-Friday World 7 Jul 2026
तेहरान/वॉशिंगटन
ईरान में जब शोक की लहर है और सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार की तैयारियां अपने चरम पर हैं, उसी बीच ईरानी मीडिया ने एक बड़ा दावा किया है। ईरान के सरकारी चैनलों और सरकारी प्रवक्ताओं के अनुसार, अमेरिका ने अंतिम संस्कार से एक सप्ताह पहले ही एक "राजनयिक अभियान" शुरू कर दिया था। इस अभियान का मकसद था कि दुनिया भर के देश इस कार्यक्रम में शामिल न हों।
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि इस अभियान में खुद अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और दुनिया भर में तैनात अमेरिकी राजदूत शामिल थे। उनका काम था विभिन्न देशों की सरकारों से संपर्क करके उन पर दबाव बनाना ताकि वे तेहरान में होने वाले इस ऐतिहासिक अंतिम संस्कार में अपनी उपस्थिति दर्ज न कराएं।
अमेरिका का कथित प्लान और ईरान का जवाब
ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, वॉशिंगटन ने इस मुद्दे को "क्षेत्रीय स्थिरता" और "मानवाधिकारों" से जोड़कर पेश किया। अमेरिकी दूतावासों को निर्देश दिए गए थे कि वे मेजबान देशों को यह समझाएं कि इस कार्यक्रम में शामिल होना "गलत संदेश" देगा।
हालांकि ईरान का कहना है कि अमेरिका इस अभियान में पूरी तरह सफल नहीं हो पाया। ईरानी प्रवक्ता के अनुसार, "उन्होंने धमकाया, डराया और दबाव बनाया। लेकिन दुनिया ने ईरान के महान नेता के प्रति अपना सम्मान नहीं छोड़ा।"
ईरान ने जिन देशों का जिक्र किया है उनके अनुसार:
- पूर्वी यूरोप के 3 देश
- अफ्रीका के 5 देश
- गल्फ क्षेत्र के 2 देश
- पूर्वी एशिया के 2 देश
इन देशों ने अंतिम संस्कार में आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल न भेजने का फैसला किया है। बाकी दुनिया के अधिकांश देशों ने या तो अपने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या उच्च स्तरीय प्रतिनिधि भेजने की पुष्टि की है।
राजनय और शोक का टकराव
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में किसी नेता के अंतिम संस्कार में शामिल होना या न होना हमेशा एक कूटनीतिक संदेश माना जाता है। खामेनेई ईरान की राजनीति, धर्म और विदेश नीति के केंद्र रहे हैं। पिछले चार दशकों से वे ईरान की दिशा तय कर रहे थे। ऐसे में उनका अंतिम संस्कार सिर्फ ईरान का मामला नहीं, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया और दुनिया के लिए एक महत्वपूर्ण घटना बन गया है।
विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका नहीं चाहता था कि इस मंच का इस्तेमाल ईरान अपने पक्ष में "जनसमर्थन" और "अंतरराष्ट्रीय वैधता" दिखाने के लिए करे। इसलिए वॉशिंगटन ने पहले से ही अपने सहयोगी देशों को लामबंद करना शुरू कर दिया।
दूसरी तरफ ईरान इसे "शोक पर राजनीति" करार दे रहा है। सरकारी टीवी पर लगातार यह दिखाया जा रहा है कि कैसे "दुनिया का बहुमत" खामेनेई को श्रद्धांजलि देने तेहरान आ रहा है, जबकि "कुछ गिने-चुने देश" अमेरिकी दबाव में पीछे हट गए।
कौन आया, कौन नहीं आया?
