Friday World-January 3,2026
3 जनवरी 2026 का दिन विश्व इतिहास में एक काला अध्याय के रूप में दर्ज हो गया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर घोषणा की कि अमेरिकी विशेष बलों (डेल्टा फोर्स) ने वेनेज़ुएला पर बड़े पैमाने पर सैन्य हमला किया और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो तथा उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को "कैद" कर अमेरिकी धरती पर ले आए। यह कोई सामान्य गिरफ्तारी नहीं थी
– यह एक संप्रभु राष्ट्र के चुने हुए नेता का खुला अपहरण था। वेनेज़ुएला की उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज ने इसे "अंतरराष्ट्रीय अपहरण" करार देते हुए तत्काल "प्रूफ ऑफ लाइफ" की मांग की, जबकि विश्व समुदाय स्तब्ध रह गया।
यह घटना अमेरिकी विदेश नीति की उस पुरानी परंपरा का नवीनतम उदाहरण है, जहां "राष्ट्रीय सुरक्षा" या "नारको-टेररिज्म" के नाम पर अन्य देशों के नेताओं को हटाया जाता है। अमेरिका ने मादुरो पर "कार्टेल डे लॉस सोलेस" का प्रमुख होने का आरोप लगाया, जिसे उन्होंने 2025 में विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित किया था। लेकिन कई विश्लेषकों का मानना है कि असली मकसद वेनेज़ुएला के विशाल तेल भंडार (दुनिया के सबसे बड़े सिद्ध भंडार, लगभग 300 अरब बैरल) पर नियंत्रण पाना है। ट्रंप प्रशासन ने पहले से ही वेनेज़ुएला के तेल टैंकरों पर नाकाबंदी लगाई, संदिग्ध ड्रग जहाजों पर दर्जनों हमले किए (जिसमें 100 से अधिक मौतें हुईं), और मादुरो पर 50 मिलियन डॉलर का इनाम रखा। अब अपहरण के बाद ट्रंप ने खुले तौर पर कहा कि अमेरिका वेनेज़ुएला के तेल उद्योग में "मजबूती से शामिल" होगा।
यह कोई पहली घटना नहीं है। इतिहास गवाह है कि अमेरिका ने अपने आर्थिक हितों के लिए बार-बार तख्तापलट और युद्धों का सहारा लिया है: - **
इराक (2003)**: "विनाशकारी हथियारों" के झूठे इल्ज़ाम पर सद्दाम हुसैन का तख्तापलट। परिणाम? लाखों इराकी मौतें, देश का तबाह होना, और ईरान तथा अल-कायदा जैसे तत्वों का उदय। आज इराक अमेरिकी प्रभाव में है, लेकिन अरबों डॉलर के तेल पर अमेरिकी कंपनियों का कब्जा मजबूत हुआ।
- **मिस्र (2013)**: अरब स्प्रिंग के बाद मोहम्मद मुर्सी का तख्तापलट, जिसे अमेरिका ने चुपचाप समर्थन दिया। सैन्य शासन की स्थापना हुई, और अमेरिकी सहायता बरकरार रही। - **
सीरिया (2011 से अब तक)**: 15 साल से अधिक गृहयुद्ध, जिसमें अमेरिका ने विपक्षी समूहों को हथियार सप्लाई किए। शुरू में जुलानी (अब अहमद अल-शरआ) को आतंकवादी घोषित कर 10 मिलियन डॉलर का इनाम रखा, लेकिन 2024 में असद के पतन के बाद HTS के सत्ता में आने पर इनाम हटा दिया गया। 2025 में ट्रंप ने जुलानी से मुलाकात की, प्रतिबंध हटाए, और सीरिया को "शांति" का साझेदार बताया। अब जुलानी अमेरिका-इजरायल का "मान्यता प्राप्त" चेहरा बन चुका है, और हथियारों से लेकर तेल क्षेत्रों तक सप्लाई जारी है।
अफ्रीका में भी यही पैटर्न दिखता है – लीबिया (2011) में गद्दाफी का तख्तापलट, जिसके बाद देश गृहयुद्ध में डूब गया। अब कई अफ्रीकी देशों की सोने की खदानों और संसाधनों पर अप्रत्यक्ष कब्जा।
क्या यह "मानवता-वादी" व्यवस्था है? या शुद्ध साम्राज्यवादी लूट? अमेरिका खुद को "लोकतंत्र का रक्षक" कहता है, लेकिन जब तेल, खनिज या भू-राजनीतिक लाभ की बात आती है, तो संप्रभुता, अंतरराष्ट्रीय कानून और लाखों निर्दोष जानें कुर्बान हो जाती हैं। वेनेज़ुएला का मामला स्पष्ट करता है कि 2026 में भी "ब्रूट फोर्स" से दुनिया जीती जा सकती है – बशर्ते वह अमेरिकी हितों के खिलाफ हो।
दुनिया को अब सवाल पूछना होगा: क्या यह "नई विश्व व्यवस्था" है, जहां मजबूत देश कमजोरों का अपहरण कर लेते हैं? या मानवता की आड़ में चल रही लूट की आखिरी कड़ी? समय आ गया है कि वैश्विक समुदाय इस साम्राज्यवाद के खिलाफ एकजुट हो, वरना अगला शिकार कोई भी हो सकता है।
Friday World-January 3,2026
Sajjadali Nayani ✍