-Friday World -17 May 2026
भारत की आत्मा सदियों से बहुलवाद की है। यहां जैन, बौद्ध, हिंदू, सिख, इस्लाम सब एक साथ फले-फूले। लेकिन आज कुछ ताकतें प्राचीन जैन मंदिरों और धरोहरों को "हिंदू" करार देकर उन्हें अपने narrative में फिट करने की कोशिश कर रही हैं। क्या जैन मंदिरों को बदलकर, उनकी प्रतिमाओं को नया रूप देकर, उनके इतिहास को मिटाकर भारत वाकई हिंदू राष्ट्र बन जाएगा? या यह सांस्कृतिक एकता का अपमान और इतिहास की हत्या होगी?
हालिया मध्यप्रदेश हाई कोर्ट का भोजशाला (धारा, मध्य प्रदेश) फैसला इस बहस का ताजा उदाहरण है। जैन समाज का दावा है कि यह स्थान 22वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ की यक्षिणी अंबिका देवी से जुड़ा है। यहां आचार्य मानतुंग स्वामी ने भक्तामर स्तोत्र की रचना की थी। लेकिन कोर्ट के फैसले के बाद यह प्राचीन जैन धरोहर हिंदू मंदिर के रूप में घोषित हो गई।
भक्तामर स्तोत्र और भोजशाला: जैन परंपरा की अमिट गाथा
आचार्य मानतुंग स्वामी की कथा जैन भक्ति की मिसाल है। राजा भोज के काल में (लगभग 11वीं शताब्दी) उन्हें कैद किया गया। 48 तालों वाली जेल में बंद आचार्य ने भगवान आदिनाथ की स्तुति में भक्तामर स्तोत्र रचा। हर श्लोक के साथ एक ताला खुलता गया और आचार्य मुक्त हो गए। यह चमत्कार भक्ति की शक्ति दिखाता है।
जैन परंपरा के अनुसार, भोजशाला वह स्थान है जहां यह घटना हुई। यहां से प्राप्त अंबिका देवी की प्रतिमा (जिसे हिंदू पक्ष वाग्देवी/सरस्वती मानता है) ब्रिटिश म्यूजियम, लंदन में रखी है। इस प्रतिमा में जैन तीर्थंकर की आकृति स्पष्ट है, जो इसे जैन यक्षिणी अंबिका की पहचान देती है।
जैन समाज पूछता है — जब प्रतिमा जैन है, स्थान जैन गुरुकुल और स्तोत्र रचना से जुड़ा है, तो इसे हिंदू मंदिर क्यों घोषित किया जा रहा है? क्या यह सांस्कृतिक appropriation नहीं?
भोजशाला विवाद: तीन दावे, एक फैसला
भोजशाला-कमाल मौला परिसर पर हिंदू (सरस्वती मंदिर), मुस्लिम (मस्जिद) और जैन (अंबिका मंदिर/गुरुकुल) तीनों के दावे हैं। हाई कोर्ट ने मुख्य रूप से हिंदू पक्ष को माना, जैन और मुस्लिम याचिकाओं को खारिज किया। कोर्ट ने यहां तक कहा कि "जैनिज्म हिंदू धर्म की शाखा है"।
जैन पक्ष ने ASI सर्वे, प्रतिमाओं और ऐतिहासिक संदर्भों का हवाला दिया, लेकिन कोर्ट ने माना कि कोई ठोस पुरातात्विक सबूत जैन मंदिर होने का नहीं मिला। जैन समुदाय इसे अस्वीकार करता है। उन्होंने ब्रिटिश म्यूजियम की प्रतिमा, शिलालेख और परंपरा का जिक्र किया।
यह फैसला सिर्फ एक जगह का नहीं, बल्कि बड़े ट्रेंड का हिस्सा लगता है — जहां जैन तीर्थों, प्रतिमाओं और स्थानों को हिंदू संदर्भ में reinterpret किया जा रहा है।
भारत में जैन धरोहरों का गौरवशाली इतिहास
जैन धर्म भारत की सबसे प्राचीन परंपराओं में से एक है। 24 तीर्थंकर, अहिंसा, अपरिग्रह और कर्म सिद्धांत ने इसे अनूठा बनाया। जैन मंदिर भारत की वास्तुकला के शिखर हैं:
- देलवाड़ा जैन मंदिर (माउंट आबू): मार्बल की नक्काशी का चमत्कार।
- पालिताना और श्रवणबेलगोला: हजारों वर्ष पुरानी तपस्या और भक्ति के केंद्र।
- खजुराहो के जैन मंदिर: जहां जैन और हिंदू वास्तुकला साथ-साथ फली।
- राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक में सैकड़ों जैन तीर्थ।
ये मंदिर सिर्फ पूजा स्थल नहीं, ज्ञान, कला और शांति के केंद्र रहे। जैन व्यापारियों, विद्वानों और राजाओं ने इन्हें संरक्षित किया।
लेकिन कई जगहों पर आरोप है कि जैन प्रतिमाओं को हिंदू देवी-देवताओं के रूप में पुनर्स्थापित किया जा रहा है। अंबिका देवी को सरस्वती बनाना, जैन चरण चिह्नों को नजरअंदाज करना — ये चिंताजनक हैं।
सांस्कृतिक appropriation: खतरा या एकीकरण?
समर्थक कहते हैं — जैनिज्म और हिंदू धर्म में समानता है, दोनों एक-दूसरे से प्रभावित। कोर्ट ने भी यही कहा। लेकिन जैन समुदाय अलग पहचान की रक्षा चाहता है। जैन धर्म स्वतंत्र है — अपना दर्शन, तीर्थंकर, आचार्य परंपरा।
हिंदू राष्ट्र का नारा उठने के साथ minority धर्मों की धरोहरों पर दबाव बढ़ रहा है। क्या राष्ट्र बनाने के लिए दूसरे धर्मों की पहचान मिटानी पड़ेगी? सच्चा राष्ट्र तो विविधता में एकता से बनता है।
उदाहरण:
- कई जैन मंदिरों में हिंदू पूजा बढ़ रही है।
- पुरातात्विक खुदाई में जैन अवशेषों को हिंदू narrative में फिट किया जा रहा है।
- मीडिया और सोशल मीडिया पर जैन इतिहास को "हिंदू" बताया जा रहा है।
जैन समाज शांतिप्रिय है। वे अदालतों, शांतिपूर्ण प्रदर्शनों और जागरूकता से लड़ रहे हैं। लेकिन उनकी चुप्पी को कमजोरी न समझा जाए।
इतिहास की राजनीति: सबूत vs narrative
भोजशाला का इतिहास राजा भोज (परमार वंश) से जुड़ा है। वे विद्वान राजा थे, जिन्होंने संस्कृत शिक्षा को बढ़ावा दिया। बौद्ध, जैन और हिंदू सभी प्रभाव थे। 11वीं शताब्दी में भारत बहुलवादी था।
ASI रिपोर्ट में मंदिर अवशेष मिले, लेकिन जैन पक्ष कहता है कि जैन गुरुकुल भी मंदिर जैसा ही होता था। अंबिका प्रतिमा का जैन iconography (तीर्थंकर के साथ) इसे अलग पहचान देता है।
ब्रिटिश काल में कई artifacts लंदन भेजे गए। वे आज भी सच्चाई बयान कर रहे हैं।
क्या हिंदू राष्ट्र जैन-विरोधी होगा?
भारत का संविधान सभी को समान अधिकार देता है। Article 25-26 धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देते हैं। जैन समुदाय हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को चुनौती दे रहा है — अगर राष्ट्र का मतलब एक धर्म की प्रधानता है, तो यह लोकतंत्र के खिलाफ है।
सच्चा हिंदू राष्ट्र (अगर हो भी) तो inclusive होना चाहिए, जहां जैन, बौद्ध, सिख अपनी पहचान बनाए रखें। appropriation से एकता नहीं, विभाजन बढ़ेगा।
जैन समाज की अपील और भविष्य
जैन समाज ने भोजशाला पर पुनर्विचार की मांग की है। वे कहते हैं — प्रतिमा वापस लाएं, जैन पूजा का अधिकार दें, इतिहास को distort न करें।
भारत को आगे बढ़ना है तो:
1. सभी धार्मिक धरोहरों का संरक्षण।
2. पुरातत्व सर्वे transparent और inclusive।
3. इतिहास की किताबों में विविधता का सम्मान।
4. राजनीति से ऊपर उठकर सांस्कृतिक संवाद।
विविधता ही हमारी ताकत
जैन मंदिरों को बदलकर, उनकी कहानियों को चुराकर भारत हिंदू राष्ट्र नहीं बनेगा। बल्कि अपनी सभ्यता की जड़ों को कमजोर करेगा। भारत की महानता इसी में है कि यहां 24 तीर्थंकरों की अहिंसा, बुद्ध की करुणा, राम की मर्यादा, कृष्ण की गीता, गुरु नानक की एकता और सूफियों की प्रेम all inclusive हैं।
"जैन मंदिरों को बदलकर भारत बनेगा हिंदू राष्ट्र"— यह नारा खतरनाक है। सच्चा राष्ट्र उन सबकी रक्षा से बनेगा जिन्होंने इसे बनाया। जैन धरोहर जैनों की है, हिंदू धरोहर हिंदुओं की, और सब मिलकर भारत की।
आइए, appropriation की बजाय संरक्षण चुनें। विवाद की बजाय संवाद। विभाजन की बजाय एकता। तभी भारत सच्चा विश्वगुरु बनेगा।
यह लेख जागरूकता के लिए है। सांस्कृतिक विवादों में शांति और सत्य की राह अपनाएं। जय जिनेंद्र।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World -17 May 2026