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Monday, 29 June 2026

रूस-पाकिस्तान की गहरी होती दोस्ती: भारत के लिए रणनीतिक चेतावनी या क्षेत्रीय संतुलन का नया अध्याय

रूस-पाकिस्तान की गहरी होती दोस्ती: भारत के लिए रणनीतिक चेतावनी या क्षेत्रीय संतुलन का नया अध्याय
-Friday World 29 Jun 2026
पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक भू-राजनीति में तेजी से बदलाव आ रहे हैं। पारंपरिक गठबंधनों में दरारें पड़ रही हैं और नए समीकरण बन रहे हैं। इसी क्रम में रूस और पाकिस्तान के बीच बढ़ती नजदीकियां भारत के लिए एक बड़ी टेंशन का सबब बन गई हैं। हाल ही में 23 जून 2026 को इस्लामाबाद में आयोजित रूस-पाकिस्तान संयुक्त कार्य समूह (Joint Working Group) की 12वीं बैठक ने इस रिश्ते को नई ऊंचाई दी है। दोनों देशों ने अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद से निपटने के लिए सहयोग बढ़ाने, साझा सैन्य अभियानों और सैन्य संबंधों को मजबूत करने पर सहमति जताई है। कई विश्लेषक इसे भारत के लिए एक बड़ा रणनीतिक झटका मान रहे हैं।

यह बैठक महज एक औपचारिक मुलाकात नहीं थी। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव मुहम्मद खालिद खान जमाली और रूस के उप विदेश मंत्री दिमित्री ल्युबिंस्की की अगुवाई में हुई इस चर्चा का फोकस अफगानिस्तान से निकलने वाले आतंकवादी खतरों पर रहा। दोनों पक्षों ने क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों का आकलन किया और संयुक्त राष्ट्र (UN) तथा शंघाई सहयोग संगठन (SCO) जैसे मंचों पर समन्वय बढ़ाने का फैसला किया।

स्पुतनिक से बात करते हुए पाकिस्तानी वायु सेना के पूर्व कर्नल और मिलिट्री एनालिस्ट सुल्तान एम. हाली ने इस बैठक को एक अलगावपूर्ण घटना न बताते हुए इसे लंबी प्रक्रिया का हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि यह द्विपक्षीय फॉर्मेट SCO और UN जैसे बहुपक्षीय मंचों की कमियों को पूरा करता है। उनकी राय में दोनों देशों के बीच यह सहयोग क्षेत्रीय स्थिरता के लिए जरूरी है, लेकिन भारत के नजरिए से यह चिंता का विषय बन गया है।

 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: दुश्मनी से दोस्ती तक का सफर

रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) और पाकिस्तान के रिश्ते लंबे समय तक तनावपूर्ण रहे। 1980 के दशक में सोवियत-अफगान युद्ध के दौरान पाकिस्तान ने मुजाहिदीनों का समर्थन किया, जिससे दोनों देश आमने-सामने थे। पाकिस्तानी वायु सेना ने उस समय कई सोवियत विमानों को मार गिराया था। लेकिन शीत युद्ध समाप्त होने के बाद परिस्थितियां बदलने लगीं।

1990 के दशक के अंत में दोनों देशों ने राजनयिक संबंध मजबूत किए। 2014 में रक्षा सहयोग समझौते के साथ नया अध्याय शुरू हुआ। रूस ने पाकिस्तान को Mi-35 हेलीकॉप्टर, एंटी-टैंक सिस्टम और अन्य सैन्य उपकरण सप्लाई किए। 2016 से दोनों देश नियमित रूप से 'दोस्ती' (Druzhba) संयुक्त सैन्य अभ्यास कर रहे हैं। 2020 और 2021 में इन अभ्यासों का विस्तार हुआ।

हाल के वर्षों में यह सहयोग और गहराया है। पाकिस्तान ने रूस से तेल और गैस आयात बढ़ाया है, जबकि रूस पाकिस्तान को ऊर्जा परियोजनाओं में भागीदारी दे रहा है। उत्तर-दक्षिण गैस पाइपलाइन जैसी महत्वाकांक्षी परियोजनाएं दोनों देशों के आर्थिक हितों को जोड़ रही हैं।

12वीं बैठक: क्या हुआ और इसका महत्व

इस्लामाबाद बैठक में मुख्य रूप से तीन मुद्दों पर जोर दिया गया:

1. आतंकवाद विरोधी सहयोग: अफगानिस्तान से निकलने वाले ISIS-K, TTP (तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान) और अन्य समूहों के खतरे पर चर्चा। दोनों देशों ने खुफिया जानकारी साझा करने और संयुक्त अभियानों की संभावना पर सहमति जताई।

2. सैन्य संबंधों का विस्तार*: सैन्य प्रशिक्षण, हथियारों की खरीद-बिक्री और संयुक्त अभ्यासों को बढ़ावा।

3. बहुपक्षीय समन्वय: SCO और UN में एकजुट रुख अपनाने का फैसला।

यह बैठक ऐसे समय हो रही है जब रूस यूक्रेन संघर्ष के कारण पश्चिमी देशों से अलग-थलग पड़ रहा है। पाकिस्तान भी अमेरिका के साथ उतार-चढ़ाव भरे रिश्तों के कारण नए साझेदार तलाश रहा है। चीन पहले से ही पाकिस्तान का सबसे करीबी सहयोगी है। अब रूस का जुड़ना 'चीन-पाकिस्तान-रूस' ट्रायंगल की संभावनाओं को मजबूत करता है।

भारत के लिए क्यों चिंता का विषय?

