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Monday, 6 April 2026

ईरान से गुजरात तक विशाल समुद्री टैंकर की यात्रा: कितना खर्च होता है ईंधन? जानिए, इन विशाल जहाजों का इंजन किस खास तेल पर चलता है!

ईरान से गुजरात तक विशाल समुद्री टैंकर की यात्रा: कितना खर्च होता है ईंधन? जानिए, इन विशाल जहाजों का इंजन किस खास तेल पर चलता है!
-Friday World-April 6,2026
क्या आपने कभी सोचा है कि ईरान के खार्ग द्वीप से गुजरात के वाडीनार बंदरगाह तक क्रूड ऑयल लाने वाले विशाल टैंकर जहाज आखिर किस ईंधन पर चलते हैं? ज्यादातर लोग समझते हैं कि ये जहाज भी हमारी गाड़ियों वाले पेट्रोल या डीजल पर दौड़ते होंगे। लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है। ये obelisk जैसे विशाल जहाज सामान्य डीजल का इस्तेमाल नहीं करते। इसके बजाय ये Heavy Fuel Oil (HFO) या बंकर फ्यूल नामक भारी और सस्ते ईंधन पर चलते हैं। 

यह लेख बताता है कि Heavy Fuel Oil क्या है, यह क्यों इस्तेमाल होता है, ईरान से गुजरात तक की एक यात्रा में कितना ईंधन जलता है और कुल खर्च कितना आता है। साथ ही, इससे होने वाले प्रदूषण और आने वाले बदलावों पर भी चर्चा करेंगे।

 Heavy Fuel Oil (HFO) या बंकर फ्यूल क्या है?

क्रूड ऑयल को रिफाइनरी में प्रोसेस करने के बाद जो सबसे भारी, गाढ़ा और चिपचिपा अवशेष बचता है, वही Heavy Fuel Oil कहलाता है। इसे Residual Fuel Oil भी कहा जाता है क्योंकि यह डिस्टिलेशन प्रक्रिया का अंतिम बचा हुआ हिस्सा होता है।

यह तेल इतना गाढ़ा होता है कि इसे पंप करके इंजन तक पहुंचाने के लिए पहले इसे लगभग 80-100 डिग्री सेल्सियस तक गर्म करना पड़ता है। गर्म करने के बाद ही यह पर्याप्त तरल बनता है और इंजन में अच्छे से जलता है।

Heavy Fuel Oil की खासियतें:
- ऊर्जा घनत्व— सामान्य डीजल की तुलना में इसमें ऊर्जा ज्यादा होती है, यानी एक लीटर HFO से ज्यादा पावर मिलती है।
- कीमत — यह सामान्य डीजल या गैसोलीन से करीब 30-50% सस्ता पड़ता है। यही वजह है कि लंबी समुद्री यात्राओं के लिए यह सबसे किफायती विकल्प है।
- उपयोग — बड़े जहाजों (जैसे VLCC - Very Large Crude Carrier या Suezmax टैंकर) के मुख्य इंजन खास तौर पर इस Heavy Fuel Oil को ध्यान में रखकर डिजाइन किए जाते हैं। इन इंजनों को Two-Stroke Marine Diesel Engines कहा जाता है, जो बहुत कम RPM पर चलते हैं लेकिन भारी लोड उठाने में माहिर होते हैं।

आजकल कई आधुनिक जहाजों में Scrubber लगाए जाते हैं, जो HFO के उच्च सल्फर को कम करते हैं। कुछ जहाज **Low Sulfur Fuel Oil (VLSFO) या LNG (Liquefied Natural Gas) पर भी शिफ्ट हो रहे हैं।

 ईरान से गुजरात तक की समुद्री दूरी और यात्रा का समय

ईरान के खार्ग आइलैंड (Kharg Island) से गुजरात के **वाडीनार (Vadinar)** बंदरगाह तक की समुद्री दूरी लगभग 1,100 से 1,300 नॉटिकल मील (लगभग 2,000-2,400 किलोमीटर) है। 

- एक सामान्य टैंकर इस दूरी को तय करने में 4 से 6 दिन का समय लेता है (लादेन स्थिति में, यानी क्रूड ऑयल लेकर जाते समय)।
- जहाज की गति आमतौर पर 12-15 नॉट (लगभग 22-28 किमी/घंटा) रहती है।
- यात्रा के दौरान मौसम, currents और सुरक्षा कारणों से गति में बदलाव हो सकता है।

 एक यात्रा में कितना ईंधन खर्च होता है?

