- Friday World 1 Jun 2026
कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों के मुताबिक राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने राजनीतिक करियर के सबसे नाजुक दौर से गुजर रहे हैं। व्हाइट हाउस के सामने संकट बाहर से कम, अपने ही फैसलों से ज्यादा गहरा दिख रहा है।
हालिया सैन्य टकराव के बाद ईरान ने न सिर्फ कड़ा रुख अपनाया है, बल्कि तीन शर्तों को मजबूती से सामने रखा है: युद्ध के नुकसान का मुआवजा, सभी आर्थिक पाबंदियों को पूरी तरह हटाना, और होर्मुज़ स्ट्रेट के प्रबंधन में अपनी भूमिका बढ़ाना। तेहरान का कहना है कि बिना इन मुद्दों पर बात हुए कोई भी कूटनीतिक पहल अधूरी रहेगी।
अमेरिका के सामने तीन मोर्चे
1. घरेलू दबाव: कांग्रेस में दोनों दलों के कुछ सांसद मध्य-पूर्व में दोबारा सैन्य खर्च बढ़ाने के खिलाफ हैं। मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा भी अब "विदेश में कम दखल" की नीति चाहता है।
2. कूटनीतिक गतिरोध: यूरोपीय सहयोगी पाबंदियां हटाने पर बंटे हुए हैं। फ्रांस और जर्मनी बातचीत के पक्ष में हैं, जबकि पूर्वी यूरोप के देश ईरान पर और दबाव चाहते हैं।
3. आर्थिक असर: होर्मुज़ स्ट्रेट से दुनिया का लगभग 20% तेल गुजरता है। ईरान के सख्त रुख के बाद कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता बढ़ी है। अमेरिकी बाजार में महंगाई की चिंता फिर लौट आई है।
व्हाइट हाउस की रणनीति क्या?
प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि ट्रंप टीम "दबाव और बातचीत" दोनों विकल्प खुले रखना चाहती है। एक तरफ नए प्रतिबंधों का मसौदा तैयार है, दूसरी तरफ ओमान और कतर के जरिए बैकचैनल संपर्क भी सक्रिय हैं। मगर ईरान ने सार्वजनिक तौर पर मुआवजे की मांग रखकर डील की गुंजाइश को मुश्किल बना दिया है।
जानकार क्या कहते हैं
जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर माइकल ओ'हैनलन मानते हैं कि यह संकट सैन्य से ज्यादा राजनीतिक है। "ट्रंप को अपने बेस को दिखाना है कि वे झुक नहीं रहे, और साथ ही युद्ध से बचना है। ये दोनों काम एक साथ मुश्किल हैं।"
वहीं, मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट की रीना शाह का आकलन है कि ईरान घरेलू समर्थन जुटाने के लिए कड़ा रुख दिखा रहा है। "पाबंदियों ने उनकी अर्थव्यवस्था को तोड़ा है। मुआवजे की बात करके वे अपनी जनता को संदेश दे रहे हैं।"
आगे का रास्ता
व्हाइट हाउस के पास फिलहाल तीन रास्ते हैं: सख्त प्रतिबंध बढ़ाना, सीमित समझौते पर आना, या तीसरे पक्ष के जरिए तनाव कम करना। तीनों में राजनीतिक जोखिम है। अगर ट्रंप पाबंदियां हटाते हैं तो रिपब्लिकन खेमे में नाराजगी बढ़ेगी। अगर सैन्य कार्रवाई बढ़ती है तो चुनावी साल में जनता का मूड खराब हो सकता है।
अगले 60 दिन निर्णायक माने जा रहे हैं। तेल बाजार, कांग्रेस का बजट सत्र, और G20 शिखर सम्मेलन, तीनों पर ईरान नीति की छाया पड़ेगी। व्हाइट हाउस इस "खुद के बनाए" जाल से निकल पाता है या नहीं, ये ट्रंप की विरासत तय करेगा।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 1 Jun 2026