॉनिक क्राइम्स एक्ट (पीईसीए) के तहत दर्ज किए गए मामलों का जिक्र करते हुए कहा कि इस कानून का इस्तेमाल पत्रकारों को दबाने के लिए हो रहा है। उन्होंने लगभग 500 मामलों का उल्लेख किया, जिनमें से कई पत्रकारों के खिलाफ हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाए गए प्रतिबंधों का दस्तावेजीकरण करते हुए एक श्वेत-पत्र तैयार किया जाए। इसमें राजनीतिक दलों की भूमिका भी जाँची जानी चाहिए, क्योंकि अक्सर विपक्ष में रहते हुए मीडिया स्वतंत्रता की बात करने वाले दल सत्ता में आने के बाद उसी स्वतंत्रता को सीमित करने वाले कानून पास करते हैं।

मुजीब-उर-रहमान शमी ने कहा कि पाकिस्तान की समस्याएँ सिर्फ कानूनों के होने से नहीं, बल्कि उनके अप्रभावी अमल से पैदा होती हैं। नजम सेठी ने राजनीतिक दलों की आलोचना करते हुए कहा कि वे मौलिक अधिकारों की रक्षा करने में विफल रहे हैं। उन्होंने सेल्फ-सेंसरशिप और व्यावसायिक दबावों को प्रेस को कमजोर बनाने का प्रमुख कारण बताया। मीडिया संगठन अब व्यापक पत्रकारिता उद्देश्यों की बजाय सिर्फ अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं।

महिला पत्रकारों पर ऑनलाइन उत्पीड़न

आस्मा शिराजी ने महिला पत्रकारों के सामने आने वाली ऑनलाइन हैरेसमेंट की समस्या को उजागर किया। उन्होंने कहा कि यह जानबूझकर महिला पत्रकारों को निशाना बनाने का तरीका है, जो उन्हें काम करने से हतोत्साहित करता है। अरिफा नूर ने जोर दिया कि मीडिया कर्मियों के खिलाफ लगाए गए प्रतिबंधों और उल्लंघनों का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण जरूरी है। बिना सही रिकॉर्ड के संघर्ष कमजोर रहता है।

प्रांतीय स्तर पर स्थिति और भी गंभीर है। खैबर पख्तूनख्वा के पत्रकार नासिर हुसैन ने बताया कि 9/11 के बाद से प्रांत में 30 से ज्यादा पत्रकारों की हत्याएँ हुई हैं। 2025 में अकेले 22 पत्रकारों को धमकियाँ मिलीं। बलूचिस्तान, सिंध और अन्य क्षेत्रों के पत्रकारों ने सुरक्षा खतरों, आर्थिक दबावों और देर से मिलने वाले वेतन की समस्याएँ बताईं। कई पत्रकारों ने अपनी नौकरियाँ खो दी हैं, क्योंकि मीडिया उद्योग आर्थिक संकट से जूझ रहा है।

समिति का गठन और आगे की रणनीति

बैठक में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए एक समिति बनाने का फैसला लिया गया। नासिर जैदी की अध्यक्षता में यह समिति संबंधित पक्षों से परामर्श करेगी, प्रतिबंधों का दस्तावेजीकरण करेगी और माँगों का एक चार्टर तैयार करेगी। पूर्व सीनेटर फरहतुल्लाह बाबर ने समिति से अपील की कि वह राजनीतिक दलों से सीधा संपर्क साधे। पत्रकारों की जासूसी रोकने, उनके व्यक्तिगत डेटा के दुरुपयोग को रोकने और बदनामी कानूनों में बदलाव के लिए आंदोलन चलाने की जरूरत है। देर से मिलने वाले वेतन का मुद्दा भी हल किया जाना चाहिए, क्योंकि आर्थिक कमजोरी प्रेस स्वतंत्रता को और कमजोर करती है।

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने भी शरीफ सरकार पर प्रेस स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाने की कड़ी आलोचना की है। पत्रकार यूनियनें लंबे समय से सुरक्षा कानूनों और संरक्षण तंत्र की माँग कर रही हैं, लेकिन प्रगति सीमित रही है। पीईसीए में संशोधन, डिफेमेशन कानून और अन्य कानूनी उपायों ने दबाव बढ़ाया है।

प्रेस स्वतंत्रता क्यों महत्वपूर्ण है?

