1954 से 1996 तक चले ग्वाटेमाला गृहयुद्ध को दुनिया का सबसे क्रूर और सबसे लंबा नरसंहार कहा जाता है। इस खूनी खेल में 2 लाख से ज्यादा लोग मारे गए – जिनमें 83% माया आदिवासी थे। संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक रिपोर्ट कहती है कि इन हत्याओं के लिए 93% जिम्मेदारी ग्वाटेमाला की अमेरिका-समर्थित सेना की थी।
सब कुछ 1954 के उस तख्तापलट से शुरू हुआ जब ग्वाटेमाला के लोकतांत्रिक राष्ट्रपति जेकॉबो अर्बेन्ज़ ने अमेरिकी कंपनी यूनाइटेड फ्रूट के विशाल खेत गरीब किसानों में बाँटने की कोशिश की, तो सीआईए ने तख्तापलट करवाया। इसके बाद सत्ता में आई सैन्य तानाशाही को अमेरिका ने हथियार, ट्रेनिंग और पैसा देना शुरू कर दिया।
अमेरिका ने कैसे की नरसंहार में मदद? - हथियार और ट्रेनिंग: 1960-1990 के बीच ग्वाटेमाला के हजारों सैनिकों को अमेरिका के “स्कूल ऑफ द अमेरिकाज” में क्रूर दमन की ट्रेनिंग दी गई। - सीआईए का साथ: अमेरिकी खुफिया एजेंसी ने विद्रोहियों के ठिकानों की जानकारी दी और हत्यारी रणनीति बनाने में मदद की। - राजनीतिक कवच: वॉशिंगटन ने दुनिया के सामने इन हत्यारों को “कम्युनिज्म-विरोधी हीरो” बताकर बचाया।
मायाओं पर कहर: गाँव के गाँव जलाए गए 1981-83 का दौर सबसे खूनी था। सेना ने माया बस्तियों को “विद्रोहियों का अड्डा” बताकर पूरा-पूरा जला दिया। - 629 से ज्यादा सामूहिक हत्याएँ - सैकड़ों गाँव मिट्टी में मिला दिए गए - औरतों-बच्चों को जिंदा जलाया गया, कुओं में फेंका गया - 40,000 से ज्यादा लोग जबरन “गायब” कर दिए गए
आज भी खून की बू आती है गृहयुद्ध खत्म हुए 28 साल बीत गए, लेकिन ग्वाटेमाला आज भी लैटिन अमेरिका के सबसे गरीब और असुरक्षित देशों में है। लाखों माया परिवार बेघर हैं। नरसंहार के जख्म आज भी ताजा हैं। अमेरिका ने कभी माफी नहीं मांगी।
बिल क्लिंटन ने 1999 में सिर्फ इतना कहा था – “हमारा समर्थन गलत था।” लेकिन न मुआवजा दिया, न दोषियों को सजा। यह सिर्फ ग्वाटेमाला की नहीं, पूरी दुनिया के मूल निवासियों की कहानी है – जब भी उन्होंने अपनी जमीन और हक की बात की, पश्चिमी ताकतों ने उन्हें खून से कुचल दिया। ग्वाटेमाला उस काले इतिहास का जीता-जागता सबूत है, जिसे आज भी अमेरिकी पाठ्यपुस्तकों में छिपाया जाता है।
सज्जाद अली नायाणी ✍️