- Friday World 17 Jun 2026
जब चाँद की पहली किरण मुहर्रम की रात को छूती है, तो इतिहास की सबसे बड़ी सच की लड़ाई फिर से ज़िंदा हो जाती है। यह महीना न जश्न का है, न भूलने का — यह हक़ की कीमत चुकाने का,
हर साल 1 मुहर्रम आते ही दुनिया के कोने-कोने में बस उन लोगों की रगों में खून की जगह कर्बला दौड़ने लगती है, जिनके दिल में ज़मीर अभी ज़िंदा है। यह वह महीना है जब इंसानियत फिर से पूछती है — क्या तुम हक़ के साथ खड़े हो, या मक्कारों की भीड़ में शामिल हो गए हो?
कर्बला: हक़ और बاطिल की निर्णायक जंग
सन् 61 हिजरी, 10 मुहर्रम। कर्बला के मैदान में सिर्फ 72 साथी, भूखे-प्यासे, घायल। सामने यज़ीद की हजारों की फौज। लेकिन इमाम हुसैन (अ.स.) ने झुकना मंजूर नहीं किया। उन्होंने कहा था: “मैं अपनी जान दे दूंगा, लेकिन अपनी गरिमा और सच्चाई नहीं बेचूंगा।”
यह जंग सिर्फ दो आदमियों या दो परिवारों की नहीं थी। यह दो मज़हबों की नहीं थी। यह दो रास्तों की जंग थी — हक़ और सत्ता की लालच की। एक तरफ इमाम हुसैन (अ.स.), जो बाप-दादा की विरासत — रसूल (स.अ.व.) की सच्चाई — को बचाने निकले थे। दूसरी तरफ यज़ीद, जो ख़िलाफत को राजशाही में बदलना चाहता था।
आज भी जब हम मुहर्रम की रातों में मातम करते हैं, रोते हैं, तो असल में हम अपने अंदर के यज़ीद को मारने की कोशिश करते हैं।
मुहर्रम का सच्चा मिजाज
मुहर्रम का मिजाज जश्न का नहीं, जागृति का है।
यह महीना हमें याद दिलाता है कि:
- हर चेहरे पर यक़ीन नहीं करना चाहिए।
- लिबास बदलकर आने वाले मक्कारों को पहचानना है।
- दोस्ती का दावा करने वाले, लेकिन किरदार बेचने वाले लोगों से दूर रहना है।
“जो तेरे सामने तेरे हैं, जो मेरे सामने मेरे हैं — ऐसे फितरत के मक्कारों से मुझे नफरत है।”
मुहर्रम हमें सिखाता है कि **किरदार के सौदागर** नहीं, उसूलों के मुसाफिर बनना है। सर झुकाना हमारी फितरत नहीं, ज़रूरत पड़े तो सर कटाना हमारी विरासत है।
आज के इस दौर में, जहां सोशल मीडिया पर हर कोई “हुसैनी” बनने का दावा करता है, मुहर्रम हमें सवाल करता है — क्या तुम सच में हुसैनी हो? या सिर्फ नाम और हैशटैग का?
आधुनिक यज़ीदियत: नये लिबास में पुरानी साजिश
आज यज़ीदियत लैपटॉप और माइक लेकर आती है।
वो टीवी स्क्रीन पर “शांति” और “संवाद” की बात करती है, लेकिन अंदर से सत्ता और पैसे की भूख रखती है।
वो धार्मिक लिबास पहनकर आती है, लेकिन इमाम हुसैन (अ.स.) के पैगाम को तोड़-मरोड़कर पेश करती है।
मुहर्रम हमें चेतावनी देता है — यज़ीदियत कभी ख़त्म नहीं होती, वो सिर्फ अपना चेहरा बदलती है। आज वो कॉर्पोरेट मीटिंग में, कल मीडिया स्टूडियो में, परसों राजनीतिक मंच पर नज़र आएगी।
इसीलिए इमाम हुसैन (अ.स.) की शहादत का पैगाम आज भी उतना प्रासंगिक है जितना 1400 साल पहले था: **अकेले खड़े होना बेहतर है, लेकिन गलत भीड़ के साथ खड़े होने से।**
फ़नकार, अहल-ए-कलम और अहल-ए-दिल के लिए दुआ
इस मुहर्रम में विशेष दुआ है उन सभी के लिए जो सच बोलने का साहस रखते हैं:
- जो लेखक हैं, जो कलाकार हैं, जो शायर हैं।
- जो सच्ची आवाज़ उठाते हैं, भले ही उनकी आवाज़ अकेली ही क्यों न हो।
- जो बदकिरदार लोगों के सामने झुकने से इनकार करते हैं।
या इमाम हुसैन (अ.स.),
आपके सदके तमाम ज़मीर वाले लोग, अहल-ए-कलम और अहल-ए-दिल हर तरह के मक्कारों, दबाव और धोखे से महफूज़ रहें। उन्हें हक़ की राह पर चलने की तौफ़ीक अता फरमाएं।
हक़ ज़िंदा है — हमेशा ज़िंदा रहेगा
कर्बला की शहादत ने साबित कर दिया कि हक़ को मारने के लिए कितनी भी बड़ी फौज क्यों न हो, वो कभी ख़त्म नहीं होता।
इमाम हुसैन (अ.स.) शहीद हो गए, लेकिन उनकी आवाज़ आज भी हर ज़ालिम के खिलाफ गूंजती है।
हर मातमी जलूस, हर नोहा, हर मज़लूम की पुकार यह संदेश देती है:
हक़ ज़िंदा था, हक़ ज़िंदा है, और हक़ हमेशा ज़िंदा रहेगा।
इस मुहर्रम हम सब से अपील है —
अपने अंदर छिपे छोटे-छोटे यज़ीद को मारो।
सच के साथ खड़े हो।
मक्कारों की चमकदार बातों में न आओ।
और अगर ज़रूरत पड़ी तो इमाम हुसैन (अ.स.) की तरह अकेले ही सही, लेकिन हक़ पर खड़े रहो।
लabbayk ya Hussain (अ.स.) या हुसैन (अ.स.)...
यह महीना हमारे दिलों को साफ़ करे, हमारे ज़मीर को जागृत करे और हमें हक़ की राह पर चलने की हिम्मत दे।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 17 Jun 2026