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Sunday, 7 June 2026

रसोई की आग अब जेब पर भारी: गैस सिलेंडर फिर बना आम आदमी के लिए सपना

रसोई की आग अब जेब पर भारी: गैस सिलेंडर फिर बना आम आदमी के लिए सपना
- Friday World 7 Jun 2026
दामों की लपटें और सुरक्षा की चिंता, हर घर की रसोई में मंडरा रहा दोहरा संकट

घर की रसोई से उठने वाली गैस की लौ अब सिर्फ खाना नहीं पका रही, बल्कि आम आदमी के बजट को भी जला रही है। पिछले कुछ महीनों में रसोई गैस सिलेंडर के दामों में लगी आग थमने का नाम नहीं ले रही। वहीं आए दिन सिलेंडर में लीकेज और आग लगने की घटनाएं लोगों की नींद उड़ा रही हैं। हालात ऐसे बन गए हैं कि गैस सिलेंडर गरीब और मध्यम वर्ग की पहुंच से बाहर होता जा रहा है। 

1. दाम बढ़े, जेब जली: एक नजर आंकड़ों पर
जनवरी 2020 में जो 14.2 किलो का घरेलू सिलेंडर 600 रुपये के आसपास मिलता था, आज कई शहरों में उसकी कीमत 1100 रुपये के पार जा चुकी है। बिना सब्सिडी वाले सिलेंडर की कीमत तो और भी ज्यादा है। सरकार भले ही उज्ज्वला योजना के तहत मुफ्त कनेक्शन दे रही हो, पर महंगे रिफिल के कारण कई लाभार्थी दोबारा सिलेंडर भरवाने से कतरा रहे हैं। 

पिछले 4 साल में घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत लगभग दोगुनी हो गई है। कमर्शियल सिलेंडर की बात करें तो छोटे ढाबे, ठेले और टी स्टॉल चलाने वालों की कमर टूट गई है। 19 किलो का कमर्शियल सिलेंडर 2000 रुपये के करीब पहुंच गया है। नतीजा, चाय 10 रुपये से 15 रुपये की हो गई और समोसा 12 रुपये का बिक रहा है। 

2. क्यों लग रही है दामों में आग?

इसके पीछे कई वजहें हैं। भारत अपनी जरूरत का 60% से ज्यादा एलपीजी आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और गैस के दाम बढ़ते हैं तो सीधा असर भारत की रसोई पर पड़ता है। डॉलर के मुकाबले रुपये का कमजोर होना भी कीमत बढ़ाता है। इसके अलावा ट्रांसपोर्ट खर्च, डीलर कमीशन और टैक्स मिलकर सिलेंडर को महंगा बना देते हैं। 

सरकार का तर्क है कि सब्सिडी का बोझ कम करने के लिए दाम बाजार के हवाले किए गए हैं। पर सच ये है कि सब्सिडी अब नाममात्र की रह गई है। 2014 में एक सिलेंडर पर 400 रुपये तक सब्सिडी मिलती थी, जो अब घटकर कई राज्यों में शून्य हो गई है। उज्ज्वला लाभार्थियों को जरूर 200 रुपये की सब्सिडी मिलती है, पर वह भी 12 सिलेंडर तक सीमित है। 

3. आग का डर: जब सिलेंडर बन जाए बम
दाम के साथ दूसरी बड़ी चिंता सुरक्षा की है। हर महीने देश के किसी न किसी कोने से सिलेंडर फटने या लीकेज से आग लगने की खबर आती है। ज्यादातर हादसे पुराने पाइप, खराब रेगुलेटर या सिलेंडर की गलत हैंडलिंग की वजह से होते हैं। 

2023 में पेट्रोलियम मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, एक साल में 3000 से ज्यादा एलपीजी संबंधी दुर्घटनाएं दर्ज की गईं। इनमें सैकड़ों लोगों की जान गई और हजारों झुलस गए। सबसे ज्यादा खतरा सर्दियों में होता है जब लोग कमरे बंद करके अंगीठी या हीटर के साथ खाना बनाते हैं। गैस लीक हुई तो धमाका तय है। 

4. आम आदमी पर दोहरी मार
सोचिए एक दिहाड़ी मजदूर के घर का हाल। महीने में 15000 रुपये कमाता है। उसमें से 1100 रुपये सिर्फ सिलेंडर में चले जाएं तो बाकी खर्च कैसे चलेंगे? मजबूरी में कई परिवार वापस लकड़ी, कंडे और कोयले पर लौट रहे हैं। इससे महिलाओं की सेहत पर बुरा असर पड़ रहा है। WHO कहता है कि चूल्हे के धुएं से एक घंटे में 400 सिगरेट के बराबर नुकसान होता है। 

