-Friday World 19 Feb, 2026
वाशिंगटनःतेल अवीव- तेहरान: एक महाशक्ति की दुविधा दुनिया की सबसे बड़ी सुपरपावर, जिसे कभी 'दुनिया का दादा' कहा जाता था, आज अपनी ही जाल में फंस चुकी है। अमेरिका, जो हमेशा से दूसरों पर अपनी ताकत का रौब झाड़ता रहा है, अब ईरान और इजरायल के बीच उलझे संकट में बुरी तरह घिर गया है। आगे बढ़े तो कुआं, पीछे लौटे तो खाई—यह स्थिति है अमेरिकी प्रशासन की। अगर युद्ध से पीछे हटता है, तो पूरी दुनिया में उसकी इज्जत का मज़ाक बन जाएगा। और अगर लड़ाई छेड़ता है, तो उसका सबसे करीबी सहयोगी इजरायल नक्शे से मिट सकता है। यह सिर्फ एक राजनीतिक खेल नहीं, बल्कि एक ऐसी जंग की शुरुआत है जहां ताकत से ज्यादा रणनीति और धैर्य की परीक्षा हो रही है।
यह कहानी शुरू होती है मध्य पूर्व की उन गर्म रेतों से, जहां दशकों से तनाव की आग सुलग रही है। अमेरिका ने हमेशा इजरायल को अपना 'लाडला' माना है, लेकिन अब ईरान की बढ़ती ताकत ने सब कुछ उलट-पुलट कर दिया है। ईरान, जो कभी अमेरिकी प्रतिबंधों के नीचे दबा हुआ लगता था, अब एक ऐसे 'शेर' की तरह उभरा है जो अमेरिका को सवा शेर की चुनौती दे रहा है। इस लेख में हम गहराई से समझेंगे कि कैसे अमेरिका की 'मारने की ताकत' अब उसके लिए बोझ बन गई है, और ईरान की 'अदृश्य' रणनीति ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। यह एक ऐसा विश्लेषण है जो तथ्यों, इतिहास और वर्तमान की घटनाओं पर आधारित है, लेकिन साथ ही साथ उस रोमांच को भी छूता है जो इस भू-राजनीतिक ड्रामा में छिपा है।
मारने का दम, लेकिन सहने का जिगरा नहीं: अमेरिका-इजरायल की कमजोरी साहिब, बिल्कुल नई और सटीक बात सुनिए! अमेरिका और इजरायल में हमला करने की क्षमता तो अपार है—उन्नत मिसाइलें, ड्रोन, लड़ाकू विमान और नौसेना की ताकत जो दुनिया को हिला सकती है। लेकिन जब बात 'मार खाने' की आती है, तो इनके हाथ कांपने लगते हैं। यही वजह है कि ईरान पर हमला करने से पहले अमेरिकी नेता कई बार सोचते हैं। इतिहास गवाह है कि अमेरिका ने वियतनाम, अफगानिस्तान और इराक जैसी जंगों में अपनी ताकत दिखाई, लेकिन हर बार लंबी लड़ाई में उसकी जनता और अर्थव्यवस्था थक गई। इजरायल भी, जो मध्य पूर्व का 'शेर' माना जाता है, हमेशा छोटी-छोटी झड़पों में जीतता रहा है, लेकिन एक पूर्ण युद्ध में उसकी आबादी और बुनियादी ढांचा कितना सहन कर पाएगा, यह बड़ा सवाल है।
याद कीजिए वह पुराना हिंदी फिल्मी डायलॉग: "जिनके घर शीशे के होते हैं, वो दूसरों पर पत्थर नहीं मारा करते!" यह बिल्कुल फिट बैठता है अमेरिका और इजरायल पर। अमेरिका की अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे बड़ी है, लेकिन वह युद्ध की लागत सहन करने में कमजोर पड़ जाती है। ट्रिलियन डॉलर के बजट, लेकिन जनता की बढ़ती असंतोष और वैश्विक छवि का डर। इजरायल, जो अमेरिकी सहायता पर निर्भर है, अगर ईरान के साथ पूर्ण युद्ध में उलझता है, तो उसके शहरों पर मिसाइलों की बारिश हो सकती है। हिजबुल्लाह, हमास और अन्य ईरान समर्थित समूह पहले से ही इजरायल की सीमाओं पर तैयार हैं। अमेरिका जानता है कि अगर वह ईरान पर हमला करता है, तो न सिर्फ मध्य पूर्व, बल्कि पूरी दुनिया में तेल की कीमतें आसमान छू लेंगी, और उसकी अपनी अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी।
इस कमजोरी का फायदा ईरान बखूबी उठा रहा है। ईरान के नेता बार-बार चेतावनी दे रहे हैं कि अमेरिका और इजरायल की 'दादागिरी' अब नहीं चलेगी। ईरान की मिसाइल तकनीक, ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलें अब इतनी उन्नत हो चुकी हैं कि वे इजरायल के आयरन डोम जैसे रक्षा तंत्र को भेद सकती हैं। अमेरिका के लिए यह एक मानसिक युद्ध है—वे जानते हैं कि ईरान पर हमला मतलब एक लंबी, महंगी और अनिश्चित जंग।