ईरान ने अभी आधिकारिक सूची जारी नहीं की है, लेकिन अब तक मिली जानकारी के अनुसार रूस, चीन, तुर्की, पाकिस्तान, इराक, लेबनान, सीरिया, वेनेजुएला और क्यूबा जैसे देशों के शीर्ष नेता या उनके विशेष दूत अंतिम संस्कार में शामिल होंगे।
वहीं जिन देशों पर अमेरिका के दबाव का असर बताया जा रहा है उनमें पूर्वी यूरोप के कुछ नाटो सदस्य, अफ्रीका के कुछ देश जो अमेरिकी सहायता पर निर्भर हैं, गल्फ के दो देश और पूर्वी एशिया के दो सहयोगी देश शामिल हैं। ईरान ने इन देशों के नाम सार्वजनिक नहीं किए हैं, लेकिन कहा है कि "इतिहास इनके इस फैसले को याद रखेगा।"
वॉशिंगटन की चुप्पी
अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने ईरान के इन आरोपों पर सीधी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने सिर्फ इतना कहा कि "अमेरिका अपनी विदेश नीति के अनुसार फैसले लेता है और अपने सहयोगियों से संवाद करता रहता है।"
लेकिन वॉशिंगटन में बैठे कई राजनयिकों ने निजी तौर पर माना कि अमेरिका ने इस मुद्दे पर अपने सहयोगियों से बातचीत जरूर की थी। उनका तर्क था कि इस समय ईरान को "अंतरराष्ट्रीय मंच" देना सही नहीं होगा।
ईरान के अंदर माहौल
तेहरान की सड़कों पर इस समय लाखों लोग उमड़े हुए हैं। स्कूल, बाजार, दफ्तर बंद हैं। हर तरफ काले झंडे और बैनर लगे हैं। टीवी पर लगातार खामेनेई के भाषण और उनकी जिंदगी के किस्से दिखाए जा रहे हैं।
आम ईरानी नागरिकों में गुस्सा और गर्व दोनों दिखाई दे रहा है। एक छात्र ने कहा, "अमेरिका सोचता है कि वो हमें रोक लेगा। लेकिन हमारा नेता पूरी दुनिया का नेता था। जो नहीं आएंगे, वो खुद अपनी इज्जत गंवाएंगे।"
वहीं एक दुकानदार ने कहा, "राजनीति अपनी जगह है। लेकिन किसी के जाने पर इस तरह दबाव बनाना ठीक नहीं है।"
इसका आगे क्या असर होगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे प्रकरण के तीन बड़े असर होंगे:
1. ईरान-अमेरिका तनाव और बढ़ेगा: ईरान इस मुद्दे को लंबे समय तक उठाएगा। वह इसे "अमेरिकी हस्तक्षेप" और "शोक का अपमान" बताकर अपनी जनता और सहयोगी देशों को एकजुट करने की कोशिश करेगा।
2. नए गठबंधन बनेंगे: जो देश अंतिम संस्कार में आएंगे, उन्हें ईरान अपना "सच्चा दोस्त" मानेगा। आने वाले समय में इन देशों के साथ ईरान के व्यापार और सैन्य संबंध और मजबूत हो सकते हैं।
3. गल्फ और पश्चिम एशिया की राजनीति: गल्फ के जिन दो देशों ने नहीं आने का फैसला किया है, उन पर ईरान आगे चलकर कूटनीतिक दबाव बना सकता है। वहीं जो आएंगे, उनसे रिश्ते गर्म हो सकते हैं।
इतिहास क्या कहता है?
यह पहली बार नहीं है जब किसी नेता के अंतिम संस्कार पर राजनीति हुई हो। 2016 में क्यूबा के फिदेल कास्त्रो के अंतिम संस्कार के समय भी अमेरिका ने कई देशों पर दबाव बनाया था। 2013 में दक्षिण अफ्रीका के नेल्सन मंडेला के अंतिम संस्कार में भी कई देशों की मौजूदगी या अनुपस्थिति को कूटनीतिक चश्मे से देखा गया था।
लेकिन खामेनेई का मामला अलग है क्योंकि ईरान और अमेरिका के बीच पिछले 45 सालों से सीधी दुश्मनी है। परमाणु समझौता, प्रतिबंध, ड्रोन हमले और क्षेत्रीय युद्ध - इन सबकी पृष्ठभूमि में यह अंतिम संस्कार हो रहा है।
ईरान का आरोप सही है या गलत, यह आने वाले दिनों में और दस्तावेजों से साफ होगा। लेकिन इतना तय है कि खामेनेई का अंतिम संस्कार सिर्फ एक धार्मिक रस्म नहीं रह गया है। यह अब अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का एक बड़ा युद्ध का मैदान बन गया है।
एक तरफ अमेरिका है जो ईरान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करना चाहता है। दूसरी तरफ ईरान है जो दुनिया को यह दिखाना चाहता है कि प्रतिबंधों और दबाव के बावजूद उसके दोस्त कम नहीं हुए हैं।
तेहरान की धरती पर अब सिर्फ शोक नहीं, बल्कि दुनिया की नई कूटनीति भी लिखी जा रही है। आने वाले हफ्ते तय करेंगे कि इस "अंतिम विदाई" का असर पश्चिम एशिया की राजनीति पर कितना गहरा पड़ता है।
फिलहाल ईरान ने दुनिया से अपील की है कि "राजनीति को एक तरफ रखकर मानवता के नाते इस शोक में शामिल हों।" वहीं अमेरिका ने अपने सहयोगियