मध्य पूर्व में छिड़े अमेरिका और ईरान के बीच के इस भयावह युद्ध ने पूरे क्षेत्र को हिला कर रख दिया है। 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले शुरू किए, जिसमें ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई सहित कई शीर्ष नेता मारे गए। इस हमले के जवाब में ईरान ने पूरे क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले तेज कर दिए हैं। लेकिन इस युद्ध का सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है इराक पर, जो दोनों तरफ से हमलों की चपेट में आ गया है। इराक अब एक ऐसे जाल में फंस गया है जहां एक तरफ ईरान समर्थित मिलिशिया अमेरिकी ठिकानों पर हमला कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ अमेरिका इन मिलिशिया के ठिकानों को निशाना बना रहा है। इराक की जमीन पर यह युद्ध रोजाना नए रूप में फैल रहा है, जिससे देश की सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और राजनीतिक स्थिरता पर गहरा संकट मंडरा रहा है।
इराक क्यों बन गया युद्ध का मुख्य मैदान? इराक की भौगोलिक स्थिति और उसकी आंतरिक संरचना ही इसे इस युद्ध का केंद्र बना रही है। यहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं, खासकर बगदाद, इरबिल और अन्य जगहों पर। साथ ही, ईरान समर्थित शिया मिलिशिया जैसे कताइब हिजबुल्लाह, असाइब अहल अल-हक और हरकत हिजबुल्लाह अल-नुजबा जैसी ताकतें यहां मजबूत पकड़ रखती हैं। ये मिलिशिया ईरान के 'एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस' का हिस्सा हैं और अमेरिका-इज़राइल हमलों के जवाब में उन्होंने इराक में अमेरिकी हितों पर हमले तेज कर दिए हैं।
युद्ध शुरू होने के कुछ घंटों के भीतर ही इराकी कुर्दिस्तान क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों पर ड्रोन और रॉकेट हमले शुरू हो गए। इरबिल, जो कुर्दिस्तान की राजधानी है, रोजाना ड्रोन हमलों का शिकार बन रहा है। यहां अमेरिकी सैन्य अड्डों के अलावा व्यावसायिक इलाके, होटल और यहां तक कि कैफे भी निशाना बने हैं। स्थानीय लोग बताते हैं कि बाजारों में बैठे लोग अचानक आकाश में ड्रोन की आवाज सुनते हैं, फिर विस्फोट होता है और धुआं उठता है। बगदाद में भी अमेरिकी दूतावास और डिप्लोमैटिक कंपाउंड पर हमले हो रहे हैं। एक तरफ ईरान समर्थित मिलिशिया अमेरिकी ठिकानों को निशाना बना रहे हैं, तो दूसरी तरफ अमेरिका ने जुरफ अल-सखर, अल-काइम और उत्तरी इराक के कई इलाकों में मिलिशिया बेस पर हवाई हमले किए हैं।
इराक अब एक अनोखी स्थिति में है—यह एकमात्र ऐसा देश है जहां युद्ध के दोनों पक्ष अपनी-अपनी कार्रवाई कर रहे हैं। ईरान और उसके प्रॉक्सी अमेरिकी हितों पर हमला कर रहे हैं, जबकि अमेरिका जवाबी कार्रवाई में मिलिशिया को निशाना बना रहा है। इससे इराक की जमीन पर रोजाना मौत और तबाही का मंजर बन रहा है।
इरबिल और बगदाद में रोजाना का आतंक उत्तरी इराक के कुर्द क्षेत्र में इरबिल सबसे ज्यादा प्रभावित है। यहां अमेरिकी कंसुलेट और सैन्य ठिकाने हैं, जो मिलिशिया के लिए प्रमुख लक्ष्य बने हुए हैं। मार्च 2026 की शुरुआत से ही इरबिल एयरपोर्ट के आसपास ड्रोन हमलों की घटनाएं बढ़ गई हैं। कई बार अमेरिकी वायु रक्षा प्रणाली ने ड्रोन को रोक लिया, लेकिन कुछ हमले सफल भी हुए। व्यावसायिक इलाकों और होटलों पर भी हमले हो रहे हैं, जिससे आम नागरिकों में दहशत फैली हुई है।
बगदाद में स्थिति और भी गंभीर है। अमेरिकी दूतावास पर मिसाइल और ड्रोन हमले हो चुके हैं। विक्ट्री बेस कॉम्प्लेक्स और अन्य अमेरिकी ठिकानों पर कताइब हिजबुल्लाह जैसे समूहों ने FPV ड्रोन हमले किए हैं, जो अमेरिकी रक्षा को चकमा दे रहे हैं। इन हमलों में अमेरिकी सैनिकों के हताहत होने की खबरें भी आई हैं।
