- Friday World 9 Jun 2026
भारतीय राजनीति में सिद्धांतों की जगह सत्ता की भूख कितनी गहरी है, इसका ताजा उदाहरण पश्चिम बंगाल में देखने को मिल रहा है। कुछ ही साल पहले तृणमूल कांग्रेस (TMC) को भाजपा ‘भ्रष्टाचार की मां’, ‘कटमनी की पार्टी’, ‘हिंदू विरोधी’ और ‘घुसपैठियों का आश्रयदाता’ बताती थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर स्थानीय नेताओं तक हर भाषण में ममता बनर्जी की सरकार पर भ्रष्टाचार, तोड़फोड़ और सांप्रदायिकता के आरोप लगाए जाते थे। लेकिन २०२६ के विधानसभा चुनावों के बाद जब TMC के बड़े-बड़े नेता और सांसद भाजपा/एनडीए की ओर रुख कर रहे हैं, तो अचानक सारी समस्याएं गायब हो गईं। भ्रष्टाचार? वो तो अब ‘प्रगति’ का हिस्सा बन गया है।
यह है भाजपा की व्यावहारिक राजनीति — जहां देश, विचारधारा या नैतिकता नहीं, बल्कि कुर्सी और बहुमत सर्वोपरि है।
कल तक ‘भ्रष्ट’, आज ‘मसीहा’
सबसे प्रमुख उदाहरण है *मसुवेंदु अधिकारी। २०२०-२१ से पहले सुवेंदु TMC में ममता बनर्जी के करीबी और प्रभावशाली नेता थे। भाजपा उन्हें नारदा स्टिंग ऑपरेशन में रिश्वत लेते हुए दिखाए जाने का हवाला देकर ‘भ्रष्टाचार का चेहरा’ बताती थी। प्रधानमंत्री मोदी समेत कई भाजपा नेताओं ने उन्हें घोटालों से जोड़कर हमला किया था।
लेकिन २०२० में सुवेंदु भाजपा में शामिल हो गए। और अब? मई २०२६ में भाजपा की जीत के बाद वे पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बन चुके हैं। कल तक ‘कटमनी’ और ‘नारदा घोटाले’ का प्रतीक, आज ‘बंगाल का उद्धारक’।
यह अकेला मामला नहीं है।
- मुकुल रॉय: TMC के पूर्व अध्यक्ष, कई घोटालों (सरदा चिटफंड सहित) में नाम आने के बाद भाजपा में शामिल। उन्हें महत्वपूर्ण पद मिले।
- राजीब बनर्जी और अन्य पूर्व मंत्री: २०२१ के आसपास भाजपा में आए, जहां उन्हें स्वागत किया गया।
- हालिया घटनाक्रम: लगभग २० TMC सांसदों (काकोली घोष दस्तिदार समेत) का एनडीए के प्रति समर्थन और विद्रोह। दर्जनों TMC विधायक भी या तो भाजपा में शामिल हो चुके हैं या समर्थन दे रहे हैं।
भाजपा अब इन नेताओं को “विकास के लिए आए” बता रही है। लेकिन कुछ साल पहले इन्हीं को “ममता के भ्रष्ट गैंग” कहा जाता था।
मोदी जी के भाषणों में जिनका नाम लिया, वो आज कहां?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कई भाषणों और टीवी डिबेट संदर्भों में TMC नेताओं पर भ्रष्टाचार, कटमनी (कमीशन), जमीन घोटाले, चिटफंड और घुसपैठ को बढ़ावा देने के आरोप लगाए थे। कुछ प्रमुख नाम:
- सुवेंदु अधिकारी: नारदा स्टिंग में रिश्वत लेते कैमरे में कैद। मोदी रैलियों में इसका जिक्र करते थे।
- अन्य TMC मंत्री और नेता जिन पर सरदा, नारदा, शिक्षक भर्ती घोटाले आदि के आरोप थे — कई बाद में भाजपा में शामिल होकर मंत्री, सांसद या विधायक बने।
जब ये नेता TMC में थे तो ED-CBI की कार्रवाई की धमकियां दी जाती थीं। लेकिन भाजपा में आने के बाद कई मामलों में गति धीमी पड़ गई या उन्हें महत्वपूर्ण पद सौंप दिए गए। विपक्ष इसे “भ्रष्टाचार की धुलाई मशीन” कहता है — भाजपा में आओ, साफ हो जाओ।
