17 मार्च 2026 की वह काली रात, जब अमेरिका-इजरायल की संयुक्त हवाई हमले में ईरान के सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव, दिग्गज राजनीतिज्ञ और दार्शनिक अली लारीजानी शहीद हो गए। 67 वर्ष की उम्र में, अपनी बेटी से मिलने के दौरान तेहरान के उपनगरीय इलाके में उनका आवास निशाना बना। इजरायल के रक्षा मंत्री इसराइल काट्ज ने इसे "सफल हमला" बताया, लेकिन ईरान ने इसे "शहादत" का दर्जा दिया। उनके साथ उनका बेटा मुर्तजा लारीजानी, सहायक अलीरजा बयात और कई सुरक्षाकर्मी भी शहीद हुए।
तेहरान की सड़कों पर लाखों लोग आंसुओं में डूबे, इंग्लाब स्क्वायर पर जनाजे में भीड़ उमड़ी। ईरान की मीडिया ने उन्हें "शहीद-ए-वतन" कहा, जो आखिरी सांस तक इस्लामी गणराज्य की रक्षा में डटा रहा। लेकिन अली लारीजानी सिर्फ एक नेता नहीं थे—वे एक विचार थे, एक हौसला थे, एक कुर्बानी थे।
जन्म से शहादत तक: एक बहुआयामी व्यक्तित्व की यात्रा** 3 जून 1958 को इराक के नजफ में जन्मे अली अर्दशीर लारीजानी एक प्रभावशाली धार्मिक-राजनीतिक परिवार से थे। उनके पिता आयतुल्लाह मिर्जा हाशिम आमली लारीजानी और भाई सादिक, मुहम्मद जवाद और बाकी लारीजानी—सभी ईरान की राजनीति और धर्म में प्रमुख थे। परिवार को "ईरान के केनेडी" कहा जाता था।
1979 की इस्लामी क्रांति के बाद लारीजानी ने इस्लामी रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) जॉइन किया। ईरान-इराक युद्ध (1980-88) में उन्होंने कमांडर के तौर पर हिस्सा लिया। युद्ध के बाद उनकी प्रतिभा चमकी—1994 से 1997 तक संस्कृति मंत्री, फिर 1994 से 2004 तक राज्य प्रसारक IRIB के प्रमुख। उन्होंने मीडिया को मजबूत बनाया, छह रेडियो और पांच टीवी चैनल शुरू किए।
2005 में राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद ने उन्हें परमाणु वार्ताकार बनाया। उन्होंने यूरोपीय संघ और IAEA से कड़ी बातचीत की। 2007 तक इस पद पर रहे, फिर 2008 से 2020 तक ईरान की संसद (मजलिस) के स्पीकर बने—तीन कार्यकाल तक। उन्होंने JCPOA (2015 परमाणु समझौता) को संसद से पास करवाया, जो ईरान की कूटनीतिक जीत थी।
2020 में एक्सपीडिएंसी डिसर्नमेंट काउंसिल में शामिल हुए। 2025 में सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल (SNSC) के सचिव बने। आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत (28 फरवरी 2026) के बाद, युद्ध के शुरुआती दिनों में वे de facto नेता बन गए। उन्होंने ईरान की रणनीति संभाली—रूस-चीन से गठजोड़, गल्फ देशों से बातचीत, परमाणु और क्षेत्रीय नीतियां।
योगदान और कुर्बानियां: ईरान की शान में उनका अमर स्थान**
- सुरक्षा और रणनीति**: SNSC के सचिव के रूप में उन्होंने ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत किया। युद्ध में उन्होंने जवाबी कार्रवाई की रणनीति बनाई, खाड़ी में तेल ठिकानों पर हमले की योजना तैयार की।
- कूटनीति का चेहरा: JCPOA में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण थी। उन्होंने पश्चिम से बातचीत की, लेकिन कभी झुके नहीं। 25-वर्षीय चीन समझौते में भी उनका हाथ था।
- दार्शनिक गहराई**: इमैनुएल कांट पर किताबें लिखीं, अहमद फरिद के शिष्य रहे। वे विचारक थे, जो राजनीति में बुद्धि लाए।
- प्रतिरोध का प्रतीक**: अमेरिका-इजरायल के सामने कभी नहीं झुके। मौत से पहले भी उन्होंने चेतावनी दी—"नेताओं की हत्या से ईरान मजबूत होगा।"
उनकी शहादत ने ईरान को एकजुट किया। लाखों लोग सड़कों पर निकले, "लारीजानी जिंदा है, प्रतिरोध में" के नारे लगाए।
शहादत का संदेश: इतिहास उन्हें कभी नहीं भूलेगा
अली लारीजानी सिर्फ एक पदाधिकारी नहीं थे—वे ईरान की आत्मा थे। उन्होंने IRGC से लेकर संसद, मीडिया से लेकर परमाणु वार्ता तक हर मोर्चे पर सेवा की। युद्ध के समय जब खामेनेई शहीद हुए, उन्होंने देश संभाला। दुश्मन ने सोचा हत्या से ईरान टूट जाएगा, लेकिन उनकी शहादत ने नई ऊर्जा दी।
आज ईरान युद्ध में है, लेकिन लारीजानी की विरासत जीवित है। उनका नाम इज्जत, हिम्मत, वफादारी का प्रतीक है। वे कुर्बान हुए, लेकिन ईरान की मजबूती अमर हो गई।
शहीद अली लारीजानी को सलाम!
ईरान की शान, प्रतिरोध के सिपाही—आपकी याद हमेशा रहेगी। खिराज-ए-अकीदत—आपके लिए, आपके बलिदान के लिए, आपके विचार के लिए।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World March 19,2026