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Sunday, 10 May 2026

ईरान का परमाणु कार्यक्रम अधूरा सौदा मंजूर नहीं: नेतन्याहू की दो टूक, ऊर्जा ठिकानों पर हमले की चेतावनी

ईरान का परमाणु कार्यक्रम अधूरा सौदा मंजूर नहीं: नेतन्याहू की दो टूक, ऊर्जा ठिकानों पर हमले की चेतावनी-Friday World-11 May 2026
इज़राइल और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है। इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिका को साफ शब्दों में कहा है कि ईरान के साथ होने वाला कोई भी परमाणु समझौता तब तक "पर्याप्त नहीं" होगा जब तक वह तेहरान के परमाणु कार्यक्रम को जड़ से खत्म न कर दे। अल-अरबिया की शनिवार की रिपोर्ट में अज्ञात सूत्रों के हवाले से यह बड़ा खुलासा हुआ है। 

नेतन्याहू की अमेरिका को दो टूक
रिपोर्ट के मुताबिक नेतन्याहू ने बाइडन प्रशासन को सीधा संदेश दिया है: आधे-अधूरे समझौते से इज़राइल की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होगी। उनका रुख साफ है, "पूर्ण निरस्त्रीकरण" यानी ईरान के पास यूरेनियम संवर्धन की कोई क्षमता ही न बचे। नेतन्याहू का मानना है कि 2015 का JCPOA जैसा समझौता सिर्फ समय खरीदने का जरिया था। उस डील में ईरान को कुछ पाबंदियों के साथ परमाणु कार्यक्रम जारी रखने की छूट थी, जबकि इज़राइल उसे अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानता है।

नेतन्याहू ने यह भी कहा कि वार्ता को जानबूझकर लंबा नहीं खींचा जाना चाहिए। इज़राइल को डर है कि लंबी बातचीत के दौरान ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को और आगे बढ़ा लेगा। 

युद्ध के अगले विकल्प तैयार 

अल-अरबिया के सूत्रों ने बताया कि इज़राइल ने ईरान के खिलाफ सैन्य विकल्पों की समीक्षा तेज कर दी है। इनमें सबसे अहम है ईरान के ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर हमला। ईरान की अर्थव्यवस्था तेल और गैस निर्यात पर टिकी है। असालुयेह गैस फील्ड, खार्ग आइलैंड तेल टर्मिनल और बंदर अब्बास रिफाइनरी जैसे ठिकाने निशाने पर हो सकते हैं। 

इज़राइल पहले भी ईरान के नतांज और फोर्दो परमाणु ठिकानों पर साइबर हमले और गुप्त ऑपरेशन कर चुका है। लेकिन ऊर्जा ढांचे पर सीधा हमला तनाव को नए स्तर पर ले जाएगा। इससे वैश्विक तेल कीमतों में उछाल आ सकता है और पूरा मध्य-पूर्व संघर्ष की चपेट में आ सकता है।

अमेरिका-ईरान वार्ता की पृष्ठभूमि
अमेरिका और ईरान के बीच पिछले कई महीनों से ओमान और कतर में अप्रत्यक्ष बातचीत चल रही है। अमेरिका चाहता है कि ईरान यूरेनियम संवर्धन 60% से घटाकर 3.67% पर लाए। बदले में ईरान पर लगे कुछ प्रतिबंध हटाए जाएंगे और उसके फ्रीज किए गए 6 अरब डॉलर रिलीज होंगे। 

लेकिन नेतन्याहू को इस फॉर्मूले पर भरोसा नहीं। उनका तर्क है कि ईरान ने पहले भी समझौतों की आड़ में गुप्त रूप से हथियार कार्यक्रम चलाया है। IAEA की हालिया रिपोर्ट भी चिंता बढ़ाती है। रिपोर्ट के मुताबिक ईरान के पास अब 142 किलो 60% संवर्धित यूरेनियम है। हथियार बनाने के लिए 90% संवर्धन चाहिए, और तकनीकी रूप से 60% से 90% तक पहुंचना कुछ हफ्तों का काम है।

