नई दिल्ली/चेन्नई/तिरुवनंतपुरम: भारतीय लोकतंत्र की सुंदरता तब नजर आती है जब चुनावी नतीजे आने के बाद विजेता और पराजित दोनों पक्ष शालीनता और परिपक्वता का परिचय दें। दक्षिण भारतीय राज्यों में यह परंपरा अभी भी जिंदा है, जबकि उत्तर भारत के कई हिस्सों में राजनीति व्यक्तिगत दुश्मनी, अपमान और बदले की भावना में बदल चुकी है। हाल के चुनावी परिणामों ने एक बार फिर इस अंतर को उजागर कर दिया है।
तमिलनाडु में टीएमके प्रमुख विजय की पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया। जीत के बाद विजय ने मुख्यमंत्री एमके स्टालिन से शिष्टाचार भेंट की। स्टालिन ने भी बिना किसी हिचकिचाहट के नई सरकार बनाने में सहयोग का आश्वासन दिया। केरल में सत्तारूढ़ एलडीएफ की हार के बाद पी. विजयन ने सत्ताधारी बनने वाले वी.डी. सतीशन से मुलाकात की। दोनों नेताओं के चेहरों पर मुस्कान थी, शिष्टाचार था और लोकतांत्रिक परंपरा का सम्मान था। ये दृश्य भारतीय राजनीति के लिए प्रेरणादायक हैं।
दक्षिण की राजनीति: सम्मान और निरंतरता
दक्षिण भारत की राजनीति में एक खास परिपक्वता दिखती है। यहां चुनाव हारने या जीतने के बाद भी विपक्षी नेताओं के प्रति सम्मान बना रहता है।
तमिलनाडु का उदाहरण सबसे बेहतरीन है। डीएमके और एआईएडीएमके के बीच लंबे समय से तीखी प्रतिद्वंद्विता रही है, फिर भी सत्ता हस्तांतरण हमेशा सुचारू रहा है। हालिया घटना में विजय ने स्टालिन से मुलाकात कर जो संदेश दिया, वह था – “हम प्रतिद्वंद्वी हैं, दुश्मन नहीं”। स्टालिन का सहयोगात्मक रवैया इस बात को दर्शाता है कि सत्ता लोकतंत्र की सेवा के लिए है, व्यक्तिगत अहंकार के लिए नहीं।
केरल में भी वामपंथी और कांग्रेस-केंद्रित गठबंधन के बीच वैचारिक मतभेद गहरे हैं। फिर भी मुख्यमंत्री पद संभालने से पहले सतीशन जी का पी. विजयन से मिलना और मुस्कुराते हुए बातचीत करना राजनीतिक संस्कृति की ऊंचाई दिखाता है। केरल की राजनीति में व्यक्तिगत अपमान की परंपरा लगभग न के बराबर है। यहां बहस मुद्दों पर होती है, व्यक्तियों पर नहीं।
कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में भी सत्ता परिवर्तन के दौरान शालीनता बरती जाती है। मुख्यमंत्री निवास को गंगाजल से शुद्ध करने या पिछले शासक को अपमानजनक उपाधियां देने जैसी घटनाएं दक्षिण में सोची भी नहीं जा सकतीं।
उत्तर की राजनीति: बदले की आग और अपमान की संस्कृति
दुर्भाग्य से उत्तर भारत, खासकर उत्तर प्रदेश में चीजें बिल्कुल उलट हैं। सत्ता बदलते ही पुरानी सरकार के कार्यों को नकारने, पिछले मुख्यमंत्रियों को “टोपी चोर”, “भ्रष्टाचारी” या इससे भी बदतर शब्दों से संबोधित करने की परंपरा बन गई है। मुख्यमंत्री निवास को गंगाजल से शुद्ध कराने जैसे प्रतीकात्मक कृत्य राजनीति को सांप्रदायिक और व्यक्तिगत प्रतिशोध का अखाड़ा बना देते हैं।
ये घटनाएं न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों का अपमान हैं, बल्कि राज्य की गरिमा को भी चोट पहुंचाती हैं। जब एक मुख्यमंत्री दूसरे को अपमानित करता है, तो संदेश यह जाता है कि सत्ता व्यक्तिगत साम्राज्य है, न कि जनसेवा का माध्यम। नतीजतन, विकास योजनाएं रुक जाती हैं, प्रशासनिक अधिकारी डर जाते हैं और जनता विभाजित हो जाती है।
क्यों अलग है दक्षिण?
