-Friday World-17 May 2026
हॉर्मुज जलडमरूमध्य की आग अब महाशक्तियों के दांव-पेंच तक पहुंच गई है। ईरान के नए टैक्स प्लान के बाद अब रूस खुलकर मैदान में उतर आया है। रूस ने साफ कर दिया है कि हॉर्मुज संकट पर वह पूरी तरह चीन के साथ खड़ा है। इस ऐलान ने अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे तनाव को नई दिशा दे दी है।
रूस का बड़ा ऐलान: 'चीन जो कहेगा, वही हमारी लाइन'
वियना में अंतरराष्ट्रीय संगठनों के लिए रूस के स्थायी प्रतिनिधि मिखाइल उल्यानोव ने X पर पोस्ट कर दुनिया को चौंका दिया। उल्यानोव ने लिखा कि हॉर्मुज स्ट्रेट को लेकर रूस, चीन के रुख का पूरी तरह समर्थन करता है।
रूस का मानना है कि इस पूरे संकट का एक ही हल है: स्थायी और व्यापक युद्धविराम। यानी जब तक वॉशिंगटन और तेहरान के बीच परमानेंट सीजफायर नहीं होता, तब तक खाड़ी में शांति नहीं आ सकती।
यह बयान ऐसे वक्त आया है जब ईरान ने हॉर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर टैक्स लगाने का ऐलान किया है और UAE-कुवैत को धमकी दी है। रूस के इस स्टैंड से साफ है कि अब हॉर्मुज का मुद्दा सिर्फ ईरान बनाम खाड़ी देश नहीं रहा। यह अमेरिका-चीन-रूस की त्रिकोणीय लड़ाई बन गया है।
चीन ने पहले ही फेंका था पासा
रूस का यह बयान यूं ही नहीं आया। दरअसल, चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने कुछ दिन पहले ही कहा था कि हॉर्मुज में तनाव खत्म करने के लिए अमेरिका और ईरान के बीच स्थायी युद्धविराम जरूरी है।
वांग यी का बयान यहीं नहीं रुका। उन्होंने राष्ट्रपति शी जिनपिंग और डोनाल्ड ट्रंप की बातचीत का हवाला देते हुए कहा कि शी जिनपिंग ने ट्रंप से साफ कह दिया था कि ताकत से समस्याओं का हल नहीं निकलता।
यानी चीन शुरू से ही सैन्य टकराव की बजाय बातचीत पर जोर दे रहा है। अब रूस ने भी उसी लाइन को पकड़ लिया है। दोनों देशों का एक सुर में बोलना अमेरिका के लिए बड़ा कूटनीतिक झटका है।
हॉर्मुज क्यों बना महाशक्तियों का अखाड़ा?
1. तेल की नब्ज: हॉर्मुज से रोजाना 2 करोड़ बैरल तेल गुजरता है। यह दुनिया की कुल खपत का 20% है। जो भी इस रास्ते को कंट्रोल करेगा, वह ग्लोबल एनर्जी मार्केट को हिला सकता है।
2. चीन की मजबूरी: चीन अपनी तेल जरूरतों का 40% से ज्यादा खाड़ी देशों से मंगाता है। हॉर्मुज बंद हुआ तो चीन की फैक्ट्रियां ठप हो सकती हैं। इसलिए चीन हर हाल में यह रास्ता खुला रखना चाहता है।
3. रूस का गेम: रूस खुद बड़ा तेल निर्यातक है। अगर हॉर्मुज में तनाव से तेल 120 डॉलर प्रति बैरल पहुंचा, तो रूस की कमाई बेतहाशा बढ़ेगी। लेकिन साथ ही रूस नहीं चाहता कि अमेरिका यहां अपना दबदबा बढ़ाए। इसलिए वह चीन के साथ खड़े होकर बैलेंस बना रहा है।
4. अमेरिका की चुनौती: अमेरिका का पांचवां बेड़ा बहरीन में है। उसका काम ही हॉर्मुज को खुला रखना है। लेकिन अगर ईरान टैक्स वसूलने लगा और चीन-रूस ने उसे समर्थन दे दिया, तो अमेरिका के लिए सैन्य कार्रवाई मुश्किल हो जाएगी।
'स्थायी युद्धविराम' का मतलब क्या?
चीन और रूस बार-बार 'परमानेंट सीजफायर' की बात कर रहे हैं। लेकिन इसका मतलब सिर्फ गोलीबारी रोकना नहीं है। उनकी मांग के 3 हिस्से हैं:
1. प्रतिबंध हटाओ: अमेरिका ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटाए ताकि वह खुलकर तेल बेच सके।
2. सैन्य जमावड़ा घटाओ: खाड़ी में अमेरिकी युद्धपोतों और ठिकानों की संख्या कम की जाए।
3. परमाणु डील बहाल करो: 2015 की न्यूक्लियर डील को फिर से जिंदा किया जाए जिससे ईरान पर भरोसा बने।
अमेरिका के लिए ये तीनों शर्तें मानना आसान नहीं होगा। खासकर ट्रंप प्रशासन के लिए, जिसने ही परमाणु डील तोड़ी थी।
ईरान को मिला 'कवच'?
