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Friday, 3 April 2026

भारत की सांस्कृतिक एकता का अनुपम उदाहरण: लखनऊ के छोटा इमामबाड़ा में अयातुल्लाह सैय्यद अली हुसैनी खमनाई को खिराजे अकीदत

भारत की सांस्कृतिक एकता का अनुपम उदाहरण: लखनऊ के छोटा इमामबाड़ा में अयातुल्लाह सैय्यद अली हुसैनी खमनाई को खिराजे अकीदत
-Friday World-April 3,2026
लखनऊ, 1 अप्रैल 2026 — उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के ऐतिहासिक छोटा इमामबाड़ा (हुसैनाबाद) में एक भावुक और यादगार मजलिस का आयोजन किया गया। इस मजलिस में ईरान के शहीद रहबर अयातुल्लाह सैय्यद अली हुसैनी खमनाई साहब की शहादत पर गहरी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। कार्यक्रम में विभिन्न धर्मों और समुदायों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया, जिसमें हिंदू धर्मगुरु स्वामी सारंग साहब का खमनाई साहब को खिराजे अकीदत पेश करना सबसे चर्चित रहा। ईरानी दूतावास के प्रतिनिधि डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही साहब भी इस मौके पर मौजूद रहे और उन्होंने मजलिस को संबोधित किया। 

यह आयोजन न केवल शिया समुदाय की आस्था का प्रतीक था, बल्कि भारत की गंगा-जमुनी तहजीब और धार्मिक सद्भावना का जीवंत उदाहरण भी साबित हुआ। जहां एक तरफ ईरानी संस्कृति और इस्लामी मूल्यों को याद किया गया, वहीं दूसरी तरफ हिंदू संत ने मंच साझा कर साबित किया कि सच्ची आस्था और मानवता की सेवा में कोई धर्म बाधा नहीं बनता। 

 छोटा इमामबाड़ा: इतिहास और पवित्रता का संगम 

लखनऊ का छोटा इमामबाड़ा नवाबी काल की शानदार विरासत है। 19वीं शताब्दी में नवाब मुहम्मद अली शाह द्वारा बनवाया गया यह इमामबाड़ा अपनी अनोखी वास्तुकला, चमकदार कांच की नक्काशी, चांदनी रातों में जगमगाती रोशनी और करबला की याद दिलाने वाले माहौल के लिए विश्व प्रसिद्ध है। हर साल मुहर्रम के दौरान यहां लाखों श्रद्धालु जुटते हैं। इस बार अप्रैल 2026 में यहां आयोजित मजलिस ने इमामबाड़े को एक नया आयाम दिया — जहां शोक और श्रद्धांजलि के साथ-साथ अंतरधार्मिक एकता का संदेश भी गूंजा।

 मजलिस में बड़ी संख्या में शिया भाई-बहन, उलेमा, विद्वान और आम लोग शामिल हुए। माहौल गमगीन लेकिन सम्मानपूर्ण था। नोहे, मरसिये और खिताबात ने पूरे परिसर को भावुक कर दिया। 

 ईरानी दूतावास के प्रतिनिधि डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही की उपस्थिति 

ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह खमनाई साहब के प्रतिनिधि के रूप में डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही साहब ने मजलिस में शिरकत की। उन्होंने खमनाई साहब की शहादत पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि वे उन आवाम की आवाज थे जिनकी अपनी कोई आवाज नहीं थी। डॉ. हकीम इलाही ने खमनाई साहब के सिद्धांतों — न्याय, मुजाहिदीन की रक्षा, साम्राज्यवाद विरोध और इस्लामी मूल्यों की रक्षा — को याद किया।

 उन्होंने बताया कि ईरान में चुनौतियों के बावजूद खमनाई साहब की विचारधारा जीवित है और ईरानी राष्ट्र उनकी शहादत के बाद भी मजबूती से आगे बढ़ रहा है। उनकी उपस्थिति ने मजलिस को अंतरराष्ट्रीय महत्व प्रदान किया और भारत-ईरान के सांस्कृतिक व धार्मिक संबंधों को मजबूत करने का संदेश दिया। 

हिंदू धर्मगुरु स्वामी सारंग साहब का भावुक खिराजे अकीदत

 कार्यक्रम का सबसे यादगार पल तब आया जब जनाब स्वामी सारंग साहब (श्री स्वामी सारंग मोहिले जी, ग्लोबल पीस फाउंडेशन के संस्थापक) ने मंच संभाला। गेरुआ वस्त्र में सजे स्वामी जी ने अयातुल्लाह खमनाई साहब को अपनी गहरी श्रद्धांजलि अर्पित की। 

