दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण जलमार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ पर फिर से नियंत्रण स्थापित करने के लिए ब्रिटेन और फ्रांस ने दर्जनों देशों को एक मंच पर बुलाया है। यह कदम वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच उठाया गया है, जहां ईरान के साथ तनावपूर्ण स्थिति ने तेल आपूर्ति को प्रभावित किया है। हालांकि, कई यूरोपीय संघ के देश प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई से दूर रहने पर अड़े हुए हैं, जिससे गठबंधन की एकजुटता पर सवाल उठ रहे हैं।
संकट की पृष्ठभूमि
होर्मुज़ जलडमरूमध्य विश्व के कुल तेल व्यापार का लगभग 20% हिस्सा संभालता है। यहां से गुजरने वाला तेल मध्य पूर्व के तेल उत्पादक देशों से यूरोप, एशिया और अन्य बाजारों तक पहुंचता है। हाल के घटनाक्रमों—विशेषकर अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच संघर्ष—के कारण इस जलडमरूमध्य में नौवहन बाधित हुआ है। ईरान ने क्षेत्र में अपनी उपस्थिति मजबूत की, जबकि पश्चिमी देशों ने इसे “वैश्विक अर्थव्यवस्था को बंधक बनाने” की कोशिश बताया।
इस संकट के बीच यूके और फ्रांस ने नेतृत्व संभाला है। अप्रैल 2026 में लंदन और पेरिस में हुई बैठकों में 30 से 50 से अधिक देशों के सैन्य प्लानर्स और रक्षा अधिकारी शामिल हुए। ब्रिटिश रक्षा मंत्रालय के अनुसार, यह बैठकें “सख्ती से रक्षात्मक” बहुराष्ट्रीय मिशन की तैयारी के लिए हैं, जो युद्धविराम के बाद सक्रिय होगा।
यूके-फ्रांस की रणनीति
ब्रिटेन और फ्रांस इस मिशन को “स्वतंत्र और रक्षात्मक” बताते हुए आगे बढ़ रहे हैं। प्रमुख बिंदु:
- सैन्य योजना निर्माण: लंदन के नॉर्थवुड स्थित परमानेंट जॉइंट हेडक्वार्टर्स में दो दिवसीय सम्मेलन हुए, जहां 30+ देशों के प्लानर्स ने सैन्य क्षमताओं, कमांड स्ट्रक्चर, डिमाइनिंग (बारूदी सुरंग हटाने) और जहाजों की एस्कॉर्टिंग पर चर्चा की।
- योगदान: कई देश युद्धपोत, पर्सनल, एयर पोलिसिंग और डिमाइनिंग सपोर्ट देने को तैयार हैं।
- समय: मिशन केवल “स्थिर युद्धविराम” के बाद ही शुरू होगा, ताकि तत्काल युद्ध में शामिल न होना पड़े।
प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर और राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने संयुक्त बयान में कहा कि यह प्रयास “स्वतंत्र नौवहन की स्वतंत्रता” सुनिश्चित करने के लिए है। HMS ड्रैगन जैसे ब्रिटिश युद्धपोत क्षेत्र में पहले से तैनात किए जा रहे हैं।
यूरोपीय संघ में असहमति
यूके-फ्रांस की सक्रियता के बावजूद कई यूरोपीय देश प्रत्यक्ष सैन्य भूमिका से इनकार कर चुके हैं:
- जर्मनी, स्पेन, इटली और अन्य देशों ने स्पष्ट किया कि वे अमेरिका की अगुवाई वाले किसी भी ब्लॉकेड या आक्रामक कार्रवाई में शामिल नहीं होंगे।
- कई देश डिप्लोमेसी और गैर-सैन्य समाधानों पर जोर दे रहे हैं।
- NATO के कुछ सदस्य ट्रंप प्रशासन की योजनाओं से दूरी बनाए हुए हैं, इसे “अमेरिका का युद्ध” मानते हुए।
यह विभाजन यूरोप की रणनीतिक स्वायत्तता और अमेरिका पर निर्भरता के बीच की खाई को उजागर करता है। फ्रांस ने स्पष्ट किया कि कोई जबरन डिप्लॉयमेंट नहीं होगा, जबकि ब्रिटेन “सतर्क योजना” के तहत आगे बढ़ रहा है।
ईरान की चेतावनी
ईरान ने ब्रिटेन और फ्रांस को चेतावनी दी है कि कोई भी विदेशी युद्धपोत “तत्काल और निर्णायक जवाब” का सामना करेगा। ईरानी अधिकारी कहते हैं कि जलडमरूमध्य की सुरक्षा केवल उनकी जिम्मेदारी है और कोई बाहरी हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इस बीच, ईरान ने युद्धविराम के दौरान जलमार्ग को “खुला” रखने की घोषणा की, लेकिन विश्वास की कमी बनी हुई है।
वैश्विक प्रभाव
- तेल की कीमतें: संकट के दौरान तेल की कीमतें आसमान छू गईं, जिससे वैश्विक मुद्रास्फीति बढ़ी।
- आर्थिक जोखिम: एशिया के आयातक देश (चीन, भारत, जापान) सबसे अधिक प्रभावित हुए।
- भू-राजनीतिक: यह घटनाक्रम मध्य पूर्व में नई संरेखण बना रहा है। रूस और चीन जैसे देश पश्चिमी प्रयासों पर नजर रखे हुए हैं।
क्या है आगे का रास्ता?
विशेषज्ञों का मानना है कि सफलता डिप्लोमेसी पर निर्भर करेगी। सैन्य मिशन केवल बैकअप प्लान है, मुख्य फोकस स्थायी युद्धविराम और ईरान के साथ बातचीत पर होना चाहिए। यदि मिशन सक्रिय हुआ तो यह NATO जैसा गठबंधन नहीं, बल्कि “कोएलिशन ऑफ द विलिंग” जैसा होगा—जिसमें भागीदारी स्वैच्छिक रहेगी।
होर्मुज़ का मुद्दा सिर्फ एक जलडमरूमध्य नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय कानून और शक्ति संतुलन का प्रतीक बन गया है। यूके और फ्रांस की कोशिशें सराहनीय हैं, लेकिन यूरोप के भीतर गहराते विभाजन और ईरान की सख्ती चुनौती बनी हुई है।
: दुनिया इस संकट को नजरअंदाज नहीं कर सकती। होर्मुज़ खुला रहे, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था सांस ले सकेगी। लेकिन सैन्य रास्ता अपनाने से पहले सभी पक्षों को संयम बरतना होगा, वरना एक छोटी चिंगारी पूरे क्षेत्र को आग की लपटों में झोंक सकती है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-12May 2026