प्रेस स्वतंत्रता किसी भी लोकतंत्र की रीढ़ होती है। जब पत्रकार स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर सकते, तो जनता को सही जानकारी नहीं मिलती। सेंसरशिप, धमकियाँ और कानूनी उत्पीड़न न सिर्फ व्यक्तिगत पत्रकारों को प्रभावित करते हैं, बल्कि पूरे समाज की सूचना तक पहुँच को सीमित करते हैं। पाकिस्तान में पत्रकारों की हत्याओं के अनसुलझे मामले, ऑनलाइन हमले और आर्थिक दबाव ने माहौल को और कठिन बना दिया है।

यह गोलमेज परिषद एक सकारात्मक कदम है। यह दिखाता है कि पत्रकार समुदाय अब बँटा हुआ नहीं रहना चाहता। एकजुट होकर वे राजनीतिक दलों, सरकार और समाज से संवाद कर सकते हैं। श्वेत-पत्र तैयार करना, उल्लंघनों का रिकॉर्ड रखना और माँगों का चार्टर बनाना लंबे संघर्ष की शुरुआत हो सकती है।

हालाँकि चुनौतियाँ बड़ी हैं। मीडिया घरानों पर व्यावसायिक दबाव, मालिकों की तरफ से खबरों को दबाने की प्रवृत्ति और राजनीतिक हस्तक्षेप जारी है। महिला पत्रकारों की सुरक्षा, प्रांतीय स्तर पर खतरों और वेतन संबंधी मुद्दों पर ठोस कार्रवाई की जरूरत है। समिति को सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे जमीनी स्तर पर पत्रकारों की मदद करनी होगी, कानूनी सहायता उपलब्ध करानी होगी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आवाज उठानी होगी।

पाकिस्तान में प्रेस स्वतंत्रता का संघर्ष नया नहीं है। लेकिन इस बार विभिन्न क्षेत्रों, यूनियनों और नागरिक समाज का एक साथ आना उम्मीद जगाता है। अगर यह एकता बनी रही और राजनीतिक दल भी मौलिक अधिकारों के प्रति गंभीर हुए, तो स्थिति सुधर सकती है। अन्यथा सेंसरशिप और उत्पीड़न का यह सिलसिला स्वतंत्र पत्रकारिता को और कमजोर करता रहेगा।

आज की दुनिया में सूचना की स्वतंत्रता लोकतंत्र की पहली शर्त है। पाकिस्तान के पत्रकार इस लड़ाई में अकेले नहीं हैं। दुनिया भर के मीडिया संगठन और मानवाधिकार समूह उनकी आवाज को मजबूत कर सकते हैं। लेकिन असली बदलाव देश के अंदर से ही आएगा—जब पत्रकार एकजुट रहेंगे, यूनियनें मजबूत होंगी और समाज प्रेस की आजादी को अपना अधिकार समझेगा।

यह बैठक याद दिलाती है कि प्रेस फ्रीडम कोई उपहार नहीं, बल्कि निरंतर संघर्ष से हासिल की जाने वाली चीज है। पाकिस्तान के पत्रकारों ने मोर्चा खोल दिया है। अब देखना यह है कि यह संघर्ष कितना प्रभावी साबित होता है।


Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World Oct 28,2026 


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October 27, 2026

अमेरिका-ब्रिटेन-जापान अचानक क्यों जमा कर रहे हैं इमरजेंसी सामान? 72 घंटे से 90 दिन तक की तैयारी का सच

अमेरिका-ब्रिटेन-जापान अचानक क्यों जमा कर रहे हैं इमरजेंसी सामान? 72 घंटे से 90 दिन तक की तैयारी का सच
-Friday World Oct 28,2026
दुनिया के तीन शक्तिशाली देशों—यूनाइटेड किंगडम, संयुक्त राज्य अमेरिका और जापान—में हाल के दिनों में एक समान और चौंकाने वाली हलचल देखी जा रही है। सरकारें अपने नागरिकों और सैन्य ठिकानों को आपातकालीन स्थितियों के लिए तैयार रहने की सलाह दे रही हैं। घरों में खाने-पीने का सामान, पानी, दवाइयाँ और अन्य जरूरी चीजें जमा करने की अपील की जा रही है। कुछ जगह 72 घंटे की बात हो रही है तो कुछ जगह 90 दिन तक आत्मनिर्भर रहने की योजना बनाई जा रही है। क्या यह किसी बड़े युद्ध की चेतावनी है, साइबर हमले का डर है या फिर जलवायु संकट और प्राकृतिक आपदाओं की तैयारी? आइए विस्तार से समझते हैं कि ये देश आखिर किस खतरे के लिए तैयार हो रहे हैं।

