-Friday World March 13,2026
ईरान-इज़राइल युद्ध की आग अब गुजरात के बनासकांठा जिले तक पहुंच गई है। जहां कभी खाड़ी देशों में बटाटे की भारी मांग होती थी, वहां आज निर्यात पूरी तरह ठप है। नतीजा? बटाटे के भाव तह में पहुंच गए हैं – 100 रुपये प्रति क्विंटल के नीचे! किसानों की साल भर की मेहनत, खाद-बीज-मजदूरी का खर्चा और उम्मीदें – सब कुछ मिट्टी में मिलता नजर आ रहा है। व्यापारी भी बड़े पैमाने पर स्टॉक करके बैठे हैं, लेकिन बाजार में मांग न होने से उन्हें भी भारी नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।
बनासकांठा: गुजरात का 'बटाटा का कटोरा', खाड़ी देशों का पसंदीदा बनासकांठा जिला गुजरात में बटाटा उत्पादन का सबसे बड़ा केंद्र है। यहां की मिट्टी, जलवायु और सिंचाई सुविधाओं की वजह से उच्च गुणवत्ता वाला बटाटा पैदा होता है, खासकर प्रोसेसिंग और निर्यात के लिए उपयुक्त।
→ हर साल लाखों क्विंटल बटाटा यहां से खाड़ी देशों (यूएई, सऊदी अरब, ओमान, कुवैत, कतर आदि) में निर्यात होता है।
→ सामान्य वर्षों में 35-40 लाख कट्टे (बोरियां) का निर्यात होता है।
→ प्रोसेस्ड बटाटे (चिप्स, फ्रेंच फ्राइज़ के लिए) की सालाना 25 लाख कट्टे की निर्यात मात्रा होती है।
किसानों को उम्मीद रहती है कि अच्छी फसल होने पर निर्यात से अच्छे दाम मिलेंगे। लेकिन इस बार ईरान-इज़राइल युद्ध ने पूरी तस्वीर बदल दी है।
युद्ध की वजह से निर्यात पर पूरी तरह ब्रेक खाड़ी क्षेत्र में युद्ध बढ़ने के बाद:
→ समुद्री मार्ग (खासकर होर्मुज़ जलडमरूमध्य) पर खतरा बढ़ गया।
→ जहाजों पर हमले, बीमा प्रीमियम में भारी उछाल, कंटेनरों की उपलब्धता लगभग खत्म।
→ कंटेनर किराया कई गुना बढ़ गया है।
→ निर्यातक कंपनियां जोखिम नहीं लेना चाहतीं। नतीजा? बनासकांठा से खाड़ी देशों में बटाटे का निर्यात लगभग रुक गया है।
→ पहले जहां रोजाना दर्जनों कंटेनर लोड होते थे, अब कंटेनर ही नहीं मिल रहे।
→ जो कंटेनर मिल भी रहे हैं, उनका किराया 3-4 गुना हो गया है।
→ निर्यात 50% से भी कम रह गया है।
भाव तह में: 100 रुपये के नीचे पहुंचे बटाटे
स्थानीय मंडियों (पालनपुर, देesa, थराद आदि) में बटाटे की आवक बढ़ गई है, लेकिन मांग न के बराबर।
→ औसत भाव: 80-100 रुपये प्रति क्विंटल (कुछ जगह 60-70 रुपये तक गिर गए)।
→ उत्पादन लागत (खाद, बीज, मजदूरी, बिजली, पानी) औसतन 150-200 रुपये प्रति क्विंटल होती है।
→ यानी किसान को प्रति क्विंटल 50-100 रुपये का घाटा हो रहा है।
किसानों का कहना है: "साल भर मेहनत की, कुदरत ने भी साथ दिया, लेकिन युद्ध ने सब बर्बाद कर दिया। अब तो मजदूरी भी नहीं निकल रही।"
व्यापारियों पर भी दोहरा संकट
बटाटा व्यापारी और कोल्ड स्टोरेज मालिक भी बुरी तरह फंसे हैं:
→ उन्होंने अग्रिम में किसानों से ऊंचे दाम पर बटाटा खरीदा और कोल्ड स्टोरेज में रखा।
→ निर्यात रुकने से स्टॉक पड़ा है, लेकिन बाजार में भाव गिरते जा रहे हैं।
→ अगर युद्ध लंबा चला तो लाखों-करोड़ों का नुकसान तय है।
देesa के एक प्रमुख व्यापारी ने बताया:
"हर साल 8 हजार कंटेनर में निर्यात होता था। इस बार अभी तक 50% भी नहीं हुआ। कंटेनर नहीं मिल रहे, मिल भी रहे हैं तो किराया बहुत ज्यादा है। स्टॉक पड़ा है, भाव गिर रहे हैं – नुकसान बहुत बड़ा होने वाला है।"
किसानों और व्यापारियों की एक ही उम्मीद: युद्ध जल्द खत्म हो
अभी सबकी नजरें खाड़ी क्षेत्र की स्थिति पर टिकी हैं।
→ अगर जल्दी शांति स्थापित हुई और समुद्री मार्ग सुरक्षित हुए, तो निर्यात फिर शुरू हो सकता है।
→ भाव में सुधार हो सकता है।
→ लेकिन अगर युद्ध लंबा खिंचा तो:
- किसानों को भारी घाटा - व्यापारियों का दिवालिया होना
- कोल्ड स्टोरेज में सड़ने का खतरा
- अगले साल बुआई में कमी
सरकार से अपील: तत्काल हस्तक्षेप जरूरी किसान संगठन और व्यापारी मंडल सरकार से मांग कर रहे हैं:
→ निर्यात प्रोत्साहन योजना तुरंत लागू करें।
→ वैकल्पिक बाजार (दक्षिण भारत, पूर्वी देशों) में निर्यात के लिए मदद।
→ MSP या बफर स्टॉक में बटाटा खरीद की व्यवस्था।
→ कोल्ड स्टोरेज सब्सिडी बढ़ाएं।
युद्ध की कीमत किसान चुकाएंगे? बनासकांठा के किसान कहते हैं: "हमने तो सिर्फ खेती की थी, युद्ध हमने नहीं किया। फिर भी हमें ही सजा मिल रही है।" यह घटना एक बार फिर साबित करती है कि वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव का असर कितनी दूर तक पहुंचता है – गांव-गांव तक, खेत-खेत तक।
अगर युद्ध जल्दी खत्म नहीं हुआ, तो बनासकांठा के बटाटा किसान इस सीजन में सबसे बड़ा नुकसान उठाने वाले होंगे।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World March 13,2026