खाड़ी की गर्म हवाओं में एक नई सियासी हलचल तेज हो गई है। ईरान ने दुनिया के सबसे अहम तेल रास्ते हॉर्मुज जलडमरूमध्य के लिए नई ट्रैफिक व्यवस्था का ऐलान कर दिया है। इस ऐलान के साथ ही मिडिल ईस्ट में तनाव का पारा और चढ़ गया है। ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति समिति के चेयरमैन इब्राहिम अजीजी ने साफ कहा कि अब हॉर्मुज से गुजरना मुफ्त नहीं होगा।
क्या है ईरान का नया 'हॉर्मुज प्लान'?
शनिवार को दिए बयान में इब्राहिम अजीजी ने बताया कि ईरान जल्द ही हॉर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही के लिए एक नई सिस्टम शुरू करेगा। उनके मुताबिक इस सिस्टम का मकसद दोहरा है: पहला, ईरान की संप्रभुता की रक्षा करना और दूसरा, अंतरराष्ट्रीय व्यापार को सुरक्षित बनाना।
लेकिन असली पेंच इसके नियमों में है। अजीजी ने साफ किया कि इस नई व्यवस्था का फायदा सिर्फ उन्हीं देशों और व्यापारिक जहाजों को मिलेगा जो ईरान के साथ सहयोग करेंगे। यानी जो देश ईरान के साथ दोस्ताना रुख रखेंगे, उनके लिए रास्ता आसान होगा। बाकी के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
सबसे बड़ा बदलाव यह है कि ईरान अब इस रास्ते पर दी जाने वाली 'खास सेवाओं' के लिए टैक्स वसूलेगा। ये खास सेवाएं क्या होंगी, इसकी डिटेल अभी सामने नहीं आई है। लेकिन माना जा रहा है कि इसमें सुरक्षा एस्कॉर्ट, तेज क्लीयरेंस या प्राथमिकता से रास्ता देना शामिल हो सकता है। एक तरह से यह 'पे-टू-पास' मॉडल होगा।
क्यों अहम है हॉर्मुज जलडमरूमध्य?
हॉर्मुज को दुनिया की तेल की नब्ज कहा जाता है। यह 33 किमी चौड़ी एक पतली समुद्री पट्टी है जो फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ती है। दुनिया का लगभग 20-30% कच्चा तेल, यानी रोजाना करीब 2 करोड़ बैरल तेल, इसी रास्ते से गुजरता है। सऊदी अरब, इराक, कुवैत, UAE और खुद ईरान का ज्यादातर तेल निर्यात इसी पर निर्भर है।
इतने बड़े पैमाने पर तेल और LNG की आवाजाही के कारण इस रास्ते पर जरा सा तनाव भी पूरी दुनिया में कच्चे तेल की कीमतों को हिला देता है। भारत भी अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से मंगाता है। इसलिए ईरान का यह फैसला सिर्फ खाड़ी देशों के लिए नहीं, भारत समेत पूरी दुनिया के लिए मायने रखता है।
UAE और कुवैत को सीधी चेतावनी
इस नए टैक्स सिस्टम के ऐलान के साथ ही ईरान ने अपने पड़ोसियों को लफ्जों के तीर भी मारे हैं। ईरानी सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के सलाहकार मोहम्मद मोखबर ने कुवैत और UAE को कड़ी चेतावनी दी है।
मोखबर ने कहा कि ईरान ने अब तक बहुत संयम रखा है, लेकिन यह संयम हमेशा नहीं रहेगा। उनका आरोप है कि इन देशों ने अपनी जमीन को ईरान के दुश्मनों के इस्तेमाल के लिए खोल दिया है। उन्होंने तीखे शब्दों में कहा, "ईरान ने लंबे समय तक इन्हें मित्र और भाई माना, लेकिन अब इन्होंने अपनी आजादी तक बेच दी है और अपने देश की जमीन दुश्मनों को दे दी है।"
यह बयान इजरायल और अमेरिका की खाड़ी में बढ़ती मौजूदगी की तरफ इशारा माना जा रहा है। ईरान का मानना है कि कुछ खाड़ी देश उसके खिलाफ बने गुट का हिस्सा बन रहे हैं।
ओमान पर भी खतरे के बादल?