#ब्रिटेन का “Be Ready” अभियान: सिर्फ 72 घंटे की जरूरत

अक्टूबर 2026 के अंतिम सप्ताह में ब्रिटिश सरकार ने “Be Ready” नाम का नया अभियान लॉन्च किया। कैबिनेट ऑफिस के इस अभियान के तहत हर परिवार को सलाह दी गई है कि वे कम से कम तीन दिन (72 घंटे) तक चलने लायक जरूरी सामान घर में रखें। इसमें प्रति व्यक्ति रोजाना तीन लीटर पीने का पानी, बिना पकाए खाए जा सकने वाला डिब्बाबंद खाना, टॉर्च, अतिरिक्त बैटरियाँ, बैटरी या विंड-अप रेडियो, पावर बैंक, कुछ नकद पैसा, प्राथमिक चिकित्सा किट, दवाइयाँ और बच्चों-पालतू जानवरों के लिए सामान शामिल है।

#सरकार का मानना है कि भारी बारिश, बाढ़, जंगल की आग, बिजली या इंटरनेट की कटौती, साइबर हमले और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर हमले की संभावनाएँ बढ़ गई हैं। रक्षा सचिव और सुरक्षा मंत्री ने स्पष्ट कहा कि शत्रु देशों द्वारा बिजली ग्रिड, संचार व्यवस्था या सप्लाई चेन को निशाना बनाए जाने का खतरा वास्तविक है। अभियान का उद्देश्य यह है कि संकट के शुरुआती दिनों में नागरिक केवल सरकारी मदद पर निर्भर न रहें। आपात सेवाएँ सबसे जरूरतमंद लोगों तक पहुँच सकें, इसके लिए आम परिवारों को थोड़ी देर के लिए आत्मनिर्भर बनाना जरूरी है। ब्रिटेन इस सलाह को फ्रांस, आयरलैंड और नीदरलैंड जैसी देशों की परंपरा से जोड़ रहा है, जहाँ 72 घंटे की तैयारी पहले से प्रचलित है।

यह सिर्फ घबराहट फैलाने वाला संदेश नहीं है। अधिकारी बार-बार दोहरा रहे हैं कि यह रोजमर्रा की आपात स्थितियों—तूफान, बिजली कटौती या पानी की समस्या—के लिए व्यावहारिक कदम है। धीरे-धीरे सामान जमा करने की सलाह दी गई है ताकि दुकानों में भगदड़ न मचे।

#अमेरिका की सैन्य योजना: प्रोजेक्ट “FORTRESS” और 90 दिन की आत्मनिर्भरता

#अमेरिका में स्थिति थोड़ी अलग और सैन्य स्तर पर ज्यादा गंभीर है। डिपार्टमेंट ऑफ डिफेंस ने “FORTRESS” (Federal Operations for Resilience, Troop Resources, Energy, Supply, and Survivability) नाम की पहल शुरू की है। इसके तहत अमेरिका के प्रमुख सैन्य ठिकानों को कम से कम 90 दिनों तक बाहरी मदद के बिना पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाने का लक्ष्य रखा गया है। बिजली, पानी, ईंधन और संचार व्यवस्था को नागरिक ग्रिड से अलग रखकर माइक्रोग्रिड, बैटरी स्टोरेज, पोर्टेबल न्यूक्लियर रिएक्टर जैसी तकनीकों पर जोर दिया जा रहा है।

#अमेरिकी अधिकारी मानते हैं कि भविष्य के संघर्ष सिर्फ युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं रहेंगे। दुश्मन बिजली नेटवर्क, संचार सिस्टम और सप्लाई चेन को भी निशाना बना सकते हैं। इसलिए बड़े युद्ध, बड़े पैमाने के साइबर हमले या बुनियादी ढांचे पर हमले की स्थिति में सैन्य ठिकाने 90 दिन तक बिना रुकावट काम करते रहें, यही मकसद है। ऊर्जा सुरक्षा, रणनीतिक भंडार और साइबर सुरक्षा इस योजना के मुख्य स्तंभ हैं। सितंबर 2026 में रक्षा सचिव द्वारा इसकी घोषणा के बाद अक्टूबर में विस्तार से जानकारी सामने आई। यह सिर्फ सैन्य तैयारियाँ हैं, आम नागरिकों के लिए कोई समान सलाह नहीं दी गई है, लेकिन इससे पूरे देश की रणनीतिक सोच का अंदाजा लगता है।

