-Friday World 11 Jun 2026
दुनिया गोल है, इतिहास गवाह है, और रिकॉर्ड टूटने के लिए ही बनते हैं। लेकिन कुछ रिकॉर्ड ऐसे बनते हैं कि Guinness Book वाले भी पन्ने पलटते-पलटते रुक जाएं और पूछें, "भाई, ये किया कैसे?"
ऐसा ही एक रिकॉर्ड बन गया है। "एक भी पत्रकार परिषद के बिना कोई व्यक्ति बारह साल तक प्रधानमंत्री पद पर बना रहा!"
वाह! क्या बात है। ये रिकॉर्ड तोड़ना मतलब ओलंपिक में बिना दौड़े गोल्ड जीतना। क्रिकेट में बिना बैट पकड़े सेंचुरी मारना। शादी में बिना फेरे लिए सात जन्मों का साथ निभाना।
रिकॉर्ड का पोस्टमार्टम: 12 साल = 4380 दिन = 0 सवाल-जवाब
पहले गणित समझते हैं। 12 साल मतलब 144 महीने। 624 हफ्ते। 4380 दिन। 1,05,120 घंटे। और इन सवा लाख घंटों में एक भी बार कैमरे के सामने बैठकर ये नहीं कहा गया, "आइए, आपके सवालों का जवाब दूं।"
पत्रकार परिषद क्या होती है? वो जगह जहाँ नेता बैठता है, पत्रकार पूछते हैं, नेता घूम-फिरकर जवाब देता है, और जनता टीवी पर समोसे खाते हुए ताली बजाती है। ये लोकतंत्र का बेसिक इंस्टाग्राम लाइव है। लेकिन यहाँ तो अकाउंट ही प्राइवेट रखा गया। फॉलोअर रिक्वेस्ट पेंडिंग, DM बंद, कमेंट सेक्शन ऑफ।
सोचिए, स्कूल में बच्चा 12 साल पढ़े और एक भी बार टीचर उससे सवाल न पूछे। या तो बच्चा जीनियस है, या टीचर को डर है कि जवाब सुनकर बेहोश हो जाएगा। यहाँ मामला दूसरा लगता है।
'साइलेंट मोड' के फायदे: एक शोधपत्र
इस अभूतपूर्व रणनीति पर IIM वालों को केस स्टडी करनी चाहिए। टॉपिक होगा: "How to Lead a Nation on Mute"।
फायदा नंबर 1: कभी गलत नहीं बोलोगे
जो बोलेगा ही नहीं, वो फिसलेगा कैसे? पत्रकार परिषद में फिसलने के 100% चांस होते हैं। किसी ने पूछ लिया, "महंगाई कब कम होगी?" और मुँह से निकल गया, "अगले मंगलवार"। लो, हो गया बवाल। इसलिए सबसे सेफ है, माइक ही न पकड़ो। मन की बात रेडियो पर करो। वन-वे ट्रैफिक। कोई हॉर्न नहीं, कोई जाम नहीं।
फायदा नंबर 2: समय ही समय है
पत्रकार परिषद की तैयारी में कितना समय बर्बाद होता है। फाइलें पढ़ो, डेटा याद करो, विपक्ष के संभावित सवालों के जवाब रटो। 12 साल में अगर महीने में एक भी PC होती, तो 144 दिन सिर्फ तैयारी में जाते। इतने समय में तो 144 नए एयरपोर्ट की आधारशिला रखी जा सकती है। सो प्रेस कॉन्फ्रेंस स्किप करो, विकास ऑटो-पायलट पर डालो।
फायदा नंबर 3: मिस्ट्री बनी रहती है
जो दिखता है वो बिकता है, पर जो नहीं दिखता वो 'ब्रांड' बनता है। रोज-रोज मीडिया के सामने आओगे तो एक्साइटमेंट खत्म। 12 साल तक चुप रहने से एक आभा बन गई। जनता सोचती रही, "अंदर ही अंदर कितना काम हो रहा होगा।" ये वही लॉजिक है कि शर्माजी का बेटा हमेशा चुप रहता है, तो मोहल्ले वाले मान लेते हैं कि बहुत होशियार है। बोलने लगा तो पोल खुल जाए।
पत्रकारों का दर्द: माइक लिए खड़े रहे, साहब कभी आए ही नहीं
बेचारे पत्रकार। 12 साल से माइक पर फूंक मार-मारकर चेक कर रहे हैं, "हैलो, टेस्टिंग 1, 2, 3"। पर उधर से आवाज़ ही नहीं आई।
नए रिपोर्टर आए, असाइनमेंट मिला "PMO बीट"। सोचा, चलो करियर बन गया। 5 साल बाद वो ही रिपोर्टर इस्तीफा देकर यूट्यूब पर रेसिपी चैनल चला रहा है। उसका कहना है, "वहाँ कम से कम कमेंट तो आते हैं।"