हालांकि हेडलाइन में ओमान का जिक्र है, लेकिन अभी तक ईरान की तरफ से ओमान को लेकर कोई सीधा आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। ओमान आमतौर पर ईरान और पश्चिमी देशों के बीच तटस्थ भूमिका निभाता रहा है और बातचीत का जरिया बना है। मस्कट ने कई बार ईरान-अमेरिका के बीच मध्यस्थता भी की है। ऐसे में ओमान को धमकी की बात फिलहाल कूटनीतिक दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा लगती है।
इस फैसले के पीछे ईरान की रणनीति
1. आर्थिक दबाव का जवाब: ईरान पर अमेरिका और पश्चिमी देशों के कड़े प्रतिबंध लगे हैं। तेल निर्यात पर रोक से उसकी अर्थव्यवस्था दबाव में है। हॉर्मुज पर टैक्स लगाकर ईरान कमाई का नया जरिया बनाना चाहता है।
2. क्षेत्रीय ताकत का प्रदर्शन: इस कदम से ईरान यह जताना चाहता है कि हॉर्मुज पर उसी का नियंत्रण है। जो भी इस रास्ते से गुजरेगा, उसे ईरान के नियम मानने होंगे।
3. दोस्त-दुश्मन की पहचान: 'सहयोग करने वाले देशों' को ही फायदा देने की बात कहकर ईरान खाड़ी देशों को साफ संदेश दे रहा है कि वे अपना पक्ष चुन लें।
दुनिया पर क्या होगा असर?
1. तेल की कीमतों में उछाल: अगर यह सिस्टम लागू हुआ और तनाव बढ़ा, तो कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती हैं। इसका सीधा असर भारत में पेट्रोल-डीजल के दामों पर पड़ेगा।
2. शिपिंग कॉस्ट बढ़ेगी: टैक्स और बीमा की लागत बढ़ने से माल ढुलाई महंगी होगी। इसका बोझ अंततः आम उपभोक्ता पर पड़ेगा।
3. नया सैन्य तनाव: अमेरिका का पांचवां बेड़ा बहरीन में तैनात है। हॉर्मुज में किसी भी तरह की नाकेबंदी या जबरन टैक्स वसूली अमेरिका और ईरान को आमने-सामने ला सकती है।
भारत के लिए कितनी बड़ी चिंता?
भारत अपनी जरूरत का 60% से ज्यादा कच्चा तेल खाड़ी देशों से आयात करता है। इसमें से अधिकांश हॉर्मुज से होकर आता है। अगर ईरान वाकई टैक्स लगाता है या आवाजाही रोकता है, तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा असर पड़ेगा।
भारत के लिए दूसरी चुनौती कूटनीतिक होगी। भारत के ईरान के साथ ऐतिहासिक रिश्ते हैं और चाबहार पोर्ट में निवेश भी है। दूसरी तरफ UAE, सऊदी अरब और अमेरिका भी भारत के रणनीतिक साझेदार हैं। ऐसे में भारत को बेहद संतुलन साधकर चलना होगा।
आगे क्या?
फिलहाल ईरान ने सिर्फ ऐलान किया है। नई सिस्टम कब से लागू होगी, टैक्स कितना होगा और 'सहयोगी देश' की परिभाषा क्या होगी, ये सवाल अभी बाकी हैं। लेकिन इतना तय है कि हॉर्मुज की लहरें अब सिर्फ पानी की नहीं, बल्कि सियासत और ताकत की भी हैं।
अगर खाड़ी देशों और अमेरिका ने इसका कड़ा विरोध किया तो यह मामला संयुक्त राष्ट्र तक जा सकता है। क्योंकि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत हॉर्मुज एक 'अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य' है, जहां सभी देशों को 'ट्रांजिट पैसेज' का अधिकार है। यानी कोई देश यहां से गुजरने वाले जहाजों को नहीं रोक सकता।
अब देखना होगा कि ईरान का यह दांव खाड़ी की सियासत को किस मोड़ पर ले जाता है। क्या यह सिर्फ दबाव की रणनीति है या वाकई हॉर्मुज का नक्शा बदलने वाला है। आने वाले हफ्ते मिडिल ईस्ट के लिए बेहद अहम रहने वाले हैं
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-17 May 2026