सत्ता की राजनीति: सिद्धांतों का त्याग
भाजपा की आलोचना करने वाले कहते हैं कि पार्टी को भ्रष्टाचार से कोई दिक्कत नहीं है। समस्या तब होती है जब भ्रष्टाचारी विपक्ष में हो। अगर वही भाजपा या एनडीए में शामिल हो जाए तो “घर वापसी” का स्वागत है।
पश्चिम बंगाल में TMC पर लगाए गए आरोप थे:
- कटमनी कल्चर (प्रोजेक्ट में कमीशन)
- हिंदू विरोध (धर्म आधारित राजनीति)
- बांग्लादेशी घुसपैठियों को शरण
- प्रशासनिक भ्रष्टाचार और हिंसा
अब जब बड़े पैमाने पर TMC नेता भाजपा के साथ हैं, तो ये सारे आरोप अचानक “राजनीतिक प्रतिशोध” बन गए हैं। नए मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी अब “सुशासन” की बात कर रहे हैं।
यह घटनाक्रम भारतीय राजनीति की पुरानी परंपरा को दोहराता है — जहां सत्ता में आने के बाद विपक्षी आरोपों को भुला दिया जाता है। कांग्रेस के समय भी ऐसे कई उदाहरण थे, लेकिन भाजपा ने “न खाऊंगा, न खाने दूंगा” का नारा देकर नैतिक उच्चता का दावा किया था। आज वही नारा कई लोगों को खोखला लग रहा है।
राजनीतिक गणित और नैतिकता
२०२६ के चुनाव में भाजपा की जीत के बाद TMC में टूट हो गई है। ५८ से ज्यादा विधायकों ने विद्रोही गुट का साथ दिया, २० सांसदों ने एनडीए को समर्थन का पत्र लिखा। यह सामूहिक “घर वापसी” है या सत्ता के प्रति अवसरवाद?
भाजपा इसे “जनादेश का सम्मान” बता रही है। लेकिन सवाल उठता है — क्या सत्ता बनाए रखने के लिए किसी भी हद तक जाना उचित है? क्या भ्रष्टाचार के आरोपों को नजरअंदाज कर नेताओं को पद देना सही है?
विपक्षी दलों (TMC, कांग्रेस, वामपंथी) का कहना है कि भाजपा “TMC का कचरा” इकट्ठा कर रही है। वहीं भाजपा समर्थक इसे “स्वच्छ भारत अभियान” का राजनीतिक रूप बताते हैं। हकीकत शायद बीच की है — राजनीति में सिद्धांत अक्सर सुविधा के आगे झुक जाते हैं।
क्या सीख मिलती है?
यह घटनाक्रम भारतीय लोकतंत्र के लिए चेतावनी है।
1. व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा पार्टियों से ऊपर हो जाती है।
2. भ्रष्टाचार पर हमला सत्ता तक सीमित रहता है, सिद्धांतों तक नहीं पहुंचता।
3. जनता अंततः विकास, रोजगार और कानून-व्यवस्था देखती है, न कि पुराने आरोपों को।
अगर भाजपा वाकई “नया बंगाल” बनाना चाहती है तो उसे पुराने घोटालों की जांच आगे बढ़ानी चाहिए — चाहे आरोपी कोई भी हो। सिर्फ विपक्ष को घेरना और अपने लोगों को बचा लेना पर्याप्त नहीं।
TMC के शासन में बंगाल ने हिंसा, भ्रष्टाचार और आर्थिक पिछड़ापन देखा। अब भाजपा का मौका है साबित करने का कि वे अलग हैं। लेकिन सुवेंदु अधिकारी जैसे चेहरों को सीएम बनाकर यह साबित करना मुश्किल है।
: राजनीति में “शत्रु आज का, मित्र कल का” चलता है। लेकिन जब यह भ्रष्टाचार और नैतिकता के स्तर पर हो तो लोकतंत्र कमजोर होता है। भाजपा अगर वाकई विकसित भारत चाहती है तो उसे सत्ता के साथ-साथ सिद्धांत भी रखने होंगे। वरना “कुर्सी की राजनीति” का आरोप हमेशा लगा रहेगा।
जनता अंतिम फैसला करेगी — अगले चुनाव में।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 9 Jun 2026