-Friday World March 30,2026
वाशिंगटन, 30 मार्च 2026 – अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में वैश्विक गठबंधनों में दरारें साफ दिखने लगी हैं। खासकर नाटो के सबसे मजबूत सहयोगी जर्मनी में अब अमेरिका विरोध चरम पर पहुंच गया है। दक्षिणपंथी अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (AfD) पार्टी ने जोरदार मांग की है कि जर्मनी में तैनात लगभग 40,000 अमेरिकी सैनिकों को तुरंत देश से बाहर निकाल दिया जाए। साथ ही अमेरिकी सैन्य अड्डों और परमाणु हथियारों को भी जर्मन धरती से हटाने की बात कही गई है।
यह मांग ट्रम्प प्रशासन की आक्रामक विदेश नीति, खासकर ईरान के साथ चल रहे संघर्ष के बीच आई है, जिसने यूरोप में गहरी असहजता पैदा कर दी है। AfD के सह-नेता टीना च्रुपाला (Tino Chrupalla) ने सैक्सोनी में पार्टी की एक बैठक में कहा, "जर्मनी को अब वॉशिंगटन से स्वतंत्र विदेश नीति अपनानी चाहिए। शुरूआत 40,000 अमेरिकी सैनिकों की वापसी से करें। साथ ही सहयोगी देशों के परमाणु ठिकानों और सैन्य अड्डों को भी खत्म कर देना चाहिए।"
जर्मनी क्यों नाराज? ट्रम्प की हरकतें और ईरान युद्ध ट्रम्प के सत्ता संभालने के बाद नाटो सहयोगी देशों में असंतोष बढ़ता जा रहा है। जर्मनी, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका का सबसे करीबी सहयोगी रहा है, अब खुद को "अमेरिकी हितों का गुलाम" मानने लगा है। AfD का आरोप है कि नाटो में अमेरिका हमेशा अपना हित पहले रखता है और यूरोपीय देशों को अनावश्यक विदेशी युद्धों में घसीटता है।
च्रुपाला ने स्पेन का उदाहरण दिया, जहां सरकार ने अमेरिकी बेस को ईरान पर हमलों के लिए इस्तेमाल नहीं करने दिया। उन्होंने कहा कि जर्मनी को भी यही रुख अपनाना चाहिए, खासकर रामस्टाइन एयर बेस (Ramstein Air Base) के मामले में। यह बेस यूरोप में अमेरिका का सबसे बड़ा सैन्य केंद्र है, जिससे ईरान पर मिसाइल और ड्रोन हमलों का समन्वय किया जा रहा है। जर्मन नागरिकों में आशंका है कि इससे जर्मनी भी ईरानी जवाबी हमलों का निशाना बन सकता है। रामस्टाइन को अक्सर "यूरोप का मिनी अमेरिका" कहा जाता है, जहां अमेरिकी नियंत्रण इतना मजबूत है कि स्थानीय कानून भी सीमित प्रभाव रखते हैं।
जर्मनी में वर्तमान में 40,000 से ज्यादा अमेरिकी सैनिक तैनात हैं और 12 से अधिक प्रमुख सैन्य अड्डे हैं। AfD का पार्टी मेनिफेस्टो लंबे समय से विदेशी सैनिकों और परमाणु हथियारों की वापसी की मांग करता रहा है। च्रुपाला ने जोर देकर कहा कि 2029 तक जर्मनी को पूर्ण सैन्य संप्रभुता हासिल करनी चाहिए।
चांसलर फ्रेडरिक मर्ट्ज़ भी ट्रम्प से नाराज AfD की मांग केवल दक्षिणपंथी विपक्ष तक सीमित नहीं है। जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ट्ज़ (Friedrich Merz) ने भी ट्रम्प की ईरान नीति पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि ट्रम्प "शांति की बजाय बड़े पैमाने पर वृद्धि" (massive escalation) कर रहे हैं, जिसका कोई स्पष्ट रणनीति या निकास योजना नहीं दिखती। मर्ट्ज़ ने नाटो को याद दिलाया कि ईरान युद्ध "नाटो का युद्ध नहीं है" और जर्मनी इसमें सैन्य रूप से शामिल नहीं होगा।
ट्रम्प ने नाटो सहयोगियों को "कायर" (cowards) कहकर फटकार लगाई थी जब उन्होंने हार्मुज जलडमरूमध्य को सुरक्षित रखने में मदद करने से इनकार कर दिया। जर्मनी ने साफ कहा – "यह हमारा युद्ध नहीं है, हमने इसे शुरू नहीं किया।" मर्ट्ज़ ने ट्रम्प से मुलाकात के दौरान भी असहजता जताई और यूरोप को अमेरिका से अधिक स्वतंत्र होने की बात कही।
ट्रम्प की अन्य हरकतें भी यूरोप को चुभ रही हैं:
- कनाडा के प्रधानमंत्री को "गवर्नर" कहना
- यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की को सार्वजनिक रूप से डांटना
- ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की योजना
- यूरोपीय नेताओं के खिलाफ अपमानजनक भाषा
इन सबके बीच जर्मनी में अमेरिका विरोध बाएं और दाएं दोनों पक्षों में बढ़ रहा है। सत्ताधारी और विपक्षी दल इस मुद्दे पर अक्सर एकमत दिखते हैं।
ट्रम्प का जवाब: सैनिक वापसी की चर्चा खुद ट्रम्प कर रहे हैं रोचक बात यह है कि ट्रम्प खुद जर्मनी से सैनिकों की वापसी पर विचार कर रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, वे लागत बचाने और "अमेरिका फर्स्ट" नीति के तहत यूरोप में अमेरिकी उपस्थिति घटाने की सोच रहे हैं। लेकिन AfD की मांग इससे आगे है – वे न केवल सैनिकों बल्कि पूरे अमेरिकी सैन्य ढांचे को जड़ से उखाड़ फेंकना चाहते हैं।
क्या कहती है वास्तविकता? द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जर्मनी में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति नाटो की रक्षा व्यवस्था का आधार रही है, खासकर रूस के खतरे के खिलाफ। लेकिन ईरान युद्ध ने इस संबंध को नया मोड़ दे दिया है। जर्मनी को डर है कि रामस्टाइन जैसे बेस की वजह से वह अनावश्यक रूप से संघर्ष में खिंच सकता है। AfD की बढ़ती लोकप्रियता (2025 चुनाव में दूसरे स्थान पर) दिखाती है कि जर्मन जनता में "सॉवरेन्टी" (स्वाधीनता) की मांग मजबूत हो रही है।
ट्रम्प की नीतियां यूरोप को मजबूर कर रही हैं कि वह खुद की रक्षा के लिए अधिक निवेश करे और अमेरिका पर निर्भरता कम करे। कई यूरोपीय देश अब "स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी" (रणनीतिक स्वायत्तता) की बात कर रहे हैं।
बदलता वैश्विक संतुलन जर्मनी में उठी यह मांग सिर्फ AfD की नहीं, बल्कि ट्रांस-अटलांटिक संबंधों में गहरी दरार का प्रतीक है। ट्रम्प की "अमेरिका फर्स्ट" नीति सहयोगियों को असहज कर रही है, जबकि ईरान संघर्ष ने तेल की कीमतों, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक स्थिरता पर असर डाला है।
क्या जर्मनी वाकई अमेरिकी सैनिकों को विदा कर पाएगा? या यह सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी है? फिलहाल, तनाव बढ़ रहा है और यूरोप को अपना रास्ता खुद चुनना पड़ रहा है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World March 30,2026