-Friday World-April 1,2026
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ईरान पर सैन्य अभियान के फैसले को लेकर अब खुद अमेरिका में तीखी आलोचना शुरू हो गई है। ट्रंप के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) जॉन बोल्टन— जो लंबे समय से ईरान के खिलाफ सख्त नीति के कड़े समर्थक रहे हैं — ने भी ट्रंप की रणनीति और सोच पर जमकर हमला बोला है।
एक इंटरव्यू में जॉन बोल्टन ने साफ कहा, “राष्ट्रपति को शायद यह लग गया था कि वे वेनेजुएला की तरह ईरान में भी तेजी से तख्तापलट कर देंगे। लेकिन अगर उन्होंने ऐसा सोचा था, तो यह पूरी तरह गलत साबित हुआ।”
बोल्टन ने आरोप लगाया कि ट्रंप किसी ठोस प्लानिंग या लंबी अवधि की रणनीति के बिना बड़े सैन्य फैसले ले लेते हैं। वे आवेश में आकर काम करते हैं, जो बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।
ट्रंप की दिमागी हालात पर सवाल ?
जॉन बोल्टन ने ट्रंप की पूरी कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि उनके पहले कार्यकाल के दौरान भी उन्हें स्पष्ट चेतावनी दी गई थी कि ईरान में रेजीम चेंज के प्रयास करने से **होर्मुज स्ट्रेट** और फारस की खाड़ी में तेल आपूर्ति पर बड़ा खतरा पैदा हो सकता है।
आज जब ईरान होर्मुज स्ट्रेट को प्रभावित करने की धमकी दे रहा है और वैश्विक तेल बाजार अस्थिर हो गया है, तब बोल्टन की वह चेतावनी और ज्यादा प्रासंगिक लग रही है।
फिर भी बोल्टन ने अमेरिकी सशस्त्र बलों के प्रदर्शन की तारीफ करते हुए कहा कि अब तक के सैन्य हमले काफी प्रभावशाली रहे हैं। ईरान की सैन्य क्षमता, कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम और एयर फोर्स को भारी नुकसान पहुंचा है। लेकिन उन्होंने चेतावनी दी कि खाड़ी क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही के लिए खतरा अभी भी बरकरार है और पूर्ण विजय अभी दूर है।
नेतन्याहू ने ट्रंप को धकेला? — बोल्टन का साफ इनकार
कई विपक्षी नेता आरोप लगाते हैं कि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ट्रंप को इस युद्ध में धकेल दिया। जॉन बोल्टन ने इस दावे को भी सीधे खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि नेतन्याहू ट्रंप को “भटका” सकते हैं, ऐसी बात में कोई दम नहीं है। ईरान पर हमले का अंतिम फैसला पूरी तरह ट्रंप का अपना था।
बोल्टन का कहना है कि ट्रंप को कोई दूसरा व्यक्ति या देश आसानी से प्रभावित नहीं कर सकता। वे अपनी “अमेरिका फर्स्ट” फिलॉसफी और आवेग पर चलते हैं, जो कभी-कभी रणनीतिक भूलों की ओर ले जाता है।
ट्रंप की रणनीति में बड़ी खामियां बोल्टन ने ट्रंप पर आरोप लगाया कि वे युद्ध के अंतिम लक्ष्य (endgame) के बारे में भी स्पष्ट नहीं हैं। एक तरफ वे तेज विजय और रेजीम चेंज की बात करते हैं, तो दूसरी तरफ होर्मुज स्ट्रेट जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर पर्याप्त तैयारी नहीं है।
बोल्टन ने कहा, “ईरान वेनेजुएला नहीं है — इसका राजनीतिक तंत्र, सैन्य क्षमता और क्षेत्रीय प्रभाव बहुत जटिल है।”
उन्होंने चेतावनी दी कि अगर अमेरिका युद्ध को अधूरा छोड़कर पीछे हट गया और ईरानी रेजीम को “घायल जानवर” की तरह जिंदा रहने दिया, तो वह फिर से परमाणु कार्यक्रम, आतंकवाद और होर्मुज बंद करने की क्षमता के साथ वापस आएगा।
अमेरिकी सेना की ताकत और भविष्य की चिंता बोल्टन ने अमेरिकी सेना के हमलों की सराहना की है, लेकिन उन्होंने जोर दिया कि सैन्य विजय और राजनीतिक विजय दो अलग चीजें हैं। ईरान की विचारधारा अभी भी अक्षुण्ण है और रेजीम चेंज का असली काम अभी पूरा नहीं हुआ है।
यह आलोचना ट्रंप प्रशासन के लिए असुविधाजनक साबित हो रही है, क्योंकि बोल्टन जैसे व्यक्ति — जो ईरान के खिलाफ सख्त नीति के मजबूत समर्थक रहे हैं — भी ट्रंप की कार्यपद्धति को खतरनाक और अनुचित बता रहे हैं।
वैश्विक प्रभाव और भारत के लिए संदेश यह विवाद पूरी दुनिया को एक महत्वपूर्ण सबक दे रहा है कि बड़े सैन्य फैसले लेते समय आवेश की बजाय रणनीतिक गणना ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। ईरान जैसे देश के साथ संघर्ष वेनेजुएला जैसे छोटे देशों जितना आसान नहीं है। इसकी प्रभाव वैश्विक तेल बाजार, व्यापार मार्गों और क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ता है।
भारत के लिए यह स्थिति एक चेतावनी है। अमेरिका के साथ मजबूत संबंध रखते हुए भी विविधतापूर्ण और स्वतंत्र विदेश नीति अपनाना जरूरी है। एकतरफा निर्भरता भविष्य में अप्रत्याशित जोखिम ला सकती है।
जॉन बोल्टन की यह आलोचना ट्रंप प्रशासन के लिए असुविधा का कारण बन गई है। एक तरफ युद्ध के सैन्य परिणामों की तारीफ, दूसरी तरफ रणनीतिक असफलता की आलोचना — इन दोनों के बीच अमेरिका की ईरान नीति फिलहाल उलझी हुई दिख रही है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 1,2026