विशाल टैंकरों (खासकर VLCC या बड़े Suezmax) का ईंधन उपभोग इस प्रकार है:

- दैनिक खपत: लादेन (लोडेड) स्थिति में एक VLCC जहाज रोजाना 60 से 100 मीट्रिक टन Heavy Fuel Oil इस्तेमाल कर सकता है। खाली (बैलास्ट) यात्रा में यह थोड़ा कम, लगभग 50-70 टन हो सकता है।
-ईरान-गुजरात एक तरफा यात्रा: 4-6 दिनों में कुल 200 से 500 मीट्रिक टन ईंधन खर्च हो सकता है (औसतन 300-400 टन माना जा सकता है, जहाज के साइज और स्पीड पर निर्भर)।

नोट: 1 मीट्रिक टन Heavy Fuel Oil की घनत्व लगभग 0.95-1.01 kg/liter होती है, यानी 1 टन ≈ 990-1,050 लीटर। इसलिए 300 टन ≈ 3,00,000 लीटर के आसपास।

 वर्तमान में ईंधन का खर्च कितना आता है?

Heavy Fuel Oil (HFO/IFO 380) की कीमत बाजार में लगातार बदलती रहती है। 2026 में वैश्विक औसत कीमत (अप्रैल तक) HSFO (High Sulfur) के लिए लगभग 700-850 USD प्रति मीट्रिक टन के आसपास है (कुछ जगहों पर इससे ज्यादा भी)। VLSFO (Low Sulfur) और ज्यादा महंगा है।

भारतीय रुपये में (1 USD ≈ ₹83 मानकर):

- 1 टन HFO ≈ ₹58,000 से ₹70,000 (औसत ₹65,000 मानें)।
- 300 टन ईंधन का खर्च ≈ ₹1.95 करोड़ (न्यूनतम) से ₹3 करोड़ तक।
- अगर 400-500 टन खर्च हो तो खर्च **₹2.6 करोड़ से ₹3.5 करोड़** तक पहुंच सकता है।

एक तरफा यात्रा का अनुमानित ईंधन खर्च: ₹2 से 3.5 करोड़ रुपये (जहाज के आकार, स्पीड और वर्तमान बंकर कीमत पर निर्भर)।

ध्यान दें: यह सिर्फ ईंधन (बंकर) का खर्च है। कुल यात्रा लागत में किराया (freight), पोर्ट चार्जेस, क्रू वेतन, रखरखाव आदि भी जुड़ते हैं। लेकिन ईंधन अक्सर कुल वॉयेज कॉस्ट का 40-70% हिस्सा होता है।

Heavy Fuel Oil से भारी प्रदूषण क्यों?

Heavy Fuel Oil में सल्फर, नाइट्रोजन और अन्य अशुद्धियां ज्यादा होती हैं। जब यह जलता है तो:

- SOx (सल्फर ऑक्साइड)— अम्ल वर्षा और श्वास संबंधी बीमारियां।
- NOx और पार्टिकुलेट मैटर — वायु प्रदूषण।
- CO2 — ग्लोबल वार्मिंग में योगदान।

IMO 2020 नियम के बाद जहाजों को 0.5% से कम सल्फर वाला ईंधन इस्तेमाल करना पड़ता है (या scrubber लगाना पड़ता है)। 2026 में भी कई नए नियम (जैसे flashpoint safety और कुछ क्षेत्रों में अतिरिक्त ECA) लागू हो रहे हैं। 

आधुनिक जहाज अब LNG, Methanol या Hybrid सिस्टम की ओर बढ़ रहे हैं, लेकिन HFO अभी भी सबसे सस्ता विकल्प होने के कारण लोकप्रिय है। इससे तेल कंपनियों का मुनाफा बढ़ता है और अंत में हमारा पेट्रोल-डीजल सस्ता रहता है।

 निष्कर्ष: क्यों मायने रखती है यह जानकारी?

ईरान से गुजरात तक क्रूड ऑयल लाने वाले इन टैंकरों का ईंधन खर्च सीधे भारत की ऊर्जा सुरक्षा और पेट्रोलियम उत्पादों के दामों से जुड़ा है। Heavy Fuel Oil की बचत तेल कंपनियों को फायदा पहुंचाती है, लेकिन पर्यावरण की कीमत भी चुकानी पड़ती है। 

जैसे-जैसे IMO के सख्त नियम लागू होंगे, जहाजों का ईंधन मिश्रण बदलता जाएगा। LNG और कम सल्फर वाले विकल्प बढ़ेंगे, जिससे खर्च थोड़ा बढ़ सकता है लेकिन हवा साफ होगी।

अगली बार जब आप पेट्रोल पंप पर गाड़ी भरवाएं, तो याद रखें – उस पेट्रोल तक पहुंचाने में हजारों किलोमीटर दूर से आने वाले विशाल टैंकर ने भारी तेल जलाया होगा, जो आपकी कार के डीजल-पेट्रोल से बिल्कुल अलग है!

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-April 6,2026