भारत और रूस के बीच लंबे समय से रणनीतिक साझेदारी रही है। रूस भारत का सबसे बड़ा रक्षा साझेदार है। S-400 मिसाइल सिस्टम, Su-30MKI लड़ाकू विमान, T-90 टैंक और ब्रह्मोस जैसी परियोजनाएं इसका प्रमाण हैं। लेकिन रूस का पाकिस्तान से बढ़ता सहयोग भारत को असहज कर रहा है।

भारतीय सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि:

- रूस से मिले हथियार या प्रौद्योगिकी का पाकिस्तान द्वारा भारत के खिलाफ इस्तेमाल हो सकता है।
- आतंकवाद विरोधी सहयोग के नाम पर पाकिस्तान TTP जैसे समूहों पर फोकस कर सकता है, लेकिन भारत-विरोधी आतंकी गुटों (जैसे जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा) पर नजरअंदाज हो सकता है।

- SCO में रूस का रुख पाकिस्तान के पक्ष में जा सकता है, जिससे भारत की काउंटर-टेररिज्म पहल कमजोर हो सकती है।

- अफगानिस्तान में तालिबान शासन के बाद क्षेत्रीय सुरक्षा का समीकरण बदल गया है। रूस और पाकिस्तान दोनों अफगानिस्तान से निकलने वाले खतरे से चिंतित हैं, लेकिन भारत की चिंता बलूचिस्तान और कश्मीर से जुड़ी है।

हालांकि, रूसी अधिकारियों ने समय-समय पर आश्वासन दिया है कि पाकिस्तान के साथ उनका सहयोग भारत के हितों को नुकसान नहीं पहुंचाएगा। फिर भी, व्यावहारिक स्तर पर भारत को अपनी रणनीति में बदलाव सोचना पड़ रहा है।

 व्यापक भू-राजनीतिक संदर्भ

यह नजदीकी केवल द्विपक्षीय नहीं है। यह बड़े परिवर्तनों का हिस्सा है:

- मल्टी-पोलर वर्ल्ड: अमेरिका के नेतृत्व वाले गठबंधनों से दूर होकर कई देश रूस और चीन की ओर झुक रहे हैं।

- चीन का फैक्टर: CPEC (China-Pakistan Economic Corridor) के माध्यम से चीन पाकिस्तान में गहराई से घुसा हुआ है। रूस का जुड़ना इस इकोनॉमिक कॉरिडोर को और मजबूत कर सकता है।

- ऊर्जा सुरक्षा रूस पाकिस्तान को सस्ता तेल दे रहा है। भारत भी रूस से भारी मात्रा में क्रूड ऑयल खरीद रहा है। दोनों देश रूस पर निर्भर हो रहे हैं।

- अफगानिस्तान: तालिबान शासन के बाद क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ी है। रूस, पाकिस्तान और चीन तीनों अफगानिस्तान को स्थिर करने में रुचि रखते हैं, लेकिन उनके एजेंडे अलग-अलग हो सकते हैं।

 संभावित भविष्य और भारत के विकल्प

विशेषज्ञों के अनुसार, रूस-पाकिस्तान संबंध और गहरे हो सकते हैं। संयुक्त सैन्य अभ्यास बढ़ सकते हैं, हथियार डील हो सकती है और आर्थिक सहयोग विस्तारित हो सकता है। लेकिन रूस भारत को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं कर सकता। भारत रूस का बड़ा बाजार और रक्षा साझेदार है।

भारत के लिए रणनीतिक विकल्प:
1. क्वाड और पश्चिमी देशों के साथ संबंध और मजबूत करना।

2. फ्रांस, इजराइल जैसे नए साझेदारों से रक्षा आयात बढ़ाना।

3. *SCO में सक्रिय भूमिका निभाते हुए अपनी चिंताओं को रखना।

4. आर्थिक कूटनीति: पाकिस्तान के साथ किसी भी प्रकार की तनावपूर्ण स्थिति में आर्थिक दबाव बनाए रखना।

5. खुफिया और सैन्य तैयारियां: सीमा पर सतर्कता बढ़ाना और आतंकवाद विरोधी क्षमता मजबूत करना।

: चेतावनी है, लेकिन घबराने की जरूरत नहीं

रूस-पाकिस्तान की बढ़ती नजदीकी निश्चित रूप से भारत के लिए एक चुनौती है। यह पारंपरिक 'रूस-भारत' गठबंधन को जटिल बनाती है। लेकिन भू-राजनीति में कोई रिश्ता स्थायी नहीं होता। भारत को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति के तहत सभी विकल्प खुला रखना चाहिए।

सुल्तान एम. हाली जैसे विश्लेषकों की राय महत्वपूर्ण है, लेकिन भारत को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के हिसाब से फैसले लेने होंगे। क्षेत्रीय स्थिरता तभी संभव है जब सभी देश आतंकवाद के सभी रूपों के खिलाफ एकसाथ खड़े हों, बिना किसी भेदभाव के।

यह विकास न सिर्फ भारत, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया और मध्य एशिया के लिए महत्वपूर्ण है। आने वाले दिनों में इन संबंधों पर नजर रखना जरूरी होगा। क्या यह सहयोग क्षेत्रीय शांति लाएगा या नई टेंशन पैदा करेगा? समय ही बताएगा।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 29 Jun 2026