-Friday World-17 May 2026
डीजल-पेट्रोल के दाम रोज नई ऊंचाई छू रहे हैं। टीवी चैनल और अखबारों की स्क्रीन पर एक ही तर्क गूंजता है: "देखिए, अमेरिका में भी महंगा है, यूरोप में भी रेट आसमान पर हैं। हम तो फिर भी बेहतर हैं।" सवाल ये नहीं कि दूसरे देशों में क्या हो रहा है। सवाल ये है कि हमारे यहां दाम कम क्यों नहीं रखे जा सकते थे? स्थिर क्यों नहीं हो सकते थे? और हम चूके कहां?
1. चुनावी कैलकुलेटर पर रुके दाम, जनता के नाम पर खेल
पिछले कुछ महीनों में राज्यों के चुनाव थे। सब जानते हैं कि पेट्रोल-डीजल का दाम सीधे वोटर की जेब और मूड तय करता है। भाजपा सरकार ने साफ रणनीति अपनाई: चुनाव तक रेट फ्रीज रखो। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल 90 डॉलर बैरल पार कर गया, लेकिन यहां पंप पर रेट नहीं हिला। नतीजा? चुनाव निपटे, और अगले ही हफ्ते 10 दिन में 7 रुपये लीटर की बढ़ोतरी। ये कोई संयोग नहीं, सोची-समझी कैलकुलेशन है। डिमांड-सप्लाई का सिंपल नियम है। जब आप कृत्रिम तरीके से दाम रोकोगे, तो घाटा तेल कंपनियों का बढ़ेगा। वो घाटा चुनाव बाद एक साथ वसूला जाएगा। इसमें कोई रॉकेट साइंस नहीं।
2. सस्ते तेल का रास्ता था, हमने खुद बंद किया
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है। हम अपनी जरूरत का 85% तेल बाहर से मंगाते हैं। ऐसे में दाम तय करने वाली सबसे बड़ी चीज है: हम खरीद कहां से रहे हैं?
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद रूस ने अपना तेल डिस्काउंट पर बेचना शुरू किया। 30-35 डॉलर प्रति बैरल तक सस्ता। भारत ने मौके का फायदा उठाया। 2022-23 में हमारा 40% से ज्यादा तेल रूस से आने लगा। नतीजा: तेल कंपनियों की कॉस्ट घटी, सरकार पर सब्सिडी का बोझ कम हुआ। ईरान से भी पहले हम सस्ता तेल लेते थे।
लेकिन यहां विदेश नीति की मजबूरी आड़े आई। अमेरिका के दबाव, ट्रंप प्रशासन की धमकियां, CAATSA प्रतिबंध का डर। सरकार ने धीरे-धीरे रूस और ईरान से तेल कम करना शुरू किया। अब वेनेजुएला, अमेरिका, गल्फ देशों से ज्यादा दाम पर खरीद रहे हैं। लॉजिक सीधा है: जब आप 70 डॉलर वाला तेल छोड़कर 85 डॉलर वाला खरीदोगे, तो पंप पर दाम तो बढ़ेगा ही। ये बढ़ोतरी अंतरराष्ट्रीय बाजार की मजबूरी कम, अंतरराष्ट्रीय दबाव के सामने झुकने का नतीजा ज्यादा है।
3. बिका मीडिया का हाफ ट्रुथ
मीडिया का काम सवाल पूछना है। लेकिन आज के ज्यादातर चैनल और अखबार सरकार के पीआर एजेंट बने हुए हैं। वो रोज ग्राफ दिखाते हैं: "जर्मनी में पेट्रोल 200 रुपये लीटर, भारत में सिर्फ 105।"
लेकिन ये ग्राफ अधूरा है। ये ग्राफ ये नहीं बताता कि:
- जर्मनी की प्रति व्यक्ति आय भारत से 15 गुना ज्यादा है। उनके लिए 200 रुपये लीटर चुभता नहीं।
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- रूस से सस्ता तेल लेकर हम अपने यहां 90 रुपये लीटर रख सकते थे। वो विकल्प क्यों छोड़ा गया?
