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Sunday, 17 May 2026

ट्रम्प की सख्ती और यूक्रेन का घातक वार: तेल संकट गहराया, दुनिया महंगे ईंधन की मार झेलने को तैयार

ट्रम्प की सख्ती और यूक्रेन का घातक वार: तेल संकट गहराया, दुनिया महंगे ईंधन की मार झेलने को तैयार
-Friday World-17 May 2026
वैश्विक ऊर्जा बाजार में तूफान आ गया है। एक तरफ हॉर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) का संकट, जहां ईरान से जुड़े तनाव के कारण दुनिया की करीब 20% तेल सप्लाई प्रभावित है, तो दूसरी तरफ अमेरिका की नई नीति और रूस-यूक्रेन युद्ध का नया मोड़। डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने रूसी क्रूड ऑयल पर दी गई अस्थायी छूट (waiver) को बढ़ाने से इनकार कर दिया है, जबकि यूक्रेन ने रूस के रियाजान (Ryazan) में रोसनेफ्ट की विशाल रिफाइनरी पर भारी ड्रोन हमला कर दिया। इन घटनाओं ने मिलकर वैश्विक तेल आपूर्ति को और नुकसान पहुंचाया है, जिससे कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने वाली हैं।

यह लेख इस पूरे संकट की गहराई, कारणों, प्रभावों और भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ने वाले असर को विस्तार से समझाता है।
 हॉर्मुज संकट: वैश्विक तेल आपूर्ति की धड़कन रुकी

हॉर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा गलियारा है। यहां से रोजाना लगभग 2 करोड़ बैरल से ज्यादा तेल गुजरता है, जो वैश्विक सप्लाई का करीब 20% है। ईरान से जुड़े हालिया युद्ध और तनाव के कारण इस रूट पर यातायात लगभग ठप हो गया है। टैंकरों पर हमले, सुरक्षा चिंताएं और राजनयिक गतिरोध ने सप्लाई चेन को बुरी तरह प्रभावित किया है।

परिणामस्वरूप, एशिया, यूरोप और अन्य जगहों पर तेल की कमी महसूस की जा रही है। कई देशों ने स्ट्रेटेजिक रिजर्व से तेल निकालना शुरू कर दिया, लेकिन यह राहत अस्थायी है। इस संकट के बीच भारत और इंडोनेशिया जैसे बड़े आयातक देश रूसी तेल पर निर्भर थे, क्योंकि सस्ता और उपलब्ध था।

 ट्रम्प प्रशासन का सख्त फैसला: वेवर क्यों नहीं बढ़ाया?

मार्च और अप्रैल 2026 में ट्रम्प प्रशासन ने रूसी समुद्री तेल पर दो बार अस्थायी छूट दी थी। यह छूट उन टैंकरों तक सीमित थी जिनमें पहले से रूसी तेल लोड हो चुका था। इसका मकसद हॉर्मुज संकट के कारण पैदा हुई कमी को कुछ हद तक कम करना था।

भारत, और कुछ अन्य देशों ने इस छूट को जारी रखने की अपील की थी। लेकिन यूरोपीय देशों का दबाव अलग था। वे चाहते थे कि रूस पर प्रतिबंध सख्त रहें, ताकि उसे यूक्रेन युद्ध के लिए फंडिंग न मिले। अंत में अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेन्ट (Scott Bessent) ने छूट को आगे न बढ़ाने का फैसला लिया।

इस फैसले के कारण:

- रूस को आर्थिक नुकसान पहुंचाकर यूक्रेन युद्ध में उसकी क्षमता कम करना।

- यूरोपीय सहयोगियों को संतुष्ट करना।

- हालांकि, हॉर्मुज संकट के बीच यह फैसला वैश्विक बाजार के लिए जोखिम भरा साबित हो रहा है।

रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अब दबाव बढ़ेगा। वे या तो महंगे विकल्प चुनेंगे या प्रतिबंधों का उल्लंघन करने का जोखिम उठाएंगे।

 रियाजान में यूक्रेन का घातक ड्रोन हमला

ट्रम्प के आर्थिक फैसले के ठीक बाद रूस को एक और बड़ा झटका लगा। 15 मई 2026 को यूक्रेन ने रूस के रियाजान क्षेत्र में रोसनेफ्ट की बड़ी रिफाइनरी पर सिलसिलेवार ड्रोन हमले किए। क्षेत्रीय गवर्नर पावेल मल्कोव के अनुसार, हमले में कम से कम 4 लोगों की मौत हुई और कई घायल हुए।