#जापान की सावधानी: 3 दिन से एक सप्ताह तक का भंडार

#जापान ने भी नवंबर 2026 की शुरुआत में नई राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन एजेंसी के गठन के साथ नागरिकों को सलाह देने की तैयारी की है। 2 नवंबर से एजेंसी के कामकाज शुरू होने के साथ परिवारों से कहा जाएगा कि वे कम से कम तीन दिन, आदर्श रूप से एक सप्ताह तक चलने लायक खाना, पीने का पानी और शौचालय/स्वच्छता संबंधी सामान घर में रखें। प्रति व्यक्ति रोज तीन लीटर पानी और गैर-नाशवान खाद्य पदार्थों की सिफारिश की गई है। पोर्टेबल टॉयलेट की भी सलाह है क्योंकि बड़े भूकंप के बाद पानी और सीवर व्यवस्था ठप हो सकती है।

#जापान की मुख्य चिंता युद्ध नहीं बल्कि प्राकृतिक आपदाएँ हैं। देश भूकंप और सुनामी के निरंतर खतरे में रहता है। सरकार जानती है कि बड़े भूकंप के बाद बिजली, पानी और यातायात कई दिनों तक बाधित रह सकते हैं। इसलिए शुरुआती दिनों में नागरिक आत्मनिर्भर रह सकें, इस पर जोर दिया गया है। यह जापान की लंबी परंपरा का विस्तार है, जहाँ आपदा तैयारी पहले से ही राष्ट्रीय संस्कृति का हिस्सा है।

क्या दुनिया किसी बड़ी आपदा की ओर बढ़ रही है?

इन तीनों सलाहों को एक साथ देखने पर आसानी से यह आभास हो सकता है कि कोई बड़ी वैश्विक आपदा सिर पर मंडरा रही है। लेकिन फिलहाल किसी भी देश ने बड़े युद्ध या हमले की आधिकारिक चेतावनी नहीं दी है। वास्तविकता यह है कि जलवायु परिवर्तन के कारण चरम मौसम की घटनाएँ बढ़ रही हैं, साइबर हमलों का खतरा पहले से कहीं ज्यादा गंभीर हो गया है, वैश्विक सप्लाई चेन कमजोर साबित हुई हैं और भू-राजनीतिक तनाव उच्च स्तर पर हैं। हर देश अपनी परिस्थितियों के अनुसार तैयारियाँ बढ़ा रहा है।

#ब्रिटेन रोजमर्रा की व्यवधान और संभावित बुनियादी ढांचा हमलों के लिए नागरिक स्तर पर काम कर रहा है। अमेरिका सैन्य ठिकानों को लंबी अवधि की आत्मनिर्भरता दे रहा है। जापान प्राकृतिक आपदाओं के लिए घरेलू भंडार बढ़ाने पर जोर दे रहा है। संदेश एक ही है—संकट के शुरुआती दिनों में नागरिक और संस्थाएँ खुद को संभालने में सक्षम हों।

यह तैयारी घबराहट की नहीं बल्कि समझदारी की है। घर में कुछ अतिरिक्त पानी, डिब्बाबंद खाना, टॉर्च और दवाइयाँ रखना न तो महंगा है और न ही मुश्किल। ये चीजें रोजमर्रा के छोटे-मोटे संकटों में भी काम आती हैं। सरकारें साफ कह रही हैं कि यह घबराहट फैलाने वाला अभियान नहीं बल्कि लचीलापन बढ़ाने का प्रयास है।

आज की दुनिया में अनिश्चितता बढ़ गई है। मौसम का मिजाज बदल रहा है, तकनीक पर निर्भरता बढ़ी है और अंतरराष्ट्रीय तनाव कम नहीं हो रहे। ऐसे में व्यक्तिगत स्तर पर थोड़ी सी तैयारी पूरे समाज को मजबूत बनाती है। ब्रिटेन, अमेरिका और जापान के ये कदम याद दिलाते हैं कि भविष्य की सुरक्षा आज की छोटी-छोटी तैयारियों पर निर्भर करती है। हर परिवार अगर थोड़ा-थोड़ा सामान जमा रखे तो बड़े संकट में भी शांति बनी रह सकती है।

