20 साल के गुप्त प्रोजेक्ट के बाद सामने आई ईरान की अंडरवाटर स्ट्राइक फोर्स, अमेरिकी नौसेना के लिए बनी नई चुनौती
पानी की सतह के नीचे एक नई जंग शुरू हो चुकी है। 20 वर्षों से अधिक समय तक दुनिया की नज़रों से छुपाकर किए गए विकास के बाद, ईरान ने आखिरकार अपने सबसे महत्वाकांक्षी और रहस्यमयी हथियार सिस्टम से पर्दा उठा दिया है: आर्टिफिशियल डॉल्फिन के आकार के मानवरहित समुद्री तंत्र।
ये कोई साधारण अंडरवाटर ड्रोन नहीं हैं। ये दिखने में, तैरने में और व्यवहार करने में असली डॉल्फिन की हूबहू नकल करते हैं। लेकिन इनकी मासूम शक्ल के पीछे छुपा है एक घातक इरादा। ये तंत्र वास्तविक समुद्री जीवों की तरह पानी में घुलमिल जाते हैं और हमला करने वाले ड्रोनों के समान सटीक युद्ध अभियानों को अंजाम देते हैं… लेकिन हवा में नहीं, बल्कि समंदर की गहराइयों में।
इस खुलासे ने फारस की खाड़ी से लेकर भूमध्य सागर तक, वैश्विक नौसैनिक रणनीति के केंद्र में एक भूचाल ला दिया है। अमेरिकी रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि ये अपरंपरागत उपकरण पारंपरिक नौसैनिक युद्ध के सभी नियमों को बदलने की क्षमता रखते हैं।
1. ‘प्रोजेक्ट मोवारिड’: 20 साल का गुप्त मिशन
ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स-नेवी (IRGC-N) के करीबी सूत्रों के अनुसार, इस प्रोजेक्ट को ‘मोवारिड’ यानी ‘मोती’ का कोडनेम दिया गया था। इसकी शुरुआत 2000 के दशक की शुरुआत में हुई थी, जब ईरान को एहसास हुआ कि अमेरिकी नौसेना की विशाल शक्ति का सीधा मुकाबला करना असंभव है।
रणनीति साफ थी: अगर आप दुश्मन से बड़ा जहाज़ नहीं बना सकते, तो ऐसी तकनीक बनाओ जिसे दुश्मन देख ही न सके।
पिछले दो दशकों में, ईरानी वैज्ञानिकों ने बायोमिमिक्री, यानी प्रकृति की नकल करने वाली तकनीक में महारत हासिल की। उन्होंने डॉल्फिन की हड्डियों की संरचना, त्वचा की बनावट और सोनार सिस्टम का गहन अध्ययन किया। नतीजा है एक 2.5 मीटर लंबा, 300 किलो वज़न का अंडरवाटर ड्रोन जो 60 किमी/घंटा की रफ्तार से तैर सकता है और 400 मीटर की गहराई तक जा सकता है।
इसकी सबसे बड़ी ताकत है इसका AI-संचालित ‘स्वार्म बिहेवियर’। ये डॉल्फिनें अकेले नहीं, बल्कि 12 से 20 के झुंड में काम करती हैं। ये आपस में संवाद करती हैं, लक्ष्य को घेरती हैं और एक साथ हमला करती हैं, ठीक वैसे ही जैसे असली डॉल्फिनें शिकार करती हैं।
2. पहचान से परे: स्टील्थ तकनीक का नया स्तर
अमेरिकी नौसेना के लिए सबसे बड़ी सिरदर्दी इन डॉल्फिनों की ‘अदृश्यता’ है। पारंपरिक पनडुब्बी या टॉरपीडो को सोनार, मैग्नेटिक सेंसर और सैटेलाइट से ट्रैक किया जा सकता है। लेकिन इन रोबोटिक डॉल्फिनों को कैसे रोकेंगे?