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- तेल पर केंद्र और राज्य मिलकर 55% से ज्यादा टैक्स वसूलते हैं। 2014 में कच्चा तेल 110 डॉलर था, तब पेट्रोल 72 रुपये था। आज कच्चा तेल 85 डॉलर है, पेट्रोल 105 रुपये है। ये गैप कहां गया?
मीडिया ये सवाल नहीं पूछता। क्योंकि उसका मकसद जानकारी देना नहीं, नैरेटिव सेट करना है। नैरेटिव ये कि "दाम बढ़ना मजबूरी है, सरकार क्या करे"।
4. 30% वाली भीड़ और ब्रेनवॉश का प्रोजेक्ट
हर देश में एक तबका होता है जो सत्ता के हर फैसले को सही ठहराता है। भारत में भी है। तेल महंगा? "देशहित में जरूरी है।" अदानी-अंबानी पर सवाल? "राष्ट्रविरोधी एजेंडा है।" ED की रेड? "भ्रष्टाचार पर चोट है।" चुनाव आयोग पर शक? "लोकतंत्र को बदनाम करने की साजिश है।"
ये 30% वाली भीड़ तैयार की गई है। दिन-रात चलने वाले न्यूज डिबेट, व्हाट्सएप फॉरवर्ड, और आईटी सेल का कंटेंट इसी भीड़ के लिए है। इनका काम डिफेंड करना है, सवाल पूछना नहीं। जब जनता का एक हिस्सा खुद ही सरकार का वकील बन जाए, तो सत्ता से जवाब कौन मांगेगा?
5. असली प्रॉब्लम दाम नहीं, रीढ़ की हड्डी है
डीजल-पेट्रोल के दाम सिर्फ एक बाय-प्रोडक्ट हैं। असली बीमारी है विदेश नीति में आत्मसमर्पण। जब आप अपने आर्थिक हित को छोड़कर दूसरों के इशारे पर तेल खरीदना तय करते हो, तो दाम बढ़ेंगे ही।
भारत को गुटनिरपेक्ष नीति की जरूरत थी। "हमारा तेल, हमारी शर्तें"। रूस सस्ता दे रहा है तो रूस से लो। ईरान तैयार है तो ईरान से लो। अमेरिका नाराज होता है तो डिप्लोमेसी से मैनेज करो। लेकिन हमने दबाव में आकर सबसे सस्ता ऑप्शन छोड़ा।
आज नतीजा सामने है। महंगाई बढ़ रही है। ट्रांसपोर्ट कॉस्ट बढ़ने से सब्जी, अनाज, हर चीज महंगी हो रही है। किसान का डीजल, फैक्ट्री का ट्रांसपोर्ट, आम आदमी का स्कूटर, सब पर बोझ है।
पर्दा हटाओ, हिसाब मांगो
तेल के दाम का गणित मुश्किल नहीं है। खरीद सस्ती जगह से, टैक्स कम करो, दाम काबू में रहेंगे। चुनाव के लिए दाम रोकोगे तो बाद में दोगुना बोझ पड़ेगा।
मीडिया अगर बिके नहीं, तो पूछेगा कि 2014 में 110 डॉलर कच्चा तेल होने पर पेट्रोल 72 था, आज 85 डॉलर पर 105 क्यों है? पूछेगा कि रूस-ईरान का सस्ता तेल छोड़कर महंगा तेल क्यों खरीदा जा रहा है?
जब तक जनता ये सवाल नहीं पूछेगी, जब तक 30% वाली भीड़ आंख बंद करके डिफेंड करती रहेगी, तब तक दाम बढ़ते रहेंगे। और टीवी पर एंकर चिल्लाता रहेगा: "दूसरे देशों में देखो, वहां ज्यादा महंगा है।"
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Sajjadali Nayani ✍
Friday World-17 May 2026