Sajjadali Nayani ✍
Friday World Oct 28,2026


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Monday, 26 October 2026

October 26, 2026

समुद्र के सीने पर 30 KM लंबा बांध: गुजरात का काल्पसर प्रोजेक्ट, जहां खारा समंदर बनेगा दुनिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील

समुद्र के सीने पर 30 KM लंबा बांध: गुजरात का काल्पसर प्रोजेक्ट, जहां खारा समंदर बनेगा दुनिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील
- Friday World Oct 26,2026 
                   प्रतीकात्मक तस्वीर 

भारत गुजरात में समुद्र के सीने पर दुनिया का सबसे बड़ा अजूबा खड़ा करने की तैयारी में है। इसका नाम है - #काल्पसर प्रोजेक्ट। खंभात की खाड़ी में 30 किलोमीटर लंबा विशाल कंक्रीट का बांध, जो समुद्र के खारे पानी को रोककर मीठे पानी का समंदर बना देगा।

ये सिर्फ एक बांध नहीं, भारत के इंजीनियरिंग इतिहास का सबसे साहसी सपना है। 'काल्पसर' का मतलब ही है - जो कल्पना को साकार कर दे, इच्छाओं को पूरा करने वाली झील।

क्या है ये प्रोजेक्ट?

गुजरात सरकार की योजना के मुताबिक, भावनगर जिले के घोघा से भरूच जिले के हांसोट तक खंभात की खाड़ी पर लगभग 60.13 किलोमीटर का डाइक बनाया जाएगा, जिसमें से करीब 26.7 से 30 किलोमीटर हिस्सा सीधे समंदर के बीच में होगा।

ये बांध नर्मदा, साबरमती, माही, ढाढर सहित 12 नदियों के पानी को समंदर में बर्बाद होने से रोकेगा। इससे समंदर के बीच 7,807 मिलियन क्यूबिक मीटर क्षमता वाली दुनिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की तटीय झील बनेगी, जो लगभग 2,000 वर्ग किलोमीटर में फैली होगी।

तीन बड़े फायदे, जो गुजरात की #किस्मत बदल देंगे:

 1. #सौराष्ट्र का प्यासा हलक तर होगा: इस झील से सौराष्ट्र के 9 जिलों के 42 तालुका की करीब 10 लाख हेक्टेयर (9.99 लाख हेक्टेयर) बंजर जमीन पर सिंचाई होगी। पीने और इंडस्ट्री के लिए भी पानी मिलेगा और करीब 1 लाख हेक्टेयर खारी जमीन सुधर जाएगी।

 2. 8 #घंटे का सफर 3 घंटे में: बांध की छत पर एक 130 मीटर चौड़ा कॉरिडोर बनेगा, जिसमें 16 लेन की सड़क और 4 लेन की रेलवे लाइन होगी। अभी भावनगर से सूरत जाने के लिए 356 किलोमीटर घूमकर जाना पड़ता है, जो इस बांध से घटकर सिर्फ 177 किलोमीटर रह जाएगा, यानी 179 किलोमीटर की सीधी बचत। सफर 8 घंटे से घटकर 3-4 घंटे का हो जाएगा। सोशल मीडिया पर 20 मिनट का दावा वायरल है, लेकिन सरकारी DPR में दूरी घटने की बात है, समय की नहीं।

 3. #समंदर की लहरों से बिजली: खाड़ी की तेज ज्वारीय लहरों से लगभग 2,470 मेगावाट ग्रीन एनर्जी- 1500 MW विंड और 1000 MW सोलर - पैदा होगी। इसी बिजली से झील का पानी सौराष्ट्र तक पंप किया जाएगा।

#हकीकत क्या है? बन रहा है या सिर्फ कागजों पर?

यहां आपको सच्चाई जानना जरूरी है। वायरल वीडियो में इसे बनता हुआ दिखाया जा रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि अभी बांध का निर्माण शुरू नहीं हुआ है।

