-Friday World January 20,2026
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ग्रीनलैंड पर कब्जे की लगातार धमकियों ने पूरे यूरोप को हिला दिया है। ट्रंप ने बार-बार दावा किया है कि ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है और इसे किसी भी कीमत पर हासिल किया जाएगा। इन धमकियों के जवाब में डेनमार्क (जिसके अधीन ग्रीनलैंड एक स्वायत्त क्षेत्र है) ने अपने नाटो सहयोगी देशों के साथ मिलकर ऑपरेशन आर्कटिक एंड्योरेंस नाम से एक संयुक्त सैन्य अभ्यास शुरू किया है। इस अभ्यास के तहत कई यूरोपीय देशों ने अपने सैनिक ग्रीनलैंड भेजे हैं, जो एक मजबूत राजनीतिक और सैन्य संदेश दे रहा है – ग्रीनलैंड अकेला नहीं है!
फ्रांस ने 15 सैनिक भेजे हैं, जो 27वीं माउंटेन इन्फैंट्री ब्रिगेड से हैं। जर्मनी ने 13 सैनिकों की एक टोही टीम तैनात की है। ब्रिटेन ने सिर्फ 1 सैन्य अधिकारी को शामिल किया है। नॉर्वे, नीदरलैंड्स और फिनलैंड ने भी अपने-अपने सैनिक भेजे हैं, जबकि स्वीडन ने सैनिकों की तैनाती की पुष्टि की है, हालांकि संख्या अभी सार्वजनिक नहीं की गई। कुल मिलाकर, इन यूरोपीय देशों से लगभग 35-40 सैनिक ग्रीनलैंड पहुंच चुके हैं। डेनमार्क पहले से ही वहां लगभग 200 सैनिक तैनात कर चुका है, साथ ही 14 सदस्यीय सीरियस डॉग स्लेज पेट्रोल टीम भी मौजूद है, जो आर्कटिक क्षेत्र में गश्त करती है।
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने स्पष्ट कहा है कि आने वाले दिनों में ग्रीनलैंड में जमीनी, हवाई और समुद्री ताकत को और मजबूत किया जाएगा। उन्होंने इसे नाटो की एकजुटता का प्रतीक बताया और कहा कि यह छोटी संख्या भले ही कम लगे, लेकिन इसका मकसद राजनीतिक संदेश देना है – नाटो एक साथ खड़ा है। डेनमार्क के नेतृत्व में चल रहा यह अभ्यास आर्कटिक क्षेत्र में सहयोगी देशों के बीच तालमेल और ऑपरेशनल क्षमता बढ़ाने पर केंद्रित है। इसका उद्देश्य यह जांचना है कि अगर भविष्य में ग्रीनलैंड में बड़ी संख्या में सैनिक तैनात करने की जरूरत पड़ी, तो तैयारी कैसी होगी।
डेनमार्क के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, यह अभ्यास आर्कटिक में बढ़ती चुनौतियों (रूस और चीन की बढ़ती मौजूदगी सहित) का जवाब है। भविष्य में इससे बड़ा मिशन ऑपरेशन आर्कटिक सेंचुरी शुरू करने की योजना है, जो एक पूर्ण नाटो मिशन होगा। इसका लक्ष्य ग्रीनलैंड और आसपास के क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाना और किसी भी खतरे का सैन्य जवाब देने की क्षमता मजबूत करना है। हालांकि, जर्मनी के रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस के अनुसार, यह बड़ा मिशन अभी कई महीनों दूर है। फिलहाल, यह तैयारी और योजना का चरण है, कोई बड़ा नया सैन्य अभियान नहीं शुरू हुआ है।
दूसरी ओर, इटली के रक्षा मंत्री गुइडो क्रोसेट्टो ने इस पूरे मामले पर तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने यूरोपीय देशों की छोटी-छोटी तैनाती को "मजाक" करार दिया। उन्होंने कहा, "100, 200 या 300 सैनिक क्या कर लेंगे? 15 इटालियन, 15 फ्रेंच, 15 जर्मन – ये तो मजाक की शुरुआत लगती है!" इटली ने स्पष्ट रूप से कोई सैनिक भेजने से इनकार कर दिया है और इसे रणनीतिक रूप से बेमानी बताया है। उनका मानना है कि नाटो को सामूहिक और ठोस तरीके से काम करना चाहिए, न कि ऐसे छोटे-छोटे इशारों से।
ट्रंप की धमकियों ने नाटो के अंदर गहरी दरार पैदा कर दी है। अमेरिका ने इन देशों पर 10% टैरिफ लगाने की घोषणा की है, जिसे बाद में बढ़ाकर 25% करने की बात कही गई है। यूरोपीय देशों ने इसे "ट्रांसएटलांटिक संबंधों को कमजोर करने वाला" कदम बताया और चेतावनी दी कि इससे खतरनाक downward spiral शुरू हो सकता है। ग्रीनलैंड के लोग भी ट्रंप की धमकियों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं और स्पष्ट कह रहे हैं कि उनका द्वीप बिकाऊ नहीं है।
यह घटनाक्रम आर्कटिक क्षेत्र में भू-राजनीतिक तनाव को नया रूप दे रहा है। ग्रीनलैंड की रणनीतिक अहमियत (खनिज संसाधन, सैन्य बेस और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव) के कारण यह विवाद सिर्फ एक द्वीप का नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का मुद्दा बन गया है। यूरोप की एकजुटता और ट्रंप की आक्रामक नीति के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है, जिसका असर नाटो की एकता पर पड़ सकता है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World January 20,2026