Breaking

यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Sunday, 17 May 2026

अपने ही घर में बेगाने - बुलडोज़र राज में उजड़ते 15 लाख सपने

अपने ही घर में बेगाने - बुलडोज़र राज में उजड़ते 15 लाख सपने -Friday World-17 May 2026
पिछले एक साल का हिसाब लगाइए। देश के अलग-अलग शहरों, कस्बों और गांवों में अवैध निर्माण कहकर करीब ढाई से तीन लाख मकान और दुकानें ज़मींदोज़ कर दी गईं। ये कोई युद्ध का आंकड़ा नहीं है। न भूकंप आया, न बाढ़ आई, न किसी बाहरी मुल्क ने हमला किया। फिर भी एक अनुमान के मुताबिक बारह से पंद्रह लाख लोग रातों-रात बेघर या बेरोज़गार हो गए। 

एक औसत परिवार में पांच लोग मान लें तो हर टूटे मकान के साथ पांच जिंदगियां सड़क पर आईं। किसी की तीन पीढ़ियों की जमा-पूंजी मलबा बन गई। किसी का वो ठेला टूटा जिससे दो वक्त की रोटी चलती थी। किसी की दुकान गिरी तो साथ में बच्चों की स्कूल फीस, बूढ़े माँ-बाप की दवाई और घर की EMI भी दब गई।

बिना युद्ध का विस्थापन

दुनिया के इतिहास में विस्थापन के दो बड़े कारण रहे हैं: युद्ध या प्राकृतिक आपदा। हम तीसरा मॉडल बना रहे हैं - नीतिगत विस्थापन। इसे चलाने के लिए न टैंक चाहिए न मिसाइल। एक नोटिस, एक बुलडोज़र और कुछ घंटों का समय काफी है। 

सुप्रीम कोर्ट बार-बार कह चुका है कि बिना उचित प्रक्रिया के किसी का आशियाना नहीं तोड़ा जा सकता। नोटिस देना, जवाब का वक्त देना, कानूनी विकल्प बताना ज़रूरी है। जमीन पर हकीकत अलग है। सुबह नोटिस चिपकता है, दोपहर तक सामान निकालने की मोहलत मिलती है, शाम तक छत नहीं बचती। 

सवाल अवैध निर्माण का है तो जवाब भी कानून से ही आना चाहिए। मगर जब चुन-चुन कर कार्रवाई होती है, जब बगल वाला शोरूम बच जाता है और पीछे वाली झुग्गी गिर जाती है, तो सवाल कानून पर नहीं, नीयत पर उठता है।

अर्थशास्त्र का मलबा

एक दुकान टूटती है तो सिर्फ एक शटर नहीं गिरता। उसके साथ चार कर्मचारी की नौकरी जाती है। सप्लायर का उधार डूबता है। पास की चाय वाली का ग्राहक कम होता है। ऑटो वाले की सवारी घटती है। एक मकान टूटता है तो किरायेदार बेघर होता है, उसके बच्चे का स्कूल छूटता है, बिजली-पानी का बिल बकाया रह जाता है। 

ढाई लाख निर्माण गिराने का मतलब है करीब 10-12 लाख प्रत्यक्ष नौकरियां खत्म होना। अप्रत्यक्ष असर जोड़ लें तो संख्या दोगुनी। ये आंकड़ा किसी आतंकी हमले या दंगे से होने वाले नुकसान से बड़ा है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां बम नहीं गिरा, सरकारी मुहर गिरी है।

दुश्मन की तलाश कहाँ कर रहे हैं हम?

चुनाव आते ही हमें सीमा पार दुश्मन दिखने लगते हैं। कोई चीन से डराता है, कोई पाकिस्तान का नाम लेकर वोट मांगता है, कोई बांग्लादेशी घुसपैठ का हव्वा खड़ा करता है। टीवी पर बहस होती है, सोशल मीडिया पर नफरत बहती है, और हम ताली बजाते हैं। 

इसी बीच हमारे ही शहर में हमारे ही टैक्स से खरीदा बुलडोज़र हमारे ही घर पर चल जाता है। हमें उजाड़ने वाला कोई विदेशी नहीं है। फाइल पर साइन करने वाला अफसर इसी देश का है। आदेश देने वाला नेता हमारा ही चुना हुआ है। विस्थापित होने वाला नागरिक भी हम ही हैं।

ये कैसी विडंबना है कि हम 2000 किलोमीटर दूर बैठे ‘दुश्मन’ से तो नफरत कर लेते हैं, पर गली के नुक्कड़ पर खड़े उस तंत्र से सवाल नहीं पूछते जो हमारी छत छीन रहा है।

कानून या खौफ का औज़ार?

