भारतीय लोकतंत्र की कहानी आजकल एक दोहराव वाले नाटक जैसी लगती है—विरोध की आवाज़ उठाओ, लेबल लगाओ 'देशद्रोही' या 'एजेंट', सख्त कानूनों के सहारे जेल में डाल दो, महीनों तक रखो, और फिर जब अदालत सवाल खड़े करे या मामला उलझने लगे, तो 'फेस-सेविंग' रिहाई कर दो। कल तक जिसे 'राष्ट्र-विरोधी' करार दिया जाता था, आज वही 'संवाद के लिए रास्ता खोलने' का बहाना बन जाता है। सोनम वांगचुक की रिहाई इसी पैटर्न की ताज़ा मिसाल है, और यह पैटर्न अरविंद केजरीवाल जैसे नेताओं के साथ पहले भी देखा जा चुका है। सवाल यह नहीं कि रिहाई हुई या नहीं—सवाल यह है कि क्या अब विरोध करने की सजा सिर्फ़ जेल ही रह गई है?
सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी: एक शांतिपूर्ण आवाज़ को दबाने की कोशिश सितंबर 2025 में लद्दाख की राजधानी लेह में राज्यhood और छठी अनुसूची की मांग को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। ये प्रदर्शन हिंसक हो गए, जिसमें चार लोगों की मौत हुई और कई घायल हुए। लेकिन प्रदर्शन के मुख्य नेता सोनम वांगचुक—जिन्हें 'आइस स्टूपा' जैसे पर्यावरणीय प्रयोगों और शिक्षा सुधार के लिए जाना जाता है—ने हमेशा अहिंसा पर ज़ोर दिया। फिर भी, 26 सितंबर 2025 को उन्हें नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA) के तहत गिरफ्तार कर लिया गया। NSA एक preventive detention कानून है, जो बिना ट्रायल के एक साल तक जेल में रखने की इजाज़त देता है।
सरकार ने दावा किया कि वांगचुक के 'उकसावे भरे बयान'—जिनमें नेपाल के आंदोलन और अरब स्प्रिंग का ज़िक्र था—ने हिंसा भड़काई। उन्हें 'पाकिस्तान से जुड़े' होने का आरोप भी लगाया गया, और जेल जोधपुर सेंट्रल जेल में शिफ्ट कर दी गई। सोशल मीडिया पर उन्हें 'चीन का एजेंट' या 'देशद्रोही' कहकर ट्रोल किया गया। लेकिन क्या ये आरोप ठोस थे? क्या कोई FIR, चार्जशीट या सबूत पेश किया गया? नहीं। यह preventive detention थी—यानी 'भविष्य में खतरा हो सकता है' के आधार पर।
छह महीने तक—लगभग 170 दिन—वांगचुक जेल में रहे। उनकी पत्नी गीतांजलि जांगमो ने सुप्रीम कोर्ट में हेबियस कॉर्पस याचिका दायर की। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सख्त सवाल उठाए। सरकार के वकीलों से पूछा गया कि बयानों का गलत मतलब निकालकर NSA क्यों लगाया? क्या वाकई 'राष्ट्रीय सुरक्षा' को खतरा था? कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रशासन बयानों का गलत अनुवाद या व्याख्या कर रहा है। मामले में AI का इस्तेमाल करके बयानों का अनुवाद करने का दावा भी किया गया, लेकिन कोर्ट ने इसे संदिग्ध माना।
14 मार्च 2026 को, ठीक सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई से ठीक पहले, गृह मंत्रालय ने NSA हटा दिया और वांगचुक को तत्काल रिहा कर दिया। आधिकारिक बयान में कहा गया: "लद्दाख में शांति, स्थिरता और आपसी विश्वास का माहौल बनाने के लिए... और सभी हितधारकों से सार्थक संवाद की सुविधा के लिए।" वांगचुक ने NSA की अधिकतम अवधि का लगभग आधा समय काट लिया था। लेकिन सवाल वही है—अगर खतरा नहीं था, तो छह महीने क्यों?
अरविंद केजरीवाल के साथ समानता: एक ही स्क्रिप्ट, अलग किरदार यह पैटर्न नया नहीं है। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को भी इसी तरह महीनों तक जेल में रखा गया। दिल्ली Excise Policy मामले में ED और CBI ने PMLA जैसे सख्त कानूनों का इस्तेमाल किया। केजरीवाल को 'मुख्यमंत्री' पद पर रहते हुए गिरफ्तार किया गया, चुनावों से ठीक पहले। आरोप थे भ्रष्टाचार के, लेकिन बेल मिलने में देरी होती रही। अदालतों ने बार-बार सवाल उठाए कि क्या गिरफ्तारी 'राजनीतिक' है? आखिरकार, रिहाई हुई—कई मामलों में डिस्चार्ज भी। दोनों मामलों में समानताएं साफ हैं:
- **सख्त कानूनों का हथियार बनाना** — NSA (preventive detention) और PMLA (money laundering) दोनों ही ऐसे कानून हैं जहां bail मिलना मुश्किल होता है। इनका इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों या आंदोलनकारियों को 'निष्क्रिय' करने के लिए।
- **महीनों की हिरासत बिना ट्रायल** — वांगचुक छह महीने, केजरीवाल भी लंबे समय तक। उद्देश्य: आंदोलन या पार्टी को कमजोर करना।
- **अदालत की फटकार पर रिहाई** — जैसे ही मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और कोर्ट ने गंभीर सवाल पूछे, सरकार ने 'पीछे हटना' बेहतर समझा। यह 'कानूनी हार' से बचने का तरीका है।
- **मीडिया और IT सेल का रोल** — गिरफ्तारी के समय 'देशद्रोही' या 'भ्रष्ट' का लेबल लगाकर बदनामी, रिहाई पर चुप्पी या 'शांति के लिए' का नैरेटिव।
लोकतंत्र का संकट: विरोध की कीमत जेल? यह सिर्फ दो व्यक्तियों की कहानी नहीं है। यह एक बड़े पैटर्न का हिस्सा है—जिसमें पर्यावरणविद्, पत्रकार, छात्र नेता, विपक्षी नेता सभी शामिल हैं। सत्ता को लगता है कि IT सेल और मीडिया के ज़रिए किसी को भी बदनाम किया जा सकता है। लेकिन जब अदालत आईना दिखाती है, तो मजबूरी में रिहाई हो जाती है।
जनता अब समझ रही है। रिहाई के बाद वांगचुक के भाई ने कहा, "सत्य की जीत होगी।" केजरीवाल के मामले में भी अदालत ने कई बार 'राजनीतिक बदले की भावना' पर टिप्पणी की। लेकिन सवाल बाकी है: क्या लोकतंत्र में विरोध की जगह सिर्फ जेल बची है? क्या न्यायपालिका ही आखिरी उम्मीद है?
सोनम वांगचुक की रिहाई न्याय की जीत कम और सरकार की मजबूरी ज्यादा है। यह दिखाता है कि सत्ता का अहंकार कितना भी बड़ा हो, संविधान और अदालत के सामने झुकना पड़ता है। लेकिन जेल और रिहाई का यह चक्र बंद कब होगा? जब तक सत्ता विरोध को 'खतरा' नहीं, बल्कि 'लोकतंत्र का हिस्सा' मानेगी, तब तक यह खेल चलता रहेगा।
भारतीय लोकतंत्र मजबूत है, लेकिन इसे बचाने के लिए हमें सवाल पूछते रहना होगा। क्योंकि अगर विरोध की कीमत जेल हो गई, तो लोकतंत्र सिर्फ नाम का रह जाएगा।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World March 14,2026