-Friday World 22 February 2026
अमेरिका की सड़कों पर नस्लवाद की आग जल रही थी। 20वीं सदी के मध्य में अश्वेत लोग गुलामी की जंजीरों से आजाद तो हो चुके थे, लेकिन उनकी आत्मा अभी भी गुलाम थी। इसी दौर में एक ऐसा शख्स उभरा, जिसने न सिर्फ आवाज बुलंद की, बल्कि पूरे विश्व को झकझोर दिया। उसका नाम था **मैलकम एक्स** – एक ऐसा नाम जो आज भी लाखों दिलों में विद्रोह की लौ जलाता है।
बचपन की कड़वी शुरुआत: नफरत की पहली सीख 19 मई 1925 को नेब्रास्का के ओमाहा शहर में मैलकम लिटिल के रूप में जन्मे इस बच्चे का बचपन कभी सामान्य नहीं रहा। उनके पिता अर्ल लिटिल एक बैपटिस्ट मंत्री थे और मार्कस गार्वे के अफ्रीकी-वापसी आंदोलन के समर्थक। लेकिन श्वेत supremacist समूहों ने परिवार को निशाना बनाया। Ku Klux Klan जैसी ताकतों के डर से परिवार मिशिगन चला गया, लेकिन वहाँ भी खतरा कम नहीं हुआ।
1931 में पिता की मौत हो गई – आधिकारिक तौर पर सड़क दुर्घटना बताई गई, लेकिन ज्यादातर लोग इसे नस्लीय हत्या मानते हैं। माँ लुईस लिटिल मानसिक तनाव में चली गईं और अस्पताल में भर्ती हो गईं। आठ भाई-बहनों को अलग-अलग foster homes में बाँट दिया गया। मैलकम अच्छे छात्र थे, लेकिन स्कूल में नस्लीय भेदभाव ने उन्हें तोड़ दिया। एक शिक्षक ने कहा, "तुम वकील नहीं बन सकते, नाई बनो।" बस, 8वीं कक्षा में उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी।
अपराध की गलियों से जेल तक: "डेट्रॉइट रेड" का दौर किशोरावस्था में मैलकम बोस्टन और फिर न्यूयॉर्क के हार्लेम पहुँचे। वहाँ की चमक-दमक ने उन्हें खींचा, लेकिन गरीबी और नस्लवाद ने उन्हें गलत रास्ते पर धकेल दिया। ड्रग्स, जुआ, चोरी, पिंपिंग – सब कुछ। लोग उन्हें "डेट्रॉइट रेड" कहते थे। 1946 में चोरी के आरोप में 10 साल की सजा हुई। जेल उनकी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट साबित हुई।
इस्लाम की रोशनी: Nation of Islam और नया जन्म जेल में उनकी बहन और भाई ने Nation of Islam (NOI) के बारे में बताया। एलिजा मुहम्मद के संदेश ने उन्हें छुआ। उन्होंने इस्लाम कबूल किया, पढ़ना-लिखना सीखा, बहस करना सीखा। 1952 में रिहा होने पर उन्होंने अपना नाम बदल दिया – मैलकम एक्स। "X" का मतलब था – गुलामी में खोया हुआ अफ्रीकी मूल नाम।
NOI में वे तेजी से ऊपर उठे। एलिजा मुहम्मद के मुख्य spokesperson बने। उनकी वाक्पटुता और आग उगलती भाषणों ने संगठन की सदस्यता को सैकड़ों से हजारों तक पहुँचा दिया। वे कहते थे – "श्वेत आदमी शैतान है।" "हम अलग रहेंगे, क्योंकि एक साथ रहना असंभव है।" "By any means necessary" – किसी भी तरीके से अपने अधिकार हासिल करो।
वे मार्टिन लूथर किंग की अहिंसा से असहमत थे। उनका मानना था कि अहिंसा से नस्लवाद खत्म नहीं होगा, आत्मरक्षा जरूरी है।
हज यात्रा: विचारों का क्रांतिकारी बदलाव 1964 में NOI से मतभेद हो गए। एलिजा मुहम्मद से विवाद के बाद मैलकम अलग हो गए। उसी साल उन्होंने हज किया। मक्का में उन्होंने देखा – सफेद, काले, पीले, सभी नस्लों के लोग एक साथ नमाज पढ़ रहे हैं, भाईचारे से। कोई भेदभाव नहीं।
यह अनुभव उनके लिए जीवन बदल देने वाला था। उन्होंने पत्र लिखा – "मैंने कभी इतना सच्चा भाईचारा नहीं देखा। अमेरिका को इस्लाम समझने की जरूरत है, क्योंकि यही एक ऐसा धर्म है जिसने नस्लवाद को खत्म किया है।"
वे सुन्नी इस्लाम अपनाकर एल-हज्ज मलिक एल-शबाज नाम रखा। अब वे सिर्फ अश्वेतों के नहीं, बल्कि सभी दबे-कुचले लोगों के अधिकारों की बात करने लगे। Organization of Afro-American Unity बनाई।
अंतिम दिन: गोली और अमर विरासत 21 फरवरी 1965 को न्यूयॉर्क के ऑडुबॉन बॉलरूम में भाषण देते हुए उन पर गोलीबारी हुई। सिर्फ 39 साल की उम्र में उनकी हत्या कर दी गई। मुख्य आरोपी NOI के सदस्य थे, लेकिन आज भी साजिश के कई सवाल बाकी हैं।
आज मैलकम एक्स क्यों प्रासंगिक हैं?
- उनकी आत्मकथा The Autobiography of Malcolm X (एलेक्स हेली के साथ) 20वीं सदी की सबसे प्रभावशाली किताबों में शुमार है।
- ब्लैक पावर, ब्लैक प्राइड, आत्म-सम्मान – ये शब्द उन्हीं से जुड़े।
- आज भी BLM (Black Lives Matter) आंदोलन में उनकी आवाज गूंजती है।
- वे सिखाते हैं – क्रोध को सिर्फ जलन नहीं, बल्कि बदलाव की ताकत बनाओ।
मैलकम एक्स कोई संत नहीं थे। वे क्रोधी थे, गुस्सैल थे, लेकिन ईमानदार थे। उन्होंने गलतियाँ मानीं, बदले, और अंत तक सच के साथ खड़े रहे।
"मैंने अपने जीवन में बहुत कुछ देखा है। मैंने नफरत देखी है, प्यार देखा है। लेकिन सबसे बड़ी सीख यह है – इंसानियत के आगे नस्ल, रंग कुछ नहीं।"
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 22 February 2026