छोटे दुकानदारों का गणित भी बिगड़ गया है। पहले 10 रुपये में चाय बेचकर 3 रुपये बचते थे। अब सिलेंडर महंगा होने से बचत 1 रुपये रह गई है। या तो दाम बढ़ाओ या धंधा बंद करो। 

5. समाधान क्या है? सरकार और हम क्या कर सकते हैं

सरकार के स्तर पर:
- सब्सिडी का तर्कसंगत ढांचा: गरीबी रेखा से नीचे वाले परिवारों के लिए सीधी सब्सिडी फिर से शुरू हो। डीबीटी के जरिए पैसा सीधे खाते में आए ताकि चोरी रुके। 
- घरेलू उत्पादन बढ़ाना: ONGC और अन्य कंपनियों को गैस उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन मिले ताकि आयात पर निर्भरता कम हो। 
- सुरक्षा ऑडिट: हर 5 साल में मुफ्त में पाइप, रेगुलेटर की जांच हो। गैस एजेंसियों को इसकी जिम्मेदारी दी जाए। 
- वैकल्पिक ईंधन: सोलर कुकर, बायोगैस प्लांट और पीएनजी लाइन का विस्तार हो। शहरों में पीएनजी सिलेंडर से 30% तक सस्ती पड़ती है। 

हमारे स्तर पर:
- सुरक्षा पहले: हर बार खाना बनाने के बाद रेगुलेटर बंद करें। रात को सोने से पहले जरूर चेक करें। पाइप पर ISI मार्क हो और 5 साल में बदल दें। 
- लीकेज पहचानें: अगर गैस की गंध आए तो तुरंत खिड़की दरवाजे खोल दें। बिजली का स्विच न जलाएं। रेगुलेटर बंद करके एजेंसी को बुलाएं। 
- बचत के तरीके: प्रेशर कुकर का ज्यादा इस्तेमाल करें। सब्जी काटकर रखें ताकि गैस कम जले। एक साथ दो चीजें पकाने की कोशिश करें। 
- शिकायत करें: डिलीवरी बॉय अगर एक्स्ट्रा पैसे मांगे या कम वजन का सिलेंडर दे तो 1906 पर शिकायत करें। 

6. उज्ज्वला योजना: तस्वीर का दूसरा रुख
सरकार ने 2016 में उज्ज्वला योजना शुरू की। 10 करोड़ से ज्यादा मुफ्त कनेक्शन बांटे गए। इससे धुएं से आजादी तो मिली, पर एक रिपोर्ट बताती है कि 2022-23 में उज्ज्वला लाभार्थियों ने औसतन सिर्फ 3.7 सिलेंडर ही रिफिल कराए। साल में 12 के बजाय 4 सिलेंडर का मतलब है कि महंगाई के कारण लोग फिर चूल्हे की तरफ लौट रहे हैं। योजना का मकसद तभी पूरा होगा जब रिफिल जेब पर भारी न पड़े। 

7. दुनिया से सीख
बांग्लादेश ने गरीबों के लिए छोटे 5 किलो के सिलेंडर शुरू किए। इससे एक बार में कम पैसे लगते हैं। ब्राजील में ‘वैले गैस’ स्कीम के तहत गरीब परिवारों को हर दो महीने में गैस वाउचर मिलता है। भारत में भी ऐसी स्कीम पर विचार हो सकता है। 

अंत में: रसोई बचेगी तो परिवार बचेगा
गैस सिलेंडर आज सिर्फ ईंधन नहीं, राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बन गया है। चुनाव आते हैं तो दाम 200 रुपये घटते हैं और चुनाव बाद 300 रुपये बढ़ जाते हैं। जरूरत स्थिर नीति की है। 

आम आदमी चाहता है कि रसोई की आग चूल्हे तक सीमित रहे, बजट तक न पहुंचे। जब तक सिलेंडर की कीमत और सुरक्षा दोनों पर काम नहीं होगा, तब तक ‘हर घर रसोई, हर रसोई धुआं मुक्त’ का सपना अधूरा रहेगा। क्योंकि भूखे पेट न तो विकास होता है, न ही देश आगे बढ़ता है। 

सुरक्षा के लिए याद रखें 3 बातें:  

1. सूंघें: गैस की गंध आते ही सतर्क हो जाएं।  

2. बंद करें: तुरंत रेगुलेटर और सिलेंडर का वॉल्व बंद करें।  

3. बुलाएं: इमरजेंसी नंबर 1906 या अपनी गैस एजेंसी को फोन करें। 

यह आर्टिकल पूरी तरह मौलिक है और कॉपीराइट मुक्त है। आप इसे कहीं भी उपयोग कर सकते हैं।  

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 7 Jun 2026