- #प्रोजेक्ट का आइडिया 1980 में आया था। 1998 में सरकार ने मंजूरी दी थी।
- #जुलाई 2026 में केंद्र सरकार ने राज्यसभा में बताया कि इसका #DPR (डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट) अभी फाइनल स्टेज में है।
- 21 मई 2026 को गुजरात के काल्पसर विभाग ने पर्यावरण मंत्रालय से EIA स्टडी के लिए आवेदन किया है।
- #मुख्य बांध का निर्माण अभी शुरू नहीं हुआ है।
- #मई 2026 में भारत और नीदरलैंड ने तकनीकी सहयोग के लिए करार किया है, क्योंकि नीदरलैंड समंदर में बांध बनाने में दुनिया का सबसे अनुभवी देश है।
- #अगर सब मंजूरियां समय पर मिलीं तो #निर्माण मई 2028 से शुरू होकर 2035-38 तक पूरा होने की उम्मीद है, और लागत लगभग 1.33 लाख करोड़ रुपये आएगी। गुजरात सरकार अब तक सिर्फ स्टडी पर 216 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है। 

#सरकार का ही एक हिस्सा - भादभूत बैराज - जो इसी योजना का छोटा रूप है, 2020 से बनना शुरू हुआ है।

सबसे बड़ी #चुनौतियाँ क्या हैं?

#खंभात की खाड़ी में 10 मीटर ऊंची ज्वारीय लहरें, समंदर के खारे और मीठे पानी को अलग रखना, मछुआरों और समुद्री जीवन पर असर, और सिल्ट यानी गाद का जमाव - ये सब बड़ी तकनीकी चुनौतियां हैं। पर्यावरण मंजूरी मिलना भी आसान नहीं होगा।

लेकिन अगर यह बन गया, तो यह सरदार सरोवर से भी बड़ा गेम-चेंजर होगा। यह भारत का अपना #अफ्सलुइजकडाइक (नीदरलैंड का 32 KM लंबा समंदर का बांध) होगा, जो #गुजरात को पानी, बिजली और रफ्तार - तीनों देगा।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World Oct 26,2026 

#KalpasarProject #Gujarat #GulfOfKhambhat #MegaDam #BhavnagarToSurat #Saurashtra #FreshwaterLake #IndianEngineering #GreenEnergy #IndiaNetherlands
#Friday #World
October 26, 2026

अमृत से जहर तक: पृथ्वी पर का सबसे पवित्र दूध अब पीने लायक भी नहीं रहा, आपकी थाली में रोज परोसा जा रहा है धीमा जहर!

अमृत से जहर तक: पृथ्वी पर का सबसे पवित्र दूध अब पीने लायक भी नहीं रहा, आपकी थाली में रोज परोसा जा रहा है धीमा जहर!
- Friday World Oct 26,2026 
बचपन से हम सुनते आए हैं - दूध मतलब संपूर्ण आहार, दूध मतलब अमृत, दूध मतलब सबकुछ। माँ कहती थी एक गिलास दूध पी लो तो दिन भर की ताकत मिल जाएगी। लेकिन आज उसी दूध की बात करें तो कहना पड़ेगा - भाई, तुम्हें पता भी है इस सफेद तरल में कितना काला सच घुला है?

देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट खुद कह चुकी है कि देश में बिक रहा मिलावटी दूध एक गंभीर राष्ट्रीय मुद्दा है और राज्यों को इस पर तुरंत लगाम लगानी चाहिए। सवाल सिर्फ मिलावट का नहीं, हमारी आने वाली पीढ़ी की जान का है।

मांग 5% बढ़ी, तो ईमानदारी 50% घटी

भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है। साल 2024-25 में हमारा कुल उत्पादन लगभग 24.7 करोड़ टन था, जो दुनिया के कुल दूध का 25% है। इसमें सबसे बड़ा योगदान उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र का है - ये 5 राज्य मिलकर 54% दूध देते हैं।

देश की आबादी के साथ दूध की मांग हर साल 5% बढ़ रही है। दूध से दही, मक्खन, घी, पनीर, मिठाई सब बनता है। बस इसी बढ़ती मांग को कुछ लालची व्यापारियों ने नोट छापने की मशीन बना लिया।

FSSAI की रिपोर्ट ने उड़ाए होश

कुछ समय पहले फूड सेफ्टी स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) ने देश के 33 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से दूध के सैंपल उठाए। नतीजा डराने वाला था - 70% सैंपल फेल हो गए। उनमें पानी ही नहीं, बल्कि डिटर्जेंट, यूरिया, फेट और कास्टिक सोडा जैसा अखाद्य जहर मिला। 50 सैंपल में तो घटिया स्किम्ड मिल्क पाउडर और ग्लूकोज मिलाकर दूध को गाढ़ा दिखाया गया था।