12 दिन नहीं, 12 घंटे: ईरान की धमकी और उसकी सच्चाई** ईरान ने साफ-साफ शब्दों में कह दिया है: "वो पुराने 12 दिन वाली जंग को भूल जाओ! इस बार अगर युद्ध छिड़ा, तो 12 घंटे में इजरायल और अमेरिकी सैन्य अड्डों का ऐसा हाल होगा कि दुनिया देखती रह जाएगी!" यह सिर्फ एक धमकी नहीं, बल्कि एक रणनीतिक बयान है। इतिहास में 1980-88 की ईरान-इराक जंग को याद कीजिए, जो 8 साल चली, लेकिन अब समय बदल गया है। ईरान की सेना अब हाइपरसोनिक मिसाइलों से लैस है, जो ध्वनि की गति से 5 गुना तेज चलती हैं और किसी भी रडार से बच सकती हैं।
ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने बार-बार अभ्यास किए हैं जहां उन्होंने अमेरिकी जहाजों और इजरायल के ठिकानों पर सिमुलेटेड हमले दिखाए। अगर युद्ध होता है, तो ईरान की योजना है कि वह पहले घंटों में ही इजरायल के प्रमुख शहरों—जैसे तेल अवीव और हाइफा—पर मिसाइलों की बौछार कर दे। अमेरिकी अड्डे, जो इराक, सीरिया और खाड़ी देशों में फैले हैं, भी निशाने पर होंगे। ईरान का दावा है कि उसके पास 1000 से ज्यादा बैलिस्टिक मिसाइलें हैं, जो एक साथ फायर की जा सकती हैं। यह 'स्वार्म अटैक' रणनीति इजरायल की रक्षा प्रणाली को ओवरलोड कर सकती है।
लेकिन क्या यह संभव है? विशेषज्ञों का मानना है कि 12 घंटे में पूरी जीत तो नहीं, लेकिन ईरान निश्चित रूप से शुरुआती दौर में भारी नुकसान पहुंचा सकता है। अमेरिका की खुफिया एजेंसियां भी मानती हैं कि ईरान की असिमेट्रिक वारफेयर—यानी गुरिल्ला स्टाइल की लड़ाई—उन्हें मुश्किल में डाल सकती है। ईरान के समर्थक मिलिशिया समूह पूरे क्षेत्र में फैले हैं, जो अमेरिकी आपूर्ति लाइनों को बाधित कर सकते हैं।
समुंदर का 'भूत': ईरान की सबमरीन और अमेरिका का डर असली डर तो पानी के नीचे छिपा है! अमेरिका की नींद उड़ाने वाली है ईरान की 'घोदी' क्लास सबमरीनें, जो अरब सागर और फारस की खाड़ी में घूम रही हैं। इनकी लोकेशन ट्रैक करना पेंटागन के लिए सिरदर्द बना हुआ है। ये सबमरीनें डीजल-इलेक्ट्रिक हैं, जो बेहद शांत चलती हैं और सोनार से बच सकती हैं। ईरान के पास कम से कम 3 ऐसी उन्नत सबमरीनें हैं, जो टॉरपीडो और क्रूज मिसाइलों से लैस हैं।
पेंटागन को डर है कि ये 'समुंदर के भूत' कहीं से भी 'सरप्राइज गिफ्ट'—यानी मिसाइल—भेज सकती हैं। अमेरिकी नौसेना के कैरियर ग्रुप, जो खाड़ी में तैनात हैं, इनके निशाने पर हैं। अगर युद्ध होता है, तो ये सबमरीनें अमेरिकी जहाजों को डुबो सकती हैं, जिससे अमेरिका की समुद्री श्रेष्ठता पर सवाल उठेगा। यही वजह है कि युद्ध अभी रुका हुआ है—दुश्मन दिखाई नहीं दे रहा, लेकिन उसकी मौजूदगी हर जगह महसूस हो रही है।
ईरान की नौसेना रणनीति 'एंटी-एक्सेस/एरिया डिनायल' पर आधारित है, जो बड़े जहाजों को क्षेत्र में घुसने से रोकती है। अमेरिका ने कई बार सैटेलाइट और ड्रोन से ट्रैकिंग की कोशिश की, लेकिन ईरान की सबमरीनें 'हिट एंड रन' टैक्टिक्स से काम करती हैं। यह एक मनोवैज्ञानिक युद्ध है, जहां डर की वजह से अमेरिका हमला करने से हिचकिचा रहा है।
शेर को सवा शेर मिला, अब लोकेशन का खेल** अंत में, यह साफ है कि अमेरिका की 'दादागिरी' का दौर अब खत्म हो रहा है। ईरान ने साबित कर दिया है कि ताकत सिर्फ हथियारों में नहीं, बल्कि रणनीति और धैर्य में है। शेर को सवा शेर मिल गया है, और अब खेल ताकत का नहीं, 'लोकेशन' का चल रहा है। अगर अमेरिका पीछे हटता है, तो उसकी वैश्विक छवि धूमिल होगी, लेकिन अगर लड़ता है, तो नुकसान अपार होगा। दुनिया अब एक बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है, जहां अमेरिका अकेला दादा नहीं रह गया।
यह स्थिति हमें सोचने पर मजबूर करती है कि शांति का रास्ता बातचीत से ही निकलेगा। ईरान, अमेरिका और इजरायल को डिप्लोमेसी की मेज पर बैठना होगा, वरना यह संकट पूरे विश्व को युद्ध की आग में झोंक सकता है। आखिरकार, युद्ध में सच्चाई की जीत जरुर होती है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 19 Feb, 2026