2001 में 9/11 हमलों के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला किया और "आतंक के खिलाफ युद्ध" की शुरुआत की। इसी युद्ध के दौरान बगराम एयर बेस पर स्थापित बगराम जेल (Bagram Theater Internment Facility) अमेरिकी सेना और CIA के लिए एक प्रमुख डिटेंशन सेंटर बन गई। इसे अक्सर "अफगानिस्तान की ग्वांतानामो" कहा जाता है, जहां हजारों अफगानों को बिना ट्रायल, बिना कानूनी सहायता और बिना परिवार की जानकारी के रखा गया। यह जेल न केवल संदिग्ध आतंकवादियों की हिरासत का केंद्र थी, बल्कि व्यवस्थित यातना, अमानवीय व्यवहार और मानवाधिकारों के घोर उल्लंघन का प्रतीक भी बन गई।
बगराम जेल की स्थापना और संरचना काबुल से लगभग 50 किलोमीटर उत्तर में स्थित बगराम एयर बेस पर 2002 में यह जेल बनाई गई। इसमें 120 से अधिक सेल थे और क्षमता 5,000-6,000 कैदियों की थी। शुरू में इसे हथियारबंद समूहों से जुड़े संदिग्धों के लिए बनाया गया था, लेकिन जल्द ही यह एक ऐसी जगह बन गई जहां पारदर्शिता, कानूनी निगरानी और मानवीय मानकों का पूरी तरह उल्लंघन हुआ। Human Rights Watch और Amnesty International जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने इसे "काला स्थान" करार दिया, जहां CIA और अमेरिकी सेना द्वारा यातना के तरीके अपनाए गए।
अमानवीय यातना और शारीरिक शोषण के तरीके बगराम में कैदियों के साथ व्यवहार क्रूर और व्यवस्थित था। रिपोर्ट्स के अनुसार:
- कैदियों को छत से चेन से बांधकर लटकाया जाता था।
- ठंडे कमरों में रखा जाता, नींद से वंचित किया जाता (स्लीप डिप्रिवेशन), तेज रोशनी और आवाजों से परेशान किया जाता।
- "पेरोनियल स्ट्राइक्स" जैसे तरीकों से पैरों पर बार-बार मारपीट की जाती, जिससे गंभीर चोटें लगतीं।
- कुछ मामलों में इलेक्ट्रिक शॉक, कुत्तों से धमकाना, अपमानजनक स्थिति में रखना और यौन शोषण जैसी घटनाएं भी दर्ज हुईं।
ये तरीके जानकारी निकालने के नाम पर अपनाए जाते थे, लेकिन वास्तव में ये यातना के क्लासिक उदाहरण थे, जो अंतरराष्ट्रीय कानून (जैसे जेनेवा कन्वेंशन्स) का उल्लंघन थे।
सबसे कुख्यात मामले: दिलावर और मुल्ला हबीबुल्लाह की मौतें 2002 दिसंबर में दो अफगान कैदियों – मुल्ला हबीबुल्लाह (एक धार्मिक नेता) और दिलावर (22 वर्षीय टैक्सी ड्राइवर और किसान) – की मौत ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा।
दोनों को छत से चेन से बांधकर रखा गया और कई दिनों तक क्रूर मारपीट की गई। ऑटोप्सी रिपोर्ट्स में मौत को हॉमिसाइड (हत्या) घोषित किया गया – ब्लंट फोर्स ट्रॉमा के कारण। दिलावर के पैरों पर इतनी गंभीर चोटें थीं कि उन्हें "बस से कुचले जाने" जैसी बताया गया। मुल्ला हबीबुल्लाह की मौत भी इसी तरह की यातना से हुई।
Human Rights Watch और New York Times की जांच में पता चला कि ये मौतें अमेरिकी सैनिकों द्वारा की गई व्यवस्थित यातना का नतीजा थीं। सात सैनिकों पर आरोप लगे, लेकिन सजा हल्की रही – कुछ महीनों की जेल, पदावनति या जुर्माना। कोई भी हत्या के लिए सीधे दोषी नहीं ठहराया गया।
कानूनी पारदर्शिता की कमी और अंतरराष्ट्रीय आलोचना बगराम में कैदियों को बिना ट्रायल महीनों- सालों तक रखा जाता था। परिवारों को जानकारी नहीं दी जाती, वकीलों तक पहुंच नहीं थी। ग्वांतानामो की तुलना में बगराम ज्यादा "अंधेरे में" रहा, जिससे यातना की खबरें देर से आईं।
Human Rights Watch (2004 रिपोर्ट "Enduring Freedom") और Amnesty International ने व्यवस्थित यातना की पुष्टि की। अफगान सरकार की जांच समिति (2002) ने भी बड़े पैमाने पर अपराधों का खुलासा किया। संयुक्त राष्ट्र और अन्य संगठनों ने इसे "क्रूर, अमानवीय और अपमानजनक व्यवहार" करार दिया।
सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव बगराम की यातनाओं ने अफगान लोगों में अमेरिकी सेनाओं के प्रति गहरा अविश्वास पैदा किया। कई अफगानों ने इसे विदेशी ताकतों का सामान्य व्यवहार माना, जिससे विद्रोह और तनाव बढ़ा। यह "आतंक के खिलाफ युद्ध" की नैतिक विफलता का प्रतीक बन गया।
सुधारों की कोशिश और अंतिम हस्तांतरण दबाव बढ़ने पर अमेरिका ने कुछ सुधार किए, लेकिन जेल की बदनामी नहीं मिटी। 2014-2015 में अमेरिकी सेना के अफगानिस्तान से निकलने के बाद जेल अफगान सरकार को सौंपी गई। लेकिन बगराम की यादें आज भी मानवाधिकार उल्लंघनों की एक काली सच्चाई के रूप में बनी हुई हैं।
बगराम जेल सिर्फ एक जेल की कहानी नहीं है – यह युद्ध के दौरान सत्ता के दुरुपयोग, निगरानी की कमी और मानवाधिकारों से भटकने का जीवंत उदाहरण है। पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका, ने "लोकतंत्र और मानवाधिकार" के नाम पर जो अपराध किए, वे आज भी सवाल उठाते हैं: क्या शक्ति के नशे में इंसानियत की कीमत चुकानी पड़ती है?
Sajjadali Nayani ✍
Friday World January 19,2026