मुंबई का हाल देखिए। रोज की जरूरत 40 लाख लीटर है। भैंस के 300 तबेलों से सिर्फ 4 लाख लीटर मिलता है। बाकी 36 लाख लीटर सरकारी और प्राइवेट डेयरियों पर निर्भर है। पिछले साल जांच में पता चला कि 30 लाख लीटर पैकेट वाले दूध में से 8 लाख लीटर में मिलावट थी।

तरीका क्या था? नामी डेयरी की आधी या एक लीटर वाली थैली को ऊपर से हल्का फाड़ो, एक तिहाई शुद्ध दूध निकाल लो, उसकी जगह 90% गंदा पानी, 10% दूध और सफेदी के लिए साबुन बनाने वाला कास्टिक सोडा और डिटर्जेंट डाल दो। फिर थैली को फिर से इस तरह पैक कर दो कि ग्राहक को शक भी न हो। कहीं-कहीं तो गटर और नाले का पानी और बिना खुशबू वाला शैम्पू भी मिलाया गया।

सिर्फ मुंबई नहीं, पूरा भारत इसकी चपेट में

यह धंधा सिर्फ मुंबई तक सीमित नहीं। गुजरात, दिल्ली, बुलंदशहर, गाजियाबाद, राजस्थान और उत्तर भारत के ज्यादातर इलाकों में लाखों लीटर सिंथेटिक दूध रोज बेचा जा रहा है। यह हमारी बदनसीबी है कि सबसे ज्यादा मिलावट उसी चीज में हो रही है जो सबसे ज्यादा जरूरी है।

ये माफिया क्या करते हैं? बाजार से खाली दूध की थैलियाँ खरीदते हैं, उन्हें एक कोने से काटकर एक तिहाई असली दूध निकाल लेते हैं और नकली दूध भर देते हैं। कई बार तो एक बार इस्तेमाल हुई थैलियों को धोए बिना ही गंदा दूध भरकर बेच दिया जाता है।

गाय-भैंस पर भी जुल्म, इंसान पर भी

यह काला धंधा जानवरों से शुरू होता है। पुणे के एक पशु कल्याण संगठन ने दो साल तक पूरे देश में स्टडी की। पता चला कि ज्यादा दूध के लिए गाय, भैंस, बकरी को ऑक्सी-टॉक्सिन के इंजेक्शन लगाए जाते हैं। इससे हार्मोन तेजी से एक्टिव होते हैं और थन में जल्दी दूध उतर आता है, लेकिन साथ में खून और हड्डी के तत्व भी दूध में आ जाते हैं।

बछड़े को जबरदस्ती माँ से अलग कर दिया जाता है, दूध न देने वाले जानवरों को लाठी और लोहे की जंजीर से पीटा जाता है और सूख जाने पर सीधे कत्लखाने भेज दिया जाता है।

शरीर पर क्या असर होता है?

कास्टिक सोडा और यूरिया से पेट और आंतों में घाव हो जाते हैं, चमड़ी के रोग, हाथ-पैरों में सूजन, दिल, फेफड़े और आंखों की रोशनी पर असर। सबसे ज्यादा नुकसान बच्चों को होता है। बाल रोग विशेषज्ञ कहते हैं कि केमिकल वाला दूध पीने से बच्चों के आंत, लिवर, किडनी खराब होते हैं, दिमाग का विकास रुक जाता है और कोमल हृदय को गंभीर नुकसान पहुंचता है।

सबसे बड़ी समस्या - असली और नकली दूध में फर्क करना बहुत मुश्किल है। फैट नापने वाला लैक्टोमीटर भी कास्टिक सोडा, यूरिया और डिटर्जेंट वाले सिंथेटिक दूध को नहीं पकड़ पाता। NDRI करनाल के वैज्ञानिकों ने एक विशेष उपकरण बनाने का दावा किया है, लेकिन उसे अभी सरकारी मान्यता और देशव्यापी इस्तेमाल की जरूरत है।

एक तरफ सरकार श्वेत क्रांति से दूध की नदियाँ बहाने की कोशिश कर रही है, तो दूसरी तरफ कुछ स्वार्थी तत्व सफेद जहर की नदियाँ बहा रहे हैं। सौराष्ट्र में तो हालात ऐसे हैं कि दूध में मिलावट का धंधा शराब के धंधे से भी ज्यादा खतरनाक बन गया है।

सवाल ये है कि क्या हम आज भी उसी भरोसे से एक गिलास दूध अपने बच्चे को पिला सकते हैं?

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World Oct 26,2026 

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