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Wednesday, 1 April 2026

‘हिसाब चुकता कर लेंगे— ईरान युद्ध में NATO सहयोगियों से मुंह मोड़ने पर अमेरिका ने बजाई खतरे की घंटी, अमेरिकन विदेश नीति की हालत गंभीर!!

‘हिसाब चुकता कर लेंगे— ईरान युद्ध में NATO सहयोगियों से मुंह मोड़ने पर अमेरिका ने बजाई खतरे की घंटी, अमेरिकन विदेश नीति की हालत गंभीर!!
-Friday World -April 1,2026 
अमेरिकी विदेश नीति में एक नया और खतरनाक मोड़ आ गया है। ईरान के खिलाफ चल रहे सैन्य अभियान में यूरोपीय देशों ने जब अमेरिका को खुला सैन्य सहयोग देने से इनकार कर दिया, तो वाशिंगटन ने साफ चेतावनी दे दी — युद्ध समाप्त होने के बाद NATO के साथ अपने संबंधों पर **पूर्ण पुनर्विचार** किया जाएगा।

 अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने अल जजीरा को दिए विशेष साक्षात्कार में कहा कि अगर सहयोगी देश अमेरिका के हितों के लिए अपने ठिकानों और हवाई क्षेत्र का उपयोग नहीं करने देते, तो ऐसे “एकतरफा” गठबंधन का क्या फायदा? रुबियो के शब्दों में — “अमेरिका और राष्ट्रपति इस पूरे मामले का पुनर्मूल्यांकन करेंगे।”

 यह बयान महज गुस्सा नहीं, बल्कि ट्रांस-अटलांटिक संबंधों में गहरे दरार का संकेत है। राष्ट्रपति **डोनाल्ड ट्रंप** ने तो और भी सख्त लहजे में NATO सहयोगी देशों को “COWARDS” (डरपोक) करार दिया और Truth Social पर लिखा — “हम याद रखेंगे!” 

 हॉर्मुज स्ट्रेट: विवाद की असली जड़ विवाद की शुरुआत स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से हुई — विश्व के तेल व्यापार की धमनी, जहां से करीब 20% वैश्विक तेल गुजरता है। ईरान ने युद्ध के दौरान इस रणनीतिक जलडमरूमध्य को प्रभावी रूप से बंद कर दिया, जिससे वैश्विक तेल कीमतें आसमान छूने लगीं। 

ट्रंप ने NATO और अन्य सहयोगी देशों से अपील की कि वे युद्धपोत और सैन्य सहायता भेजकर इस मार्ग को फिर से खोलने में मदद करें। लेकिन फ्रांस, स्पेन, जर्मनी और कई अन्य यूरोपीय देशों ने साफ इनकार कर दिया। स्पेन ने अमेरिकी विमानों के लिए अपना हवाई क्षेत्र बंद कर दिया, इटली ने लैंडिंग की अनुमति नहीं दी। जर्मनी ने कहा — “यह हमारा युद्ध नहीं है।” 
         ट्रंप ने अपना दिमागी संतुलन खो दिया 
ट्रंप ने गुस्से में पोस्ट किया — “वे तेल की ऊंची कीमतों की शिकायत करते हैं, लेकिन हॉर्मुज खोलने में मदद करने को तैयार नहीं। इतना आसान काम, इतना कम जोखिम... फिर भी डरपोक!” 

रुबियो की सख्त चेतावनी रुबियो ने स्पष्ट कहा कि युद्ध समाप्त होने के बाद हॉर्मुज “एक तरह से या दूसरे तरीके से” खुलना ही चाहिए। उन्होंने ईरान की संप्रभुता की मांग को खारिज करते हुए कहा कि या तो ईरान अंतरराष्ट्रीय कानून मान लेगा, या फिर अमेरिका के नेतृत्व में एक गठबंधन इसे खोल देगा। 

साथ ही उन्होंने NATO पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि सहयोगी देशों का यह रवैया “बहुत निराशाजनक” है। रुबियो ने चेतावनी दी — “इस ऑपरेशन के बाद अमेरिका को NATO के साथ अपने रिश्ते की समीक्षा करनी होगी।” 

ट्रंप भी लगातार कह रहे हैं कि अमेरिका NATO की मदद के बिना भी आगे बढ़ सकता है। उन्होंने गठबंधन को “कागजी बाघ” (Paper Tiger) बताया और कहा कि यूरोप रक्षा खर्च कम करके अमेरिका पर बोझ डालता है। 

 NATO पर उठते सवाल यह विवाद NATO के आर्टिकल 5 की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़ा कर रहा है — “एक पर हमला, सभी पर हमला”। अगर यूरोप आज अमेरिका के मध्य पूर्व हितों में सहयोग नहीं कर रहा, तो कल यूरोप पर कोई खतरा हुआ तो अमेरिका कितना साथ देगा? 

विश्लेषकों का मानना है कि यह सिर्फ ईरान युद्ध की बात नहीं है। ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” नीति लंबे समय से NATO को चुनौती दे रही है। युद्ध के बाद अगर अमेरिका अपनी सैन्य प्रतिबद्धताएं कम करता है या NATO से दूरी बनाता है, तो यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित होगी — खासकर रूस के बढ़ते प्रभाव के बीच। 

युद्ध के बाद का नया विश्व व्यवस्था ईरान युद्ध अब “हफ्तों में” समाप्त होने की ओर है, जैसा कि रुबियो ने संकेत दिया। लेकिन युद्ध समाप्ति के बाद का परिदृश्य और भी जटिल हो सकता है। अमेरिका हॉर्मुज को सुरक्षित रखने के लिए नया गठबंधन बनाने की बात कर रहा है, जिसमें यूरोप को आगे आना होगा।

 ट्रंप प्रशासन का संदेश साफ है — गठबंधन दोनों तरफ से फायदेमंद होना चाहिए। अगर सहयोगी देश केवल सुरक्षा लेते हैं और जब अमेरिका को जरूरत पड़ती है तो मुंह मोड़ लेते हैं, तो वाशिंगटन अब ऐसा बर्दाश्त नहीं करेगा। 

 भारत के लिए सबक यह पूरा घटनाक्रम भारत जैसे देशों के लिए महत्वपूर्ण संदेश है। अंतरराष्ट्रीय गठबंधन हितों पर टिके होते हैं, न कि स्थायी दोस्ती पर। अमेरिका के साथ मजबूत संबंध बनाते समय विविधतापूर्ण और स्वतंत्र विदेश नीति अपनाना जरूरी है। एकतरफा निर्भरता भविष्य में खतरनाक साबित हो सकती है।

 ट्रंप का “हम याद रखेंगे” वाला बयान सिर्फ यूरोप के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए है — अमेरिका अब अपने हितों को किसी भी कीमत पर प्राथमिकता देगा। 

क्या NATO इस तनाव को झेल पाएगा? या ईरान युद्ध के बाद ट्रांस-अटलांटिक गठबंधन में स्थायी दरार पड़ जाएगी? आने वाले दिनों में जवाब मिलेगा। लेकिन एक बात तय है — पुराना विश्व व्यवस्था तेजी से बदल रहा है, और “अमेरिका फर्स्ट” अब सिर्फ नारा नहीं, बल्कि सक्रिय नीति बन चुका है। 

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World -April 1,2026