फरवरी 2026 के अंत से मध्य पूर्व में एक नया युद्ध छिड़ गया है। 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल ने संयुक्त रूप से ऑपरेशन एपिक फ्यूरी (Operation Epic Fury) शुरू किया। इस अभियान में सैकड़ों हवाई हमले और मिसाइलें ईरान के सैन्य ठिकानों, बैलिस्टिक मिसाइल सुविधाओं, एयर डिफेंस सिस्टम और नेतृत्व पर दागी गईं। ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनी सहित कई उच्च अधिकारी शहीद हो गए। ईरान ने जवाब में इजरायल पर मिसाइल और ड्रोन की बौछार की, साथ ही क्षेत्रीय अमेरिकी ठिकानों और खाड़ी देशों पर हमले किए।
यह तनाव अब छठे सप्ताह में प्रवेश कर चुका है। मिसाइल हमलों, हवाई कार्रवाइयों और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज संकट ने पूरे क्षेत्र में एंटी-इजरायल और एंटी-अमेरिका भावना को भड़का दिया है। तुर्की के इस्तांबुल में आज (7 अप्रैल 2026) इजरायली कांसुलेट के पास गोलीबारी की घटना इसी उबलते गुस्से का नतीजा लगती है।
युद्ध की शुरुआत और प्रमुख घटनाएं
28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने लगभग 900 हमले किए। इनमें B-2 स्टेल्थ बॉम्बर, टॉमहॉक मिसाइलें और इजरायली फाइटर जेट शामिल थे। लक्ष्य थे: ईरान का न्यूक्लियर और बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम, कमांड सेंटर और सैन्य इंफ्रास्ट्रक्चर।
ईरान की प्रतिक्रिया तेज और व्यापक थी। उसने इजरायल पर सैकड़ों मिसाइल और ड्रोन दागे। कुछ मिसाइलों में क्लस्टर मुनिशन थे, जिनसे इजरायल के तेल अवीव, हाइफा, बनी ब्राक और पेटाह तिकवा जैसे इलाकों में नुकसान हुआ। ईरान ने खाड़ी देशों (कुवैत, बहरीन, सऊदी अरब, यूएई) में अमेरिकी ठिकानों और तेल इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी हमले किए। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को प्रभावित करके वैश्विक तेल आपूर्ति को खतरे में डाला गया।
अप्रैल 2026 तक स्थिति और गंभीर हो गई। ईरान ने इजरायल पर कई तरंगों में मिसाइल हमले जारी रखे। 3 अप्रैल को ईरान ने एक अमेरिकी F-15E फाइटर जेट को मार गिराया। पायलट को बचाने के लिए अमेरिकी हेलीकॉप्टर पर भी गोलीबारी हुई। इजरायल ने कुछ हमलों को रोकने के लिए अपनी हवाई रक्षा का इस्तेमाल किया, लेकिन पूर्ण सुरक्षा नहीं हो सकी।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को “स्टोन एज” में भेजने की धमकी दी और कहा कि अमेरिका अगले दो-तीन हफ्तों तक “बहुत जोरदार” हमले जारी रखेगा। उन्होंने ईरान से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खोलने की मांग की, अन्यथा ऊर्जा सुविधाओं पर हमले की चेतावनी दी।
क्षेत्र में बढ़ती एंटी-इजरायल और एंटी-अमेरिका भावना
इस युद्ध ने मध्य पूर्व की जनता में गहरा गुस्सा पैदा कर दिया है।
- ईरान में: सिविलियन मौतें (स्कूल, अस्पताल और आवासीय इलाकों पर असर) ने लोगों को भड़का दिया। तेहरान और अन्य शहरों में विरोध प्रदर्शन हुए। कई ईरानी नागरिकों ने अमेरिका-इजरायल को “आक्रांता” बताया।
- अरब देशों में: हालांकि कई खाड़ी देशों ने सार्वजनिक रूप से ईरान के हमलों की निंदा की, लेकिन वे युद्ध में फंसने से नाराज हैं। कुवैत और बहरीन जैसे देशों में ईरानी मिसाइलों से नुकसान हुआ, जिससे स्थानीय जनता में अमेरिकी नीतियों के खिलाफ भावना बढ़ी।
