- Friday World 30 Jun 2026
आजकल दुनिया का नक्शा खोलो तो पता चलता है कि हर कोने में एक फैक्ट्री खुल गई है — “सम्मान-निर्माण उद्योग”। काम सिर्फ एक है: जैसे ही कोई नेता विमान से उतरे, तुरंत एक चमचमाता मेडल, एक भारी-भरकम नाम वाला सर्टिफिकेट और पीछे से तालियों की गूंज तैयार। बदले में क्या चाहिए? बस थोड़ी-सी “मैत्री-सहायता”, कुछ अरब-खरब का पैकेज, और एक मुस्कुराती सेल्फी।
कहानी शुरू होती है एक ऐसे नेता से जिसे तारीफ की भूख ऐसी लगी कि सुबह का नाश्ता भी तालियों से करता है। नींद में भी अगर कोई कह दे “आप महान हैं”, तो करवट बदलकर धन्यवाद दे देता है। दुनिया ने भी इस भूख को भांप लिया। अब हर छोटा-बड़ा देश सोचता है — “क्यों न एक नया अवार्ड बना लें? नाम रख देंगे ‘रक्षक ऑफ द सनराइज क्लाउड’ या ‘शेर-ए-सागर-तट-प्रहरी’। सुनने में इतना भारी कि खुद देने वाला भी दो बार अटक जाए।”
पहला दृश्य: अवार्ड का जन्म
किसी द्वीपीय देश के मंत्रालय में शाम 5 बजे मीटिंग चल रही है। विषय: “राजकोष खाली है, क्या करें?” एक बाबू सुझाव देता है, “साहब, एक नया मेडल बना देते हैं। नाम कल ही सोच लेंगे। बस उसे दे देंगे जो मंच पर सबसे पहले फूलमाला पहनता है।” चार दिन में डिजाइन, प्रिंटिंग, स्पेलिंग मिस्टेक सब हो जाता है। सर्टिफिकेट पर ‘रिपब्लिक’ की जगह ‘रिपब्लीक’ छप जाए तो भी चलेगा — भावना समझनी चाहिए।
नेता जी आते हैं, गले में मेडल पड़ता है, कैमरे क्लिक-क्लिक करते हैं, और उसी शाम “मैत्री-पैकेज” की घोषणा हो जाती है। जनता पूछती है, “ये पैकेज किस लिए?” जवाब आता है, “सांस्कृतिक संबंध मजबूत करने के लिए।” संस्कृति का मतलब: मेडल के बदले मदद।
दूसरा दृश्य: इतिहास बनाम इंस्टेंट-नूडल सम्मान
पहले के जमाने में सम्मान कमाने पड़ते थे। लोग सालों काम करते, दुनिया देखती, फिर कहीं जाकर कोई विश्वविद्यालय मानद डिग्री देता। अब जमाना इंस्टेंट का है — इंस्टेंट नूडल, इंस्टेंट पेमेंट, इंस्टेंट अवार्ड। आज सुबह अवार्ड का आइडिया, दोपहर तक रिबन, शाम तक समारोह।
एक पुराने नेता थे, कहते हैं कि कई देशों ने उन्हें सर्वोच्च सम्मान ऑफर किया, पर उन्होंने कहा “रहने दो, देश का काम ज्यादा जरूरी है।” आज के नेता का फॉर्मूला अलग है: “पहले सम्मान लो, फिर देखेंगे काम क्या था।”
तीसरा दृश्य: मेडल-इकॉनॉमिक्स का नया सिद्धांत
अर्थशास्त्र की किताबों में एक नया चैप्टर जुड़ना चाहिए — “मेडलॉमिक्स”। इसका पहला नियम: जितना भारी नाम, उतना हल्का खर्च। दूसरा नियम: स्पेलिंग गलत हो तो प्रामाणिकता बढ़ जाती है, क्योंकि ‘ऑरिजिनल हैंडमेड’ लगता है। तीसरा नियम: मेडल लेने वाला जितना खुश, देने वाले का बजट उतना टाइट।
दुनिया हंसती है कि सम्मान अब ‘कैश-ऑन-डिलीवरी’ हो गया है। आप मेडल दीजिए, हम पैकेज देंगे। यूपीआई भी चलेगा।
चौथा दृश्य: चांदनी चौक वर्सेज अंतरराष्ट्रीय बाजार