प्रेस क्लब में अब नए पत्रकारों को ट्रेनिंग दी जाती है: "बेटा, PM की प्रेस कॉन्फ्रेंस कवर करना तुम्हारे बस का नहीं। ये काम तुम्हारे दादाजी के जमाने में होता था। तुम रील बनाओ।"
विश्वगुरु के सामने विश्व रिकॉर्ड शरमा जाए
दुनिया में नेताओं ने रिकॉर्ड तो बहुत बनाए। चर्चिल ने भाषणों का रिकॉर्ड बनाया। ओबामा ने टाउनहॉल का। ट्रंप ने ट्वीट का।
पर "बिना बोले राज करने" का रिकॉर्ड? ये तो आउट ऑफ सिलेबस था।
अमेरिकी राष्ट्रपति को हफ्ते में दो बार प्रेस को फेस करना पड़ता है। ब्रिटिश PM को हर बुधवार PMQs में विपक्ष की झाड़ सुननी पड़ती है। बेचारे। उन्हें किसी ने बताया ही नहीं कि एक 'साइलेंट मोड' का ऑप्शन भी होता है सेटिंग्स में।
UN में अब नया प्रस्ताव लाना चाहिए: "Right to Not Answer"। लोकतंत्र का नया चैप्टर।
विपक्ष की हालत: सवाल पूछें तो किससे पूछें?
विपक्ष का तो सबसे बुरा हाल है। मुद्दा उठाओ, संसद में हंगामा करो, प्रेस रिलीज निकालो। पर जवाब देगा कौन?
ये ऐसा है जैसे आप दीवार से कुश्ती लड़ रहे हों। ऊर्जा आपकी खर्च हो रही है, चोट आपको लग रही है, और दीवार मजे से खड़ी है। 12 साल से विपक्ष दीवार को घूंसे मार रहा है और दीवार ने एक बार भी उफ्फ नहीं की।
ट्विटर पर ट्रेंड कराओ #PMAnswer, उधर से लाइक भी नहीं आता। ये लोकतंत्र है या 'सीन कर दिया, रिप्लाई नहीं किया' वाला रिलेशनशिप स्टेटस?
जनता जनार्दन: हमने भी एडजस्ट कर लिया
शुरू-शुरू में जनता को अजीब लगा। "अरे, भाईसाहब तो कुछ बोलते ही नहीं।" फिर धीरे-धीरे आदत हो गई।
अब हाल ये है कि अगर गलती से PC की घोषणा हो जाए, तो जनता घबरा जाएगी। "अरे, सब ठीक तो है न? 12 साल से चुप थे, आज अचानक क्यों बोलेंगे? कहीं युद्ध तो नहीं होने वाला?"
हम भारतीय एडजस्टमेंट के मास्टर हैं। ट्रेन लेट हो तो चाय पी लेते हैं। ट्रैफिक हो तो गाने सुन लेते हैं। PM चुप हो तो व्हाट्सएप फॉरवर्ड पर भरोसा कर लेते हैं। 'सूत्रों के हवाले से' ही हमारा न्यूज चैनल है।
बोलना ही है तो विदेश यात्रा से बोलो, मुँह से क्या बोलना
अंत में सारी बात का लब्बोलुआब ये है कि इस रिकॉर्ड ने लोकतंत्र की परिभाषा ही बदल दी।
हमें सिखाया गया था: "Of the people, By the people, For the people"। नया वर्जन है: "Of the people, By the people, Without talking to the people"।
हो सकता है आने वाली पीढ़ियां स्कूल में पढ़ें कि 21वीं सदी में 'कम्युनिकेशन' का मतलब बदल गया था। पहले नेता जनता से बात करते थे। फिर नेताओं ने जनता को बताया, और जनता ने मान लिया।
तो आइए, इस ऐतिहासिक, अद्वितीय, अकल्पनीय रिकॉर्ड का जश्न मनाते हैं। ताली बजाइए। वैसे भी, सवाल पूछने का रिवाज तो अब रहा नहीं।
डिस्क्लेमर: इस लेख का किसी जीवित या मौन राजनेता से कोई संबंध शुद्ध रूप से संयोग हो सकता है। अगर ठेस पहुँची हो, तो माफ़ी मांगने के लिए भी हम प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करेंगे। समझदार को इशारा काफी है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 11 Jun 2026