क. बायोलॉजिकल कवर: फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी में हज़ारों असली डॉल्फिनें मौजूद हैं। सोनार स्क्रीन पर एक रोबोटिक डॉल्फिन और असली डॉल्फिन में फर्क करना लगभग नामुमकिन है। ये ‘समुद्री भीड़’ में छुपकर दुश्मन के जहाज़ों के बेहद करीब पहुँच सकती हैं।
ख. ध्वनिक नकल: ये तंत्र असली डॉल्फिनों की तरह ही क्लिक और व्हिसल की आवाज़ें निकालते हैं। दुश्मन का सोनार ऑपरेटर इसे एक सामान्य समुद्री जीव समझकर अनदेखा कर देगा।
ग. नॉन-मेटैलिक बॉडी: इनकी बॉडी का बड़ा हिस्सा कार्बन फाइबर और विशेष पॉलिमर से बना है। इससे मैग्नेटिक अनॉमली डिटेक्टर (MAD) इन्हें पकड़ नहीं पाते।
पेंटागन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “हमने हवाई ड्रोनों से निपटना सीख लिया है। लेकिन पानी के नीचे, जहाँ दृश्यता शून्य है और हर सिग्नल पर शक नहीं किया जा सकता, ये डॉल्फिनें एक ‘डिजिटल भूत’ की तरह हैं। ये सामरिक भ्रम पैदा करती हैं। आपको पता ही नहीं चलेगा कि हमला कहाँ से हुआ।”
3. हमले की क्षमता: खामोश और घातक
ये डॉल्फिनें सिर्फ जासूसी के लिए नहीं बनी हैं। हर तंत्र अपने नाक में 50 किलो का ‘शेप्ड चार्ज’ वॉरहेड ले जा सकता है। ये वॉरहेड किसी भी युद्धपोत के हल, यानी बाहरी ढांचे को भेदने के लिए काफी है।
हमले के तरीके:
1. कामिकेज़ स्ट्राइक: झुंड की एक डॉल्फिन सीधे दुश्मन के जहाज़ के सबसे कमज़ोर हिस्से, जैसे प्रोपेलर या रडार से टकराकर विस्फोट कर देती है।
2. माइन लगाना: ये चुपके से दुश्मन के बंदरगाहों या जहाज़ी रास्तों में ‘लिम्पेट माइन’ लगा सकती हैं, जो बाद में रिमोट से एक्टिवेट की जा सकती हैं।
3. इलेक्ट्रॉनिक जंग कुछ वेरिएंट में जैमर लगे हैं जो दुश्मन के जहाज़ों के सोनार और संचार सिस्टम को ठप कर सकते हैं।
एक साथ 10 डॉल्फिनों का हमला एक एयरक्राफ्ट कैरियर को भले ही डुबो न पाए, लेकिन उसे महीनों के लिए युद्ध से बाहर जरूर कर सकता है। और इसकी लागत? एक अमेरिकी टॉरपीडो की कीमत लगभग 3 मिलियन डॉलर है। एक रोबोटिक डॉल्फिन की अनुमानित कीमत सिर्फ 200,000 डॉलर है। यह ‘कॉस्ट-इफेक्टिव वॉरफेयर’ का सबसे खतरनाक उदाहरण है।
4. भू-राजनीतिक सुनामी: हिज़्बुल्लाह मॉडल से लेकर होर्मुज तक
ईरान की रणनीति को समझने के लिए हमें हवा में देखना होगा। जिस तरह ईरान समर्थित हिज़्बुल्लाह ने सस्ते, सटीक ड्रोनों और रॉकेटों से इज़राइल की महंगी आयरन डोम प्रणाली को परेशान कर रखा है, उसी तरह ईरान अब समंदर में ‘हिज़्बुल्लाह मॉडल’ लागू करना चाहता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य: दुनिया का 30% तेल यहीं से गुज़रता है। कुछ दर्जन रोबोटिक डॉल्फिनें इस पूरे इलाके में शिपिंग को ठप कर सकती हैं। तेल की कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं।
प्रॉक्सी युद्ध का नया दौर: ईरान इन डॉल्फिनों की तकनीक यमन के हूती विद्रोहियों या अन्य सहयोगी गुटों को दे सकता है। कल तक जो खतरा सिर्फ ईरानी तटों तक सीमित था, वह लाल सागर और बाब-अल-मंदेब तक फैल सकता है।
मनोवैज्ञानिक युद्ध: किसी भी नाविक के लिए ये सोचना कि उसके जहाज़ के नीचे सैकड़ों ‘खूनी डॉल्फिनें’ घूम रही हैं, एक भयानक मनोवैज्ञानिक दबाव है। यह दुश्मन के मनोबल को तोड़ने का हथियार है।
5. दुनिया की प्रतिक्रिया और आगे का रास्ता
अमेरिका: अमेरिकी नौसेना ने ‘प्रोजेक्ट ब्लू शार्क’ के तहत एंटी-ड्रोन डॉल्फिन सिस्टम पर काम तेज़ कर दिया है। इसमें ट्रेन की गई असली डॉल्फिनें और अंडरवाटर नेट शामिल हैं। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि हर हमले को रोकना नामुमकिन होगा।
इज़राइल: इज़राइली नौसेना, जिसके पास पहले से ही ‘डॉल्फिन-क्लास’ पनडुब्बियां हैं, इस खतरे को सबसे गंभीरता से ले रही है। उन्होंने भूमध्य सागर में ‘अंडरवाटर आयरन डोम’ तैनात करने की बात कही है।
चीन और रूस: दोनों देश इस तकनीक में गहरी दिलचस्पी दिखा रहे हैं। रूस की काला सागर में तैनाती और चीन की साउथ चाइना सी में रणनीति के लिए ये ‘गेम चेंजर’ साबित हो सकती है।
निष्कर्ष: युद्ध का बदलता चेहरा
20वीं सदी में युद्ध टैंक, फाइटर जेट और एयरक्राफ्ट कैरियर से लड़ा गया। 21वीं सदी की शुरुआत ड्रोनों के नाम रही। लेकिन अब, जंग का अगला मैदान समंदर की गहराइयाँ हैं।
ईरान की रोबोटिक डॉल्फिनें सिर्फ एक हथियार नहीं हैं, बल्कि एक संदेश हैं: भविष्य का युद्ध महंगे प्लेटफॉर्म्स का नहीं, बल्कि स्मार्ट, सस्ते और अदृश्य सिस्टम का होगा। ये वो हथियार हैं जो एक कमज़ोर देश को एक महाशक्ति के सामने टिकने की ताकत देते हैं।
हिज़्बुल्लाह ने आसमान में समीकरण बदला था। अब ईरान की ‘डॉल्फिनें’ गहरे पानी में इतिहास लिखने को तैयार हैं। सवाल ये नहीं है कि क्या ये इस्तेमाल होंगी, सवाल ये है कि कब और कहाँ। और जब होंगी, तो दुनिया की नौसेनाएँ फिर कभी पहले जैसी नहीं रहेंगी।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-May 5,2026