-Friday World-17 May 2026
नई दिल्ली। विश्व राजनीति की बिसात पर अमेरिका का एकछत्र साम्राज्य अब तेजी से ढहता नजर आ रहा है। डोनाल्ड ट्रंप के हालिया चीन दौरे ने दुनिया के सामने वह कड़वा सच उजागर कर दिया जिसे पश्चिमी मीडिया सालों से छुपाने की कोशिश करता रहा है। ‘सुपरपावर’ कहलाने वाला अमेरिका अब चीन के बराबर खड़ा होने की हेकड़ी भी नहीं रख पा रहा है। कई कूटनीतिक विशेषज्ञ इस दौरे को **बहुपक्षीय दुनिया (Multipolar World)** की असली शुरुआत मान रहे हैं।
ट्रंप बड़े-बड़े दावों और उम्मीदों के साथ बीजिंग पहुंचे थे, लेकिन शी जिनपिंग के शांत लेकिन दृढ़ रुख के सामने उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा। व्यापार, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, ईरान मुद्दा, हॉर्मुज की खाड़ी और निवेश जैसे अहम मुद्दों पर अमेरिका को कोई ठोस सफलता नहीं मिली।
ट्रंप की ‘बड़ी जीत’ का खोखला दावा
दौरे के बाद ट्रंप ने अमेरिकी जनता को एक बड़ा झूठ थमा दिया। उन्होंने दावा किया कि चीन उनसे **200 बोइंग पैसेंजर प्लेन** खरीद रहा है। ट्रंप ने इसे अपनी कूटनीतिक जीत बताते हुए कहा कि डील और बढ़कर 750 प्लेन तक हो सकती है। लेकिन चीन ने इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया। चीनी पक्ष ने स्पष्ट किया कि कोई औपचारिक समझौता नहीं हुआ है और ट्रंप के बयान अतिरंजित हैं।
यह घटना ट्रंप की कूटनीतिक फजीहत को और उजागर करती है। बोइंग कंपनी ने भी केवल “प्रारंभिक प्रतिबद्धता” की बात कही, लेकिन पूरा विवरण अस्पष्ट ही रहा। ट्रंप का यह बयान उनके पुराने अंदाज को दिखाता है — बड़े-बड़े दावे, लेकिन हकीकत में खोखले परिणाम।
शी जिनपिंग का शांत लेकिन मजबूत रुख
मीटिंग के दौरान शी जिनपिंग का व्यवहार पूरी तरह अलग था। उन्होंने शांतिपूर्ण लेकिन दृढ़ बॉडी लैंग्वेज से साफ संदेश दिया कि अब दुनिया में अमेरिका अकेला ‘बॉस’ नहीं रह गया है। चीन आर्थिक, तकनीकी और सैन्य रूप से इतना मजबूत हो चुका है कि वह अमेरिका के दबाव में आने को तैयार नहीं है।
ट्रंप अपने चिर-परिचित नाटकीय अंदाज में नखरे दिखाते रहे, लेकिन चीन ने कोई बड़ी रियायत नहीं दी। ताइवान, तकनीकी निर्यात प्रतिबंध, दुर्लभ खनिज और ईरान जैसे मुद्दों पर कोई ठोस समझौता नहीं हो सका।
अमेरिका का पतन और बहुपक्षीय दुनिया की उभरती तस्वीर
यह दौरा सिर्फ द्विपक्षीय बैठक नहीं था। यह उस बदलते विश्व व्यवस्था का प्रतीक बन गया है जिसमें:
- अमेरिका का दबदबा कम हो रहा है
- चीन आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभर रहा है
- रूस, भारत, ब्राजील जैसे देश नई दुनिया की संरचना में अपनी भूमिका मजबूत कर रहे हैं
अमेरिका अब अकेले दुनिया पर हावी होने की अपनी पुरानी नीति को जारी नहीं रख पा रहा है। ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति भी चीन जैसे मजबूत प्रतिद्वंद्वी के सामने बेअसर साबित हो रही है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
कई अंतरराष्ट्रीय संबंध विशेषज्ञ मानते हैं कि:
- ट्रंप का दौरा “वाइब्स” पर ज्यादा था, ठोस परिणामों पर कम
- चीन ने अपनी शर्तों पर बातचीत की
- अमेरिका को अब चीन के साथ बराबरी की हैसियत से बात करनी पड़ रही है
- यह दौरा बहुपक्षीय दुनिया की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा
पुरानी दुनिया जा रही है, नई दुनिया आ रही है
ट्रंप के बीजिंग दौरे ने साफ कर दिया है कि 21वीं सदी अब अमेरिका की एकतरफा हेकड़ी की सदी नहीं रह गई है। चीन न सिर्फ आर्थिक रूप से, बल्कि कूटनीतिक रूप से भी अमेरिका को कड़ी टक्कर दे रहा है।
जो देश पहले दुनिया को अपनी शर्तों पर चलाता था, आज उसे दूसरे देश की राजधानी में जाकर समझौता करना पड़ रहा है। ट्रंप की खाली हाथ वापसी और उनका झूठा दावा इस बदलाव का सबसे ताजा प्रमाण है।
बहुपक्षीय दुनिया अब सिर्फ किताबों में नहीं, बल्कि हकीकत में आ चुकी है। अमेरिका को अब इस नई सच्चाई को स्वीकार करना होगा।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-17 May 2026