फ्राइडे वर्ल्ड December 29/2025
"यह न्यूजीलैंड है, भारत नहीं" – ऑकलैंड की सड़कों पर नस्लवाद की आवाज़, और भारत के घरेलू हालात की गूंज
दिसंबर 2025 में ऑकलैंड (न्यूजीलैंड) की सड़कों पर एक घटना ने भारतीय मूल के लोगों, खासकर सिख और हिंदू समुदाय को झकझोर दिया।
दक्षिण ऑकलैंड के मणुरेवा इलाके में एक शांतिपूर्ण भारतीय लोगो ने धार्मिक जुलूस (नगर कीर्तन) को एक फार-राइट ईसाई ग्रुप "ट्रू पैट्रियट्स ऑफ न्यूजीलैंड" (डेस्टिनी चर्च से जुड़े) ने रोक दिया। प्रदर्शनकारियों ने हाका (माओरी युद्ध नृत्य) किया, बैनर लहराए जिन पर लिखा था -"This is New Zealand, not India"-, और "एकमात्र सच्चा ईश्वर" तथा "यीशु" के नारे लगाए।
पुलिस को बीच में आना पड़ा ताकि कोई हिंसा न हो। यह घटना अकेली नहीं थी। इसी साल जून में भी इसी ग्रुप के नेतृत्व में एक रैली हुई थी, जिसमें हिंदू, प्रतीकों वाले झंडों को फाड़ा और कुचला गया था। इन घटनाओं ने न्यूजीलैंड में बढ़ते एंटी-इमिग्रेंट और एंटी-नॉन-क्रिश्चियन सेंटिमेंट को उजागर किया है।
यह निंदनीय है। किसी भी धार्मिक प्रक्रिया में बाधा डालना, अपमानजनक नारे लगाना और अप्रवासियों को "अनचाहे" बताना शुद्ध नस्लवाद है। भारतीय डायस्पोरा, जो न्यूजीलैंड की अर्थव्यवस्था और समाज में योगदान देता है, इस तरह के व्यवहार का हकदार नहीं है।
लेकिन सवाल यह है – क्या यह सिर्फ़ बाहरी नफरत है, या घर के भीतर की आग की चिंगारी बाहर पहुंच रही है?
भारत की वैश्विक छवि कभी "सहिष्णुता, अहिंसा और वसुधैव कुटुम्बकम" की प्रतीक थी। गांधी, बुद्ध और विविधता का देश। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय मीडिया में लगातार खबरें आई हैं – हेट स्पीच, लिंचिंग, अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा, घर तोड़ने की कार्रवाई, और धार्मिक आधार पर भेदभाव। ये खबरें सिर्फ़ भारत में नहीं रुकतीं; वे दुनिया भर में फैलती हैं।
जब विदेशी मीडिया में भारत को "असहिष्णु" और "कट्टर" के रूप में चित्रित किया जाता है, तो वहां रहने वाले भारतीय – चाहे हिंदू हों, सिख हों या मुस्लिम – एक ही ब्रश से रंगे जाते हैं। न्यूजीलैंड जैसे देशों में, जहां एंटी-इमिग्रेशन भावना पहले से मौजूद है, ये खबरें ईंधन का काम करती हैं। प्रदर्शनकारी "यह भारत नहीं है" कहकर सिर्फ़ अप्रवासियों को नहीं, बल्कि भारत की मौजूदा छवि को टारगेट कर रहे हैं।
क्रिया और प्रतिक्रिया का चक्र जब देश के अंदर बहुसंख्यक समाज चुप रहता है – चाहे डर से, सहमति से या उदासीनता से – तो वह अन्याय का हिस्सेदार बन जाता है। शांतिप्रिय हिंदू, जो रोज़मर्रा की जिंदगी में किसी से नफरत नहीं करता, अगर "दंगाई तत्वों" के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाता, तो दुनिया पूरी कौम को उन्हीं तत्वों के चश्मे से देखेगी। नतीजा?
- कनाडा, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और अब न्यूजीलैंड में भारतीयों पर हमले बढ़े।
- हिंदू मंदिरों पर ग्रैफिटी, सिखों पर हमले, और सामान्य भारतीयों को "अनवॉन्टेड" बताना।
- डायस्पोरा असुरक्षित महसूस करने लगा है – और यह सिर्फ़ नस्लवादियों की वजह से नहीं, बल्कि भारत की खराब हो रही इमेज की वजह से भी।
प्रवासी भारतीयों के बीच जागरूकता की स्थिति जिन देशों में भारतीयों की बड़ी संख्या है (अमेरिका, कनाडा, यूके, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड), वहां के समुदाय इस खतरे को काफी हद तक समझ रहे हैं। कई संगठन (जैसे हिंदू काउंसिल ऑफ ऑस्ट्रेलिया, सिख कोएलिशन आदि) सक्रिय रूप से नस्लवाद के खिलाफ आवाज़ उठा रहे हैं। सोशल मीडिया पर चर्चाएं तेज़ हैं – लोग कह रहे हैं कि घरेलू कट्टरता विदेशों में बैकफायर कर रही है।
लेकिन समस्या यह है कि नफरती प्रचार का प्रभाव अभी भी मजबूत है। कई लोग इसे "सिर्फ़ पश्चिमी नस्लवाद" मानकर घर के हालात को नजरअंदाज कर देते हैं। कुछ तो इसे "प्रोपगैंडा" कहकर खारिज कर देते हैं।
निष्कर्ष ऑकलैंड की घटना सिर्फ़ एक घटना नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। जब तक भारत के अंदर भाईचारा, संविधान का राज और अल्पसंख्यक सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक विदेशों में भारतीयों की सुरक्षा और सम्मान पर सवाल उठते रहेंगे। "विश्वगुरु" का सपना तब तक अधूरा रहेगा, जब तक हम खुद को "सहिष्णु भारत" के रूप में दोबारा स्थापित नहीं करते।
यह अब राजनीति का नहीं, बल्कि भारतीय अस्मिता, आत्मसम्मान और वैश्विक भविष्य का सवाल है। समय है कि खामोश बहुमत बोल उठे – घर में और बाहर दोनों जगह।
सज्जाद अली नायाणी✍🏼
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