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Monday, 30 March 2026

ऑयल का भाव अब डॉलर में नहीं, युआन में आएगा!? पेट्रोडॉलर का अंत और पेट्रोल्युआन का उदय: मध्य-पूर्व युद्ध ने बदल दी वैश्विक ऊर्जा की भाषा ?

ऑयल का भाव अब डॉलर में नहीं, युआन में आएगा!? पेट्रोडॉलर का अंत और पेट्रोल्युआन का उदय: मध्य-पूर्व युद्ध ने बदल दी वैश्विक ऊर्जा की भाषा ?
-Friday World March 30,2026 
नई दिल्ली, 30 मार्च 2026: दुनिया के तेल व्यापार में एक ऐतिहासिक बदलाव की शुरुआत हो चुकी है। दशकों से तेल का भाव सिर्फ अमेरिकी डॉलर में तय होता था, लेकिन अब ईरान के हार्मुज स्ट्रेट पर नए नियम आ रहे हैं। अगर तेल का कारोबार चीनी युआन में होगा तो ही टैंकर सुरक्षित गुजर सकेंगे। ईरान पहले ही कुछ जहाजों से युआन में टोल वसूल चुका है और अब आठ से ज्यादा देशों के साथ युआन-आधारित तेल व्यापार पर बातचीत कर रहा है।

 यह बदलाव सिर्फ एक क्षेत्रीय विवाद नहीं है। यह पेट्रोडॉलर सिस्टम की नींव हिला रहा है और पेट्रोल्युआन (Petroyuan) के युग की शुरुआत कर रहा है। 

 आज के आंकड़े: तेल कितना महंगा हो गया? मध्य-पूर्व युद्ध की वजह से तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं। आज Brent Crude (जो भारत और एशिया के लिए मुख्य बेंचमार्क है) का भाव 112.50 से 115.28 USD प्रति बैरल के आसपास है। कुछ रिपोर्ट्स में यह 118 USD तक भी पहुंच चुका है।

 युआन में कितना होगा भाव? वर्तमान एक्सचेंज रेट: 1 USD ≈ 6.91 CNY (30 मार्च 2026)।

 - 1 बैरल Brent Crude (113 USD) ≈ 781 युआन

 - 100 बैरल ≈ 78,100 युआन

- 1,000 बैरल ≈ 7,81,000 युआन (लगभग 7.81 लाख युआन) 

- अगर कोई देश 1 मिलियन बैरल तेल खरीदता है तो युआन में खर्च होगा लगभग 78.1 करोड़ युआन। 

ये आंकड़े दिखाते हैं कि युआन में भाव बताने पर भी कीमत ऊंची बनी रहेगी, लेकिन चीन जैसे बड़े आयातक को डॉलर खरीदने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इससे डॉलर की मांग कम होगी और युआन की भूमिका बढ़ेगी। 

हार्मुज स्ट्रेट: ईरान का नया नियम स्ट्रेट ऑफ हार्मुज से दुनिया का 20-25% तेल गुजरता है। ईरान ने युद्ध के दौरान इस रूट को प्रभावित किया है। अब रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान कुछ टैंकरों को “सुरक्षित गुजर” की अनुमति दे रहा है, लेकिन शर्त है – तेल का व्यापार चीनी युआन में होना चाहिए।

 Lloyd’s List ने पुष्टि की कि कम से कम दो जहाजों ने युआन में टोल दिया है। ईरान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि डॉलर में व्यापार करने वाले टैंकरों पर भारी प्रतिबंध या टोल लग सकता है। ईरान आठ देशों के साथ इस मॉडल पर चर्चा कर रहा है। 

रूस पहले से ही युआन और रूबल में तेल बेच रहा है। चीन ईरानी और रूसी तेल युआन में खरीद रहा है। अब हार्मुज में भी युआन का दबदबा बढ़ रहा है। 

 पेट्रोडॉलर का डेथ वारंट क्यों? 1970 के दशक से पेट्रोडॉलर सिस्टम अमेरिका की आर्थिक ताकत का आधार रहा है। सऊदी अरब और ओपेक देश तेल डॉलर में बेचते थे, जिससे डॉलर की वैश्विक मांग बनी रहती थी। अमेरिका सस्ते में कर्ज ले पाता था और अपनी मुद्रा की ताकत बनाए रखता था। 