इराक की सरकार की मजबूरी और टेंशन इराक की सरकार बार-बार कह रही है कि उसके देश की जमीन पर यह युद्ध नहीं लड़ा जाना चाहिए। प्रधानमंत्री मोहम्मद शिया अल-सुदानी और कुर्दिस्तान क्षेत्र की सरकार दोनों ने इसकी निंदा की है। लेकिन स्थिति उनके नियंत्रण से बाहर होती जा रही है। इराक में वर्तमान में कार्यवाहक सरकार है, क्योंकि राजनीतिक गतिरोध के कारण नई सरकार नहीं बन पा रही। पूर्व प्रधानमंत्री नूरी अल-मलिकी के नामांकन पर अमेरिका का विरोध और मिलिशिया से जुड़े नेताओं की मौजूदगी ने स्थिति जटिल बना दी है।
सरकार के पास मिलिशिया को नियंत्रित करने की सीमित शक्ति है। कई मिलिशिया पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्सेस (PMF) का हिस्सा हैं, जो सरकारी ढांचे में शामिल हैं। ऐसे में सरकार न तो अमेरिका को खुश कर पा रही है और न ही ईरान समर्थित समूहों को रोक पा रही है।
अर्थव्यवस्था पर सबसे गहरा असर इराक की अर्थव्यवस्था लगभग पूरी तरह तेल निर्यात पर निर्भर है। लेकिन इस युद्ध ने तेल निर्यात को बुरी तरह प्रभावित किया है। खाड़ी में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर खतरे और दक्षिणी तेल क्षेत्रों पर हमलों से निर्यात घट गया है। कई तेल क्षेत्र बंद हो गए हैं।
सरकार ने कुर्दिस्तान क्षेत्र से किर्कुक-जेयान पाइपलाइन के जरिए तेल निर्यात फिर शुरू करने की अपील की है। यह पाइपलाइन किर्कुक से तुर्की के जेयान बंदरगाह तक जाती है। सरकार रोजाना कम से कम 2.5 लाख बैरल तेल निर्यात करना चाहती है, लेकिन कुर्द नेतृत्व और केंद्र सरकार के बीच बातचीत अभी नतीजे पर नहीं पहुंची। कुर्दिस्तान क्षेत्र से तेल निर्यात अस्थायी रूप से रुक गया है, जिससे राजस्व में भारी कमी आई है।
कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि अमेरिका इराक के तेल राजस्व पर कब्जा कर रहा है और फंड रिलीज नहीं कर रहा, जिससे इराक आर्थिक संकट की ओर बढ़ रहा है। तेल आय अमेरिकी बैंकों में जमा होती है, और वर्तमान स्थिति में रिलीज में देरी हो रही है। अगर युद्ध लंबा खिंचा तो इराक गंभीर वित्तीय संकट में फंस सकता है।
मिलिशिया vs कुर्द: एक और मोर्चा युद्ध के साथ इराक में एक समानांतर संघर्ष भी चल रहा है। ईरान समर्थित मिलिशिया ने उत्तरी इराक में कुर्द समूहों को भी निशाना बनाया है। अमेरिका कुर्द समूहों को समर्थन देने पर विचार कर रहा है ताकि वे ईरान पर दबाव बना सकें। कुछ कुर्द नेताओं ने कहा है कि अमेरिकी समर्थन मिलने पर वे ईरान के अंदर भी कार्रवाई कर सकते हैं। इससे इराक में जातीय तनाव और बढ़ सकता है।
आगे क्या? निष्णातों का मानना है कि अगर अमेरिका-ईरान युद्ध लंबा चला तो इराक की स्थिति और खराब हो सकती है। आर्थिक झटका, राजनीतिक अस्थिरता, मिलिशिया की बढ़ती गतिविधियां और कुर्द-केंद्र विवाद मिलकर देश की मेहनत से हासिल की गई स्थिरता को खतरे में डाल सकते हैं। इराक पिछले कुछ वर्षों में आतंकवाद और गृहयुद्ध से उबर रहा था, लेकिन अब यह फिर से संकट की चपेट में है।
यह युद्ध सिर्फ इराक के लिए नहीं, पूरे मध्य पूर्व के लिए खतरा है। अगर स्थिति नियंत्रण से बाहर हुई तो क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकता है, जिसमें कई देश फंस सकते हैं। इराक की जनता अब रोज मौत के साए में जी रही है—एक तरफ अमेरिकी हमले, दूसरी तरफ ईरानी प्रॉक्सी। क्या इराक इस आग से बच पाएगा, या फिर फिर से तबाही का शिकार बनेगा? समय ही बताएगा।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World March 16,2026