रिफाइनरी की अहमियत:

- सालाना लगभग 1.7 करोड़ टन कच्चे तेल की प्रोसेसिंग क्षमता।

- मॉस्को और आसपास के इलाकों को पेट्रोल, डीजल, एविएशन फ्यूल आदि सप्लाई करती है।

- रूस की युद्ध मशीनरी के लिए जरूरी ईंधन का प्रमुख स्रोत।

सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में भयंकर आग और काला धुआं दिख रहा है। NASA की सैटेलाइट तस्वीरों में धुआं 100 किलोमीटर दूर तक फैला दिखा। रिफाइनरी की वैक्यूम डिस्टिलेशन यूनिट्स बुरी तरह प्रभावित हुई हैं।

यह हमला यूक्रेन की डीप स्ट्राइक क्षमता का प्रदर्शन है और रूस की ऊर्जा क्षमता को सीधा निशाना बनाता है। रूस पहले ही कई रिफाइनरियों पर हमलों का सामना कर चुका है, जिससे उसकी प्रोसेसिंग क्षमता 20-25% तक घटी है।

 तेल की कीमतें आसमान छूने वाली: क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

इन दोनों घटनाओं का मिला-जुला असर भयावह हो सकता है:

1. सप्लाई में और कमी— हॉर्मुज से पहले ही कमी, अब रूसी तेल पर सख्ती और रिफाइनरी क्षति।

2. मांग-आपूर्ति असंतुलन— वैश्विक स्तर पर तेल की मांग बरकरार, लेकिन सप्लाई बाधित।

3. कीमतों में उछाल— ब्रेंट क्रूड पहले ही ऊंचे स्तर पर है। विश्लेषकों का अनुमान है कि कीमतें नई ऊंचाइयों को छू सकती हैं।

भारत जैसे देश, जो 85% से ज्यादा तेल आयात करते हैं, इसकी मार सबसे ज्यादा झेलेंगे। पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ेंगी, ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ेगी, महंगाई बढ़ेगी और औद्योगिक उत्पादन प्रभावित होगा।

भारत पर क्या असर?

- आयात लागत बढ़ना: रूसी तेल महंगा या कम उपलब्ध होने से मध्य पूर्व या अन्य स्रोतों से खरीदना पड़ेगा, जो महंगा है।

- मुद्रास्फीति: ईंधन कीमतों से ट्रांसपोर्ट, खाद्य पदार्थ और रोजमर्रा की चीजें महंगी।

- रुपया पर दबाव: ज्यादा आयात बिल से करेंसी कमजोर हो सकती है।

- ऊर्जा सुरक्षा: विविधीकरण की जरूरत और नवीकरणीय ऊर्जा पर जोर।

सरकार को रणनीतिक भंडारण, वैकल्पिक स्रोत और कूटनीति से संकट का सामना करना होगा।

 भविष्य की चुनौतियां और संभावनाएं

यह संकट दिखाता है कि भू-राजनीति कितनी आसानी से ऊर्जा बाजार को हिला सकती है। हॉर्मुज अगर लंबे समय तक बंद रहा तो वैश्विक मंदी का खतरा बढ़ेगा। रूस-यूक्रेन युद्ध का नया रूप तेल सुविधाओं को निशाना बना रहा है, जो युद्ध की लंबाई बढ़ा सकता है।

ट्रम्प प्रशासन की नीति "अमेरिका पहले" पर आधारित है, लेकिन वैश्विक प्रभाव से बचना मुश्किल है। यूरोप और एशिया पहले ही महंगाई और ऊर्जा संकट से जूझ रहे हैं।

तेल संकट अब सिर्फ ऊर्जा का मुद्दा नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता का सवाल बन गया है। भारत को सतर्क रहते हुए दीर्घकालिक रणनीति बनानी होगी। दुनिया को उम्मीद है कि कूटनीति से हॉर्मुज खुल जाए और युद्ध थम जाए, वरना आम आदमी महंगे ईंधन की आग में जलता रहेगा।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-17 May 2026