अगर मेडल ही पहनने का शौक है तो चांदनी चौक में 150 रुपये किलो के हिसाब से क्विंटल भर मिल जाएंगे। डिजाइन भी आप खुद चुन लो — ‘शेर-ए-हिंद’, ‘ब्रह्मांड-रक्षक’, ‘गैलेक्सी-गौरव’। पर नहीं, स्वदेशी मेडल में वो ‘फील’ कहां जो विदेशी टैग में है? विदेशी टैग पर अगर स्पेलिंग भी गलत हो तो उसे ‘लिमिटेड एडिशन’ कहकर और महंगा बेचा जा सकता है।
पांचवा दृश्य: जनता की डायरी
उधर जनता अपने घर में हिसाब लगाती है। दूध महंगा, दाल महंगी, स्कूल फीस महंगी। टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज: “एक और ऐतिहासिक सम्मान मिला, बदले में मैत्री-पैकेज की घोषणा।” दादाजी रिमोट फेंकते हुए कहते हैं, “बेटा, सम्मान पेट नहीं भरते।” पोता पूछता है, “तो फिर इतने सम्मान क्यों बटोरे जा रहे हैं दादाजी?” दादाजी खांसकर कहते हैं, “ताकि इतिहास में लिखा जा सके कि हमारे समय में मेडल की पैदावार सबसे ज्यादा हुई थी।”
छठा दृश्य: कूटनीति का नया वर्जन 2.0
पहले कूटनीति होती थी — तेल के बदले गेहूं, हथियार के बदले समर्थन। अब कूटनीति 2.0 है — सेल्फी के बदले सब्सिडी, मेडल के बदले मेमोरेंडम। विदेश मंत्रालय की फाइलों में अब दो फोल्डर हैं: 1. ‘दिए गए मेडल’, 2. ‘लिए गए पैकेज’। अधिकारी कन्फ्यूज हैं कि किसे ‘उपलब्धि’ में लिखें।
सातवां दृश्य: भविष्य की प्लानिंग
खबर है कि मंगल ग्रह पर भी एक ‘इंटरप्लेनेटरी पीस मेडल’ तैयार हो रहा है। शर्त बस इतनी है कि रॉकेट का खर्चा उठाना पड़ेगा। धरती के कुछ देश पहले ही लाइन में लग गए हैं। बोर्ड लगा है: “पहले आओ, पहले पाओ। स्पेशल डिस्काउंट ऑन बल्क सम्मान।”
इज्जत का शेयर बाजार
किसी ने सच कहा था — इज्जत कमानी पड़ती है, खरीदी नहीं जाती। पर शेयर बाजार में जब सेंटीमेंट से भाव चढ़ते हैं, तो इज्जत भी लिस्टेड हो जाती है। रोज नया आईपीओ — ‘नेशनल प्राइड लिमिटेड’ का। प्रमोटर वही जो मंच पर सबसे ऊंची कूद लगाए।
तो अगली बार जब आप सुनें कि “ऐतिहासिक सम्मान मिला”, तो समझ जाना कि इतिहास की किताब में एक और स्टीकर चिपक गया है। और स्टीकर के पीछे लिखा है — ‘बैटरी अलग से खरीदें’। बैटरी मतलब? आपका, हमारा, सबका टैक्स।
इसलिए सम्मान लेना बुरी बात नहीं, पर सम्मान के नाम पर अगर हर चौखट पर कटोरा लेकर खड़े हो जाओ, तो दुनिया ‘मामू’ नहीं, पूरा सर्कस बना देती है। और सर्कस में ताली तो बजती है, पर जोकर की इज्जत नहीं होती।
सीख: नेता चुनो तो ऐसा चुनो जिसे मेडल की नहीं, मेहनत की भूख हो। वरना दुनिया की फैक्ट्रियां चलती रहेंगी, और हम बिल भरते रहेंगे — ‘सम्मान-सेस’ के नाम पर।
_नोट: यह व्यंग्य किसी व्यक्ति-विशेष पर नहीं, ‘मेडल-प्रेम’ नामक वैश्विक बीमारी पर है। लक्षण दिखें तो तुरंत अपने विवेक से संपर्क करें। साइड-इफेक्ट्स में देश की जेब हल्की होना शामिल है।_
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 30 Jun 2026