लेकिन अब:

 - रूस-ईरान-चीन गठबंधन डॉलर से दूर जा रहा है। 

- BRICS देश डी-डॉलराइजेशन पर जोर दे रहे हैं।

 - ईरान का युआन-आधारित टोल और तेल व्यापार पेट्रोडॉलर को सीधा चुनौती दे रहा है। 

- Deutsche Bank ने चेतावनी दी है कि यह युद्ध पेट्रोल्युआन के उदय का उत्प्रेरक बन सकता है।

 अगर हार्मुज का बड़ा हिस्सा युआन में व्यापार करने लगे तो डॉलर की मांग घटेगी। इससे अमेरिकी ब्याज दरें, कर्ज और वैश्विक महंगाई पर असर पड़ेगा। 

भारत पर क्या असर पड़ेगा? भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है। हमारी 85% जरूरतें आयात पर निर्भर हैं। 

- महंगाई  तेल महंगा होने से पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस और परिवहन महंगा होगा। खुदरा महंगाई फिर बढ़ सकती है। 

- रुपया डॉलर की मांग बनी रहेगी, लेकिन अगर युआन में व्यापार बढ़ा तो भारत को भी नए विकल्प सोचने पड़ सकते हैं।

 - रूस से सस्ता तेल: भारत रूस से रुपये या अन्य मुद्राओं में तेल खरीद रहा है, लेकिन हार्मुज रूट प्रभावित होने से सप्लाई चेन बाधित हो सकती है। 

- लंबी अवधि: अगर पेट्रोल्युआन मजबूत हुआ तो भारत को मुद्रा विविधीकरण (Dollar, Yuan, Rupee) पर ज्यादा ध्यान देना होगा। 

सरकार पहले से ही रूस, सऊदी और अन्य स्रोतों से तेल आयात बढ़ा रही है और नवीकरणीय ऊर्जा पर जोर दे रही है। 

 आगे क्या होगा? विश्लेषकों का अनुमान है कि अगर युद्ध लंबा खिंचा तो: 

- तेल की कीमतें 120-150 USD प्रति बैरल तक जा सकती हैं।

 - युआन में तेल अनुबंध बढ़ेंगे, खासकर शंघाई इंटरनेशनल एनर्जी एक्सचेंज (INE) पर। 

- डॉलर की रिजर्व मुद्रा की स्थिति पर दबाव बढ़ेगा, हालांकि अभी भी डॉलर सबसे मजबूत है।

 ट्रंप प्रशासन “मैक्सिमम प्रेशर” चला रहा है, लेकिन परिणाम उल्टे पड़ रहे हैं। ईरान की असममित रणनीति डॉलर को निशाना बना रही है। 

 नई विश्व व्यवस्था की शुरुआत ऑयल का भाव अब सिर्फ डॉलर में नहीं, बल्कि युआन में भी तय होने लगा है। यह बदलाव भू-राजनीतिक ताकत के संतुलन को बदल रहा है। चीन युआन को ग्लोबल एनर्जी ट्रेड में स्थापित करने की कोशिश में है, जबकि अमेरिका अपनी मुद्रा की प्रधानता बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। 

भारत जैसे देशों के लिए यह परीक्षा की घड़ी है। हमें ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करनी होगी, घरेलू उत्पादन बढ़ाना होगा और मुद्रा विविधीकरण पर काम करना होगा।

 पेट्रोडॉलर का युग धीरे-धीरे कमजोर पड़ रहा है। पेट्रोल्युआन की दस्तक सुनाई दे रही है। भविष्य बहु-ध्रुवीय (multipolar) व्यापार व्यवस्था का हो सकता है, जहां एक मुद्रा की बजाय कई मुद्राएं तेल व्यापार को नियंत्रित करेंगी। 

यह सिर्फ आर्थिक बदलाव नहीं, बल्कि नई वैश्विक शक्ति संरचना की शुरुआत है। दुनिया अब देख रही है – क्या डॉलर अपनी राजसी गद्दी बचा पाएगा या युआन नई राजधानी बनेगा? 

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World March 30,2026