इज़राइल की तीन बड़ी चिंताएं

1. ब्रेकआउट टाइम: ईरान परमाणु बम बनाने के लिए जरूरी सामग्री कितने समय में जुटा सकता है। इज़राइल का दावा है कि यह समय अब घटकर कुछ हफ्ते रह गया है। 

2. प्रॉक्सी नेटवर्क: हिजबुल्लाह, हूती और इराकी मिलिशिया के जरिए ईरान इज़राइल को चारों तरफ से घेर रहा है। 

3. बैलिस्टिक मिसाइल: ईरान के पास इज़राइल तक मार करने वाली मिसाइलें हैं। परमाणु हथियार के साथ ये मिसाइलें अस्तित्व का संकट बन जाएंगी।

आगे क्या होगा? तीन संभावित रास्ते

1. कूटनीतिक दबाव: अमेरिका इज़राइल को भरोसे में लेकर ईरान पर "स्नैपबैक" प्रतिबंधों की धमकी दे। यानी UN के पुराने सारे प्रतिबंध फिर से लागू हो जाएं। 

2. सीमित सैन्य कार्रवाई: इज़राइल सीरिया में ईरानी ठिकानों या ईरान के अंदर परमाणु वैज्ञानिकों को निशाना बनाए। यह "शैडो वॉर" पहले से चल रही है। 

3. बड़ा टकराव: अगर ईरान 90% संवर्धन की तरफ बढ़ा तो इज़राइल अकेले या अमेरिका के साथ मिलकर नतांज, फोर्दो और अराक रिएक्टर पर हवाई हमला कर सकता है। ऊर्जा ढांचे पर हमला इसी का हिस्सा होगा।

मध्य-पूर्व पर असर
अगर इज़राइल ने ईरान के तेल ठिकानों पर हमला किया तो हॉर्मुज जलडमरूमध्य बंद हो सकता है। दुनिया का 20% तेल यहीं से गुजरता है। ब्रेंट क्रूड 150 डॉलर प्रति बैरल पार जा सकता है। भारत जैसे देशों के लिए यह बड़ा झटका होगा जो अपनी जरूरत का 80% तेल आयात करते हैं।

सऊदी अरब और UAE भी सतर्क हैं। वे ईरान से तनाव नहीं चाहते, लेकिन इज़राइल के साथ अब्राहम समझौते के बाद संतुलन साधना मुश्किल हो रहा है। 

भारत के लिए क्यों अहम है यह मामला

1. ऊर्जा सुरक्षा: भारत ईरान से चाबहार पोर्ट के जरिए जुड़ा है। युद्ध हुआ तो यह प्रोजेक्ट फंस जाएगा। 

2. प्रवासी भारतीय: खाड़ी देशों में 90 लाख भारतीय काम करते हैं। संघर्ष बढ़ने पर उनकी सुरक्षा खतरे में पड़ेगी। 

3. तेल की कीमत: 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से भारत का आयात बिल 15 अरब डॉलर बढ़ जाता है।

निष्कर्ष: टकराव या समझौता?*
नेतन्याहू का बयान सीधा संकेत है कि इज़राइल अब "रेड लाइन" के बेहद करीब है। वह अमेरिका पर दबाव बना रहा है कि या तो डील में "जीरो एनरिचमेंट" की शर्त डलवाए, या फिर इज़राइल को सैन्य कार्रवाई की खुली छूट दे। 

ईरान ने भी जवाब दिया है कि वह अपने "शांतिपूर्ण परमाणु अधिकार" से पीछे नहीं हटेगा। सुप्रीम लीडर खामेनेई कह चुके हैं कि धमकियों से ईरान डरने वाला नहीं। 

अगले कुछ हफ्ते निर्णायक होंगे। अगर अमेरिका-ईरान बातचीत टूटी तो मध्य-पूर्व 1973 के बाद के सबसे बड़े संकट में फंस सकता है। और अगर कोई कमजोर समझौता हुआ तो इज़राइल अपने तरीके से "निरस्त्रीकरण" सुनिश्चित कर सकता है। दोनों ही सूरत में दुनिया की सांसें थमी हुई हैं।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World-11 May 2026