इस अंतर के कई कारण हैं:
1. *lसामाजिक संरचना: दक्षिण में द्रविड़ आंदोलन और सुधारवादी विचारधारा ने जाति-धर्म से ऊपर उठकर राजनीति को मुद्दों पर केंद्रित किया।
2. शिक्षा और जागरूकता: दक्षिण के राज्यों में उच्च साक्षरता दर और सामाजिक जागरूकता ने परिपक्व मतदाता तैयार किए हैं जो प्रदर्शन पर वोट देते हैं, न कि भावनाओं पर।
3. नेतृत्व की परंपरा: पेरियार, अन्नादुरै, एमजीआर, करुणानिधि जैसी हस्तियों ने सम्मानजनक विरोध की संस्कृति विकसित की।
4. मीडिया और नागरिक समाज: दक्षिण में मीडिया और सामाजिक संगठन अक्सर नेताओं को जवाबदेह बनाते हैं और अपमानजनक राजनीति की आलोचना करते हैं।
उत्तर में सामंती सोच, जातीय-धार्मिक ध्रुवीकरण और छोटे-छोटे मुद्दों पर वोट बैंक बनाने की आदत ने राजनीति को जहरीला बना दिया है।
लोकतंत्र के लिए खतरा
जब राजनीति शिष्टाचार खो देती है, तो संस्थाएं कमजोर पड़ती हैं। नौकरशाही, पुलिस और न्यायपालिका पर दबाव बढ़ता है। विकास रुक जाता है। युवा पीढ़ी राजनीति से विमुख हो जाती है। दक्षिण भारत इस खतरे से अभी बच सका है, लेकिन उत्तर के लिए चेतावनी का समय आ गया है।
सकारात्मक बदलाव की उम्मीद
कुछ उत्तर भारतीय नेता इस दिशा में सोच रहे हैं। हाल के वर्षों में कुछ राज्यों में सत्ता हस्तांतरण अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहा है। अगर उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्य दक्षिण की राजनीतिक संस्कृति से प्रेरणा लें तो पूरे देश का लोकतंत्र मजबूत होगा।
राजनीति खेल है – मैच हारने के बाद भी खिलाड़ी हाथ मिलाते हैं, जर्सी बदलते हैं और अगले मैच की तैयारी करते हैं। दक्षिण भारत यही कर रहा है।
शिष्टाचार ही असली राजनीति है
दक्षिण भारत की राजनीति हमें याद दिलाती है कि असली लोकतंत्र विरोध का सम्मान करने में है। स्टालिन-विजय की मुलाकात हो या विजयन-सतीशन की मुस्कान, ये क्षण भारतीय लोकतंत्र की सबसे सुंदर तस्वीर हैं।
उत्तर भारत को अब इन मिसालों से सीखने की जरूरत है। गंगाजल शुद्धिकरण और अपमान वाली राजनीति को त्यागकर विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पर फोकस करना चाहिए। जब तक हम हार-जीत के बाद हाथ नहीं मिलाएंगे, देश की प्रगति अधूरी रहेगी।
दक्षिण भारत आज साबित कर रहा है कि शिष्टाचार और खेलभावना वाली राजनीति संभव है। बाकी भारत को भी यह संस्कृति अपनानी चाहिए। तभी हम “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” के सपने को साकार कर पाएंगे।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-16 May 2026