दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत की राजधानी दिल्ली में साफ हवा में सांस लेना पिछले एक दशक से लगातार मुश्किल होता जा रहा है। दिसंबर 2025 में दिल्ली का AQI बार-बार 300-500 के बीच पहुंच रहा है, जो 'बहुत खराब' से 'खतरनाक' श्रेणी में आता है। 19 दिसंबर को कई जगहों पर AQI 271 से 562 तक दर्ज किया गया, जो स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है।
पिछले दशक में दिल्ली का प्रदूषण चरम पर है। सर्दियों में स्मॉग की मोटी चादर छा जाती है, जिससे दृश्यता कम हो जाती है और सांस की बीमारियां बढ़ जाती हैं। कोविड लॉकडाउन को छोड़कर, हर साल सर्दियां जहरीली हवा का मौसम बन रही हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, मौसम की स्थितियां (कम हवा, तापमान उलटाव) प्रदूषकों को फंसाती हैं, लेकिन मुख्य समस्या स्थानीय स्रोत हैं।
प्रदूषण के मुख्य स्रोत क्या हैं?
वाहन और परिवहन: दिल्ली में PM2.5 का 18-30% हिस्सा वाहनों से आता है। लाखों वाहन, ट्रक और ट्रैफिक जाम रोजाना जहरीला धुआं उगलते हैं।
बायोमास जलाना और चूल्हा: गरीब बस्तियों में लकड़ी, गोबर के उपले और कचरा जलाना बड़ा स्रोत है। सर्दियों में हीटिंग के लिए भी बायोमास जलता है, जो 23% तक प्रदूषण贡献 करता है। अगर तीन दिन चूल्हे-गैस बंद कर दें, तो हवा साफ हो सकती है – माउंट एवरेस्ट या हिमालय साफ दिखने लगेगा, जैसा दुर्लभ मौकों पर होता है।
पराली जलाना: पंजाब-हरियाणा की पराली दिल्ली में योगदान देती है, लेकिन इस साल सिर्फ 2-14%। फिर भी, यह मौसमी स्पाइक का कारण बनती है।
अन्य: निर्माण धूल, कचरा जलाना, उद्योग और नालों से मीथेन गैस भी बड़ा योगदान देते हैं।
सरकारें GRAP लागू करती हैं – वाहन प्रतिबंध, निर्माण रोक – लेकिन स्थानीय स्रोतों पर ठोस कार्रवाई कम है। मीडिया मैनेजमेंट और अस्थायी उपायों से समस्या टलती है, लेकिन जड़ नहीं कटती। अगर चूल्हों से धुआं और नालों की गैस रोकी जाए, तो स्थायी सुधार संभव है।
दिल्लीवासियों के लिए यह स्वास्थ्य संकट है। नई पीढ़ी को साफ हवा का हक चाहिए। समय आ गया है कि अर्थव्यवस्था की रफ्तार के साथ पर्यावरण को भी प्राथमिकता दी जाए।
सज्जाद अली नायाणी✍🏼