स्वामी सारंग साहब ने कहा कि सच्चे रहबर वह होते हैं जो न केवल अपने समुदाय की रक्षा करते हैं बल्कि पूरी मानवता के लिए न्याय की लड़ाई लड़ते हैं। उन्होंने खमनाई साहब की बहादुरी, उनके दृष्टिकोण और दमितों की आवाज बनने की प्रशंसा की। स्वामी जी की यह भागीदारी भारत की उस परंपरा को मजबूत करती है जिसमें संत-महात्मा हमेशा से सभी धर्मों के दुख-दर्द में शामिल होते रहे हैं। 

स्वामी सारंग साहब पहले भी मुहर्रम की अशूरा जुलूस में शामिल हो चुके हैं और विभिन्न अंतरधार्मिक कार्यक्रमों में सक्रिय रहते हैं। उनकी यह पहल साबित करती है कि “धर्म मानव सेवा के लिए है, मानव सेवा धर्म के लिए नहीं”। 

 मजलिस का महत्व: सद्भावना का प्रतीक यह मजलिस केवल शोक सभा नहीं थी, बल्कि भारतीय सभ्यता की व्यापकता का प्रमाण थी। यहां हिंदू, मुस्लिम, शिया-सुन्नी सब एक मंच पर खड़े थे। मौलाना कल्बे जवाद साहब जैसे स्थानीय उलेमा ने भी स्वामी सारंग साहब का स्वागत किया और एकता का संदेश दिया। 

कार्यक्रम में “We Stand with Iran” जैसे नारे भी लगे, जो फिलिस्तीन और अन्य न्यायपूर्ण मुद्दों पर ईरान की भूमिका को रेखांकित करते थे। यह आयोजन याद दिलाता है कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में धार्मिक सहिष्णुता ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है। 

खमनाई साहब की विरासत: न्याय और प्रतिरोध की मिसाल 

अयातुल्लाह सैय्यद अली हुसैनी खमनाई ईरान के सर्वोच्च नेता के रूप में दशकों तक अपनी राष्ट्र की सेवा करते रहे। उन्होंने इस्लामी क्रांति की रक्षा की, साम्राज्यवादी ताकतों का डटकर मुकाबला किया और गरीब-मजलूम देशों की आवाज बने। उनकी शहादत के बाद भी उनकी विचारधारा दुनिया भर के मुसलमानों और न्यायप्रिय लोगों को प्रेरित कर रही है। 

लखनऊ की यह मजलिस उनकी याद को अमर बनाने का एक छोटा सा प्रयास था। डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही साहब ने कहा कि खमनाई साहब उन लोगों की आवाज थे जिनकी अपनी कोई आवाज नहीं थी — चाहे वह फिलिस्तीन हो, यमन हो या कोई भी दमित क्षेत्र। 

भारत-ईरान संबंधों में नई ऊर्जा भारत और ईरान के बीच प्राचीन सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। चंद्रगुप्त मौर्य काल से लेकर आधुनिक समय तक दोनों देशों ने एक-दूसरे की संस्कृति, कला और दर्शन से प्रेरणा ली है। स्वामी सारंग साहब की उपस्थिति और ईरानी प्रतिनिधि का आना इन संबंधों को नई मजबूती प्रदान करता है।

 यह घटना सिखाती है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी भारत के विभिन्न समुदाय एकजुट होकर अपनी सहानुभूति जता सकते हैं। 

एकता ही समाधान है लखनऊ के छोटा इमामबाड़ा में आयोजित यह मजलिस सिर्फ एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सद्भावना, सहिष्णुता और मानवता का संदेश था। हिंदू संत द्वारा ईरानी रहबर को श्रद्धांजलि अर्पित करना उन लाखों भारतीयों की भावना को प्रतिबिंबित करता है जो मानते हैं कि सच्ची आस्था सीमाओं से परे होती है।

 स्वामी सारंग साहब, डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही साहब और सभी शामिल उलेमा-मशायख को बधाई। आशा है कि ऐसी पहलें भविष्य में भी जारी रहेंगी और भारत को दुनिया के लिए सद्भावना का संदेश देने में मदद करेंगी। 

“जब धर्म एकता सिखाता है, तब मानवता जीतती है।”

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World-April 3,2026