ईरान के लिए रूस और चीन का समर्थन संजीवनी जैसा है। अभी तक वह अकेले ही अमेरिका और खाड़ी देशों का दबाव झेल रहा था। लेकिन अब दो UNSC वीटो पावर उसके साथ खड़े हैं।
इसका मतलब है कि अगर अमेरिका ने हॉर्मुज में ईरान के खिलाफ कोई प्रस्ताव UN में लाया, तो रूस-चीन वीटो कर देंगे। सैन्य कार्रवाई की धमकी दी तो चीन-रूस कूटनीतिक ढाल बन जाएंगे।
यही वजह है कि ईरान अब ज्यादा आक्रामक रुख अपना रहा है। टैक्स लगाने का ऐलान और UAE को धमकी इसी नए आत्मविश्वास का नतीजा है।
भारत कहां खड़ा है?
इस पूरे खेल में भारत के लिए हालात बेहद पेचीदा हैं।
फायदा: अगर रूस-चीन के दबाव से अमेरिका-ईरान में सीजफायर हुआ, तो हॉर्मुज खुला रहेगा। भारत को सस्ता तेल मिलता रहेगा। चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट भी सुरक्षित रहेगा।
नुकसान: अगर तनाव बढ़ा तो तेल 100 डॉलर पार जाएगा। भारत का आयात बिल 30% तक बढ़ सकता है। महंगाई बेकाबू होगी। साथ ही भारत को अमेरिका और रूस में से एक चुनना पड़ सकता है।
भारत अभी 'स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी' की नीति पर चल रहा है। यानी वह न खुलकर अमेरिका के साथ है, न रूस-चीन के साथ। लेकिन हॉर्मुज संकट गहराया तो यह तटस्थता कायम रखना मुश्किल होगा।
क्या दुनिया दो गुटों में बंट रही है?
हॉर्मुज के मुद्दे ने साफ कर दिया है कि दुनिया फिर से कोल्ड वॉर वाले दौर में जा रही है।
एक तरफ: अमेरिका, इजरायल, UAE, सऊदी अरब, कुवैत। इनका मकसद ईरान को घेरना और हॉर्मुज को 'फ्री' रखना है।
दूसरी तरफ: ईरान, चीन, रूस। ये तीनों चाहते हैं कि अमेरिका का दबदबा खाड़ी में कम हो। 'स्थायी युद्धविराम' के बहाने ये अमेरिका को पीछे हटाना चाहते हैं।
बीच में फंसे हैं भारत, जापान, दक्षिण कोरिया जैसे देश, जिनकी अर्थव्यवस्था हॉर्मुज से आने वाले तेल पर टिकी है।
आगे क्या होगा? 3 संभावनाएं
1. बातचीत की टेबल: रूस-चीन के दबाव में अमेरिका और ईरान गुप्त बातचीत शुरू कर सकते हैं। ओमान या कतर मध्यस्थ बन सकते हैं। नतीजा: कुछ प्रतिबंधों में ढील और हॉर्मुज पर टैक्स का आइडिया ठंडे बस्ते में।
2. छोटा-मोटा टकराव: ईरान किसी एक-दो जहाज को रोककर टैक्स वसूलने की कोशिश करे। अमेरिका जवाबी कार्रवाई करे। लेकिन बड़ा युद्ध टाल दिया जाए। तेल 90-100 डॉलर के बीच झूले।
3. फुल ब्लोन क्राइसिस: ईरान वाकई हॉर्मुज ब्लॉक कर दे। अमेरिका सैन्य कार्रवाई करे। चीन-रूस UN में हंगामा करें। तेल 150 डॉलर पहुंच जाए। दुनिया मंदी में चली जाए।
फिलहाल पहली संभावना सबसे मजबूत लग रही है। क्योंकि न अमेरिका युद्ध चाहता है, न चीन-रूस। सबको पता है कि हॉर्मुज में आग लगी तो पूरी दुनिया झुलसेगी।
तेल से बड़ी है 'इज्जत' की लड़ाई
हॉर्मुज का संकट अब सिर्फ तेल का नहीं रहा। यह सवाल बन गया है कि 21वीं सदी में खाड़ी का 'बॉस' कौन होगा? अमेरिका जो 40 साल से यहां पुलिसिंग कर रहा है, या चीन-रूस-ईरान की नई तिकड़ी जो उसे चुनौती दे रही है।
रूस ने चीन का हाथ थामकर बता दिया है कि वह इस लड़ाई में अकेला नहीं है। 'स्थायी युद्धविराम' की मांग असल में अमेरिका को 'बैकफुट' पर धकेलने की चाल है।
आने वाले दिन तय करेंगे कि क्या दुनिया बातचीत से यह नॉट सुलझा पाती है, या हॉर्मुज की पतली सी पट्टी तीसरे विश्व युद्ध की चिंगारी बन जाती है। तब तक भारत समेत हर तेल आयातक देश को अपनी रणनीति तैयार रखनी होगी। क्योंकि खाड़ी में शांति रही तो सबकी बल्ले-बल्ले, और जंग छिड़ी तो सबकी जेब खाली।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-17 May 2026