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तेहरान। 7 जनवरी 2026 को ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अरागची ने कैबिनेट बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत में साफ कहा कि वर्तमान समय में अमेरिका के साथ बातचीत के लिए उचित माहौल नहीं बना है। उन्होंने इसका मुख्य कारण अमेरिकी नीतियों को बताया, खासकर वह दृष्टिकोण जो आपसी सम्मान और समान हितों पर आधारित नहीं है।
अरागची ने जोर देकर कहा, "ईरान ने कभी भी बातचीत की मेज को नहीं छोड़ा है और हम हमेशा से आपसी सम्मान एवं साझा हितों के आधार पर संवाद के लिए तैयार रहे हैं। लेकिन वर्तमान अमेरिकी प्रशासन ऐसा रवैया नहीं अपनाता।" यह बयान ऐसे समय आया है जब ईरान आंतरिक आर्थिक चुनौतियों और क्षेत्रीय तनावों से जूझ रहा है, और अमेरिका-इजरायल गठजोड़ से पिछले साल (2025) में हुए हमलों की यादें अभी ताजा हैं।
अमेरिकी नीतियों पर ईरान का गुस्सा ईरानी विदेश मंत्री ने स्पष्ट रूप से अमेरिका की "अधिनायकवादी" और "एकतरफा" नीतियों की आलोचना की। जून 2025 में इजरायल और अमेरिका द्वारा ईरान के परमाणु ठिकानों पर किए गए हमलों को उन्होंने "चरम असफलता" करार दिया। अरागची का कहना था कि "अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला करके अपनी रणनीति आजमाई, लेकिन वह पूरी तरह विफल रही। अगर वे दोबारा कोशिश करेंगे, तो उन्हें वही परिणाम भुगतने पड़ेंगे। हम युद्ध नहीं चाहते, लेकिन हम उसके लिए तैयार हैं।"
इसके अलावा, ईरान अमेरिका पर आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप का आरोप लगाता रहा है। हाल के विरोध प्रदर्शनों (जो महंगाई, आर्थिक संकट और रियाल की गिरावट से उपजे हैं) में अमेरिका और इजरायल पर "प्रत्यक्ष हस्तक्षेप" का इल्जाम लगाया गया। तेहरान का दावा है कि अमेरिकी प्रतिबंध और आर्थिक युद्ध ही ईरान की अधिकांश समस्याओं के जिम्मेदार हैं, जो "मानवता के खिलाफ अपराध" के समान हैं।
लेबनान के साथ संबंधों का विस्तार: रणनीतिक कदम अरागची ने अपने बयान में लेबनान का विशेष जिक्र किया। उन्होंने बताया कि वे जल्द ही बेरूत जा रहे हैं, जहां एक आर्थिक प्रतिनिधिमंडल के साथ बातचीत होगी। उद्देश्य है दोनों देशों के बीच संबंधों को और मजबूत करना, जिसमें आर्थिक साझेदारी, व्यापार और क्षेत्रीय सहयोग प्रमुख हैं।
ईरान लंबे समय से लेबनान में हिजबुल्लाह के माध्यम से प्रभाव रखता है, लेकिन अब वह लेबनानी सरकार और पूरे संस्थानों के साथ "व्यापक संबंध" चाहता है। अरागची ने कहा, "हम लेबनान के साथ संबंधों की एक नई शुरुआत करना चाहते हैं, जो दोनों पक्षों के हितों का सम्मान करे।" यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब लेबनान की सेना हिजबुल्लाह के हथियारों को निरस्त्र करने की प्रक्रिया में जुटी है, और क्षेत्रीय सुरक्षा पर चर्चा महत्वपूर्ण हो गई है।
परमाणु कार्यक्रम और वार्ता की शर्तें ईरान का परमाणु कार्यक्रम वैश्विक बहस का केंद्र बना हुआ है। अरागची ने दोहराया कि तेहरान परमाणु वार्ता के लिए तैयार है, लेकिन शर्त यह है कि वह "सम्मानजनक" हो, न कि "अमेरिकी आदेश" पर आधारित। पिछले साल के हमलों के बाद ईरान ने अपनी स्थिति और सख्त कर ली है। वह कहता है कि अमेरिका को पहले अपना व्यवहार बदलना होगा और कोई सैन्य हमला न करने की गारंटी देनी होगी।
क्षेत्रीय संदर्भ और भविष्य यह बयान मध्य पूर्व की जटिल स्थिति को दर्शाता है। ईरान रूस, चीन और अन्य देशों के साथ सहयोग बढ़ा रहा है, जबकि अमेरिका के नेतृत्व में दबाव बना हुआ है। 2026 की शुरुआत में ईरान आर्थिक संकट, विरोध प्रदर्शनों और क्षेत्रीय चुनौतियों से जूझ रहा है, लेकिन विदेश मंत्री का बयान दृढ़ता और आत्मविश्वास दिखाता है।
ईरान स्पष्ट रूप से कह रहा है कि जब तक अमेरिका अपनी नीतियों में बदलाव नहीं लाता, तब तक प्रत्यक्ष बातचीत संभव नहीं। साथ ही, वह पड़ोसी देशों खासकर लेबनान के साथ मजबूत गठजोड़ बनाकर क्षेत्रीय संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।
क्या यह रुख युद्ध की ओर ले जाएगा या कूटनीति के नए रास्ते खोलेगा? आने वाले महीने बताएंगे। लेकिन फिलहाल, तेहरान का संदेश साफ है: सम्मान के बिना बातचीत नहीं।
Sajjadali Nayani ✍
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