- तुर्की में: राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोगन पहले से ही इजरायल की नीतियों की आलोचना करते रहे हैं। आज इस्तांबुल के बेसिक्टास इलाके में इजरायली कांसुलेट के पास गोलीबारी हुई। तीन हमलावर मारे गए या घायल हुए, जबकि पुलिस अधिकारी भी घायल हुए। कोई इजरायली राजनयिक प्रभावित नहीं हुआ, लेकिन घटना क्षेत्रीय तनाव को दर्शाती है। तुर्की में पहले भी इजरायली दूतावासों के बाहर प्रदर्शन होते रहे हैं।
- अन्य देश: लेबनान, यमन (हूती विद्रोहियों) और इराक में ईरान समर्थक समूहों ने हमले तेज कर दिए। पाकिस्तान में शिया समुदाय में एंटी-अमेरिका भावना बढ़ी। यूरोप और अमेरिका में भी विरोध प्रदर्शन हुए, जहां कई लोग युद्ध को “अनावश्यक” बता रहे हैं।
पोल्स दिखाते हैं कि अमेरिका में भी जनता युद्ध से थक चुकी है। कई सर्वे में 60% से ज्यादा लोग युद्ध को जल्द खत्म करने की मांग कर रहे हैं और जमीनी सैनिक भेजने का विरोध कर रहे हैं।
वैश्विक प्रभाव और मानवीय संकट
युद्ध ने हजारों मौतें की हैं। ईरान में 2000 से ज्यादा मौतें रिपोर्ट हुई हैं (सैन्य और सिविलियन दोनों)। इजरायल में सैकड़ों घायल हुए। लेबनान, गल्फ देशों में भी नुकसान हुआ। लाखों लोग विस्थापित हुए।
तेल की कीमतें बढ़ीं, वैश्विक अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने की आशंका ने ऊर्जा बाजार को हिला दिया।
मानवीय संगठनों ने चेतावनी दी कि सिविलियन मौतें और बुनियादी ढांचे का नुकसान “अनुपातहीन” है। स्कूलों, अस्पतालों और आवासीय इलाकों पर असर पड़ा है।
क्यों बढ़ रही है एंटी-इजरायल-एंटी-अमेरिका भावना?
1. सिविलियन क्षति: हमलों में आम नागरिकों की मौतें गुस्सा भड़का रही हैं।
2. क्षेत्रीय अस्थिरता: कई देश खुद को इस संघर्ष में घसीटा हुआ महसूस कर रहे हैं।
3. ऐतिहासिक संदर्भ: इजरायल-फिलिस्तीन मुद्दा, अमेरिकी नीतियां और ईरान के साथ पुराना विरोध।
4. सोशल मीडिया: वीडियो और तस्वीरें तेजी से फैल रही हैं, जो भावनाओं को और उकसा रही हैं।
5. राजनीतिक बयान: ट्रंप और नेतन्याहू के आक्रामक बयान विपरीत प्रभाव डाल रहे हैं।
यह भावना न सिर्फ सड़कों पर, बल्कि सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी दिख रही है। कई मुस्लिम देशों में प्रदर्शन हो रहे हैं। कुछ जगहों पर अमेरिकी और इजरायली झंडे जलाए जा रहे हैं।
आगे क्या?
युद्ध अभी जारी है। ईरान मिसाइल हमले जारी रखे हुए है, हालांकि उनकी संख्या और सटीकता कम हुई है। अमेरिका और इजरायल ने कहा है कि वे अपने लक्ष्यों (न्यूक्लियर प्रोग्राम रोकना, मिसाइल क्षमता कम करना) तक पहुंचने तक अभियान जारी रखेंगे।
कूटनीतिक प्रयास चल रहे हैं, लेकिन सफलता दूर दिख रही है। चीन और रूस ने अमेरिका-इजरायल की आलोचना की है, लेकिन बड़े हस्तक्षेप से बच रहे हैं।
यह तनाव दिखाता है कि मध्य पूर्व कितना संवेदनशील है। एक हमला पूरे क्षेत्र को आग में झोंक सकता है। एंटी-इजरायल और एंटी-अमेरिका भावना न सिर्फ सुरक्षा चुनौती है, बल्कि लंबे समय तक क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित करेगी।
अंत में, इतिहास सिखाता है कि युद्ध से ज्यादा समाधान बातचीत में छिपा होता है। लेकिन जब गुस्सा चरम पर हो, तो बातचीत मुश्किल हो जाती है। क्षेत्र की जनता शांति चाहती है, लेकिन राजनीतिक और सैन्य फैसले अक्सर उनके दर्द को बढ़ाते हैं।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 7,2026