अवैध निर्माण गलत है। इस पर दो राय नहीं। शहरों की प्लानिंग ज़रूरी है। मगर कानून का मकसद सुधार होता है, संहार नहीं। रेगुलराइज़ेशन स्कीम, पेनल्टी लगाकर नक्शा पास करना, वैकल्पिक आवास देना - ये रास्ते भी कानून में हैं। 

मगर बुलडोज़र तेज़ है, लोकप्रिय है, टीवी पर फुटेज अच्छी आती है। ‘कड़क कार्रवाई’ का संदेश जाता है। किसे फर्क पड़ता है कि उस मलबे के नीचे किसी की तीन बेटियों की शादी का सपना दब गया। किसे फर्क पड़ता है कि 70 साल का बुज़ुर्ग अब किराए के एक कमरे में अपनी पूरी गृहस्थी समेटे बैठा है।

जब कार्रवाई का मकसद न्याय से ज़्यादा प्रदर्शन बन जाए, तो बुलडोज़र विकास का औज़ार नहीं, खौफ का प्रतीक बन जाता है।

चुप्पी की कीमत

सबसे खतरनाक बात ये नहीं कि मकान टूट रहे हैं। सबसे खतरनाक बात ये है कि हमें फर्क नहीं पड़ रहा। हम सोचते हैं - ‘मेरा घर तो सलामत है’। ‘वो तो अवैध थे, उनके साथ ठीक हुआ’। हम भूल जाते हैं कि कानून की प्रक्रिया अगर एक के लिए तोड़ी जा सकती है, तो कल हमारे लिए भी तोड़ी जा सकती है। 

आज जिस मोहल्ले में बुलडोज़र चल रहा है, हम वीडियो बनाकर शेयर कर देते हैं। कल जब वो हमारे दरवाज़े पर खड़ा होगा, तो वीडियो कौन बनाएगा? 

लोकतंत्र में सरकारें माई-बाप नहीं होतीं, सेवा-प्रदाता होती हैं। वोट देकर हमने उन्हें ठेका दिया है - सड़क, बिजली, पानी, सुरक्षा, रोज़गार का। घर तोड़ने का ठेका नहीं दिया। जब सेवा-प्रदाता ही संपत्ति का भक्षक बन जाए, और हम फिर भी ताली बजाएं, तो मूर्खता की परिभाषा बदलनी पड़ेगी।

रास्ता क्या है?

1. प्रक्रिया पहले, कार्रवाई बाद में: किसी भी निर्माण को गिराने से पहले 30 दिन का नोटिस, सुनवाई का मौका और अपील का अधिकार सुनिश्चित हो। सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन का अक्षरशः पालन हो।

2. पुनर्वास की गारंटी: अगर निर्माण वाकई अवैध है और हटाना ही विकल्प है, तो पहले वैकल्पिक आवास या दुकान दी जाए। उजाड़ने से पहले बसाना सीखें।

3. जवाबदेही तय हो: जिस अफसर ने अवैध निर्माण होने दिया, जिस नेता के संरक्षण में कॉलोनी बसी, उन पर भी कार्रवाई हो। सिर्फ गरीब की झुग्गी पर बुलडोज़र चलाना आसान न्याय है, सही न्याय नहीं।

4. नागरिक सतर्कता: अपना घर बचाने का सबसे पक्का तरीका है पड़ोसी का घर बचाना। आज चुप रहेंगे तो कल बोलने वाला कोई नहीं बचेगा। RTI डालिए, पार्षद से सवाल कीजिए, कोर्ट जाइए। लोकतंत्र स्पेक्टेटर स्पोर्ट नहीं है।

आखिरी बात

युद्ध में दुश्मन दिखता है। उसकी वर्दी अलग होती है, झंडा अलग होता है। गृह-युद्ध में दुश्मन भी अपना होता है, पर कम से कम पता तो होता है कि लड़ाई चल रही है। 

मगर ये कैसा समय है जहाँ बिना युद्ध के लाशें गिर रही हैं - सपनों की लाशें, भविष्य की लाशें, भरोसे की लाशें। और हम हैं कि सीमा पर तैनात दुश्मन का इंतज़ार कर रहे हैं। 

जो सरकारें छत देने के नाम पर वोट मांगती हैं, अगर वही छत छीनने लगें, तो नागरिक का पहला धर्म बनता है सवाल पूछना। क्योंकि जिस दिन सवाल मर जाएगा, उस दिन लोकतंत्र भी मलबा बन जाएगा। और मलबे पर कोई घर नहीं बसता। 

अगर इतने पर भी हम विचलित नहीं हैं, तो शायद हम दुश्मन देश के नहीं, अपनी ही बेखबरी के शिकार हैं। और बेखबरी की कोई वैक्सीन नहीं आती।

बस एक बार अपने गिरेबान में जरूर झांकिए कि अगला नंबर कहीं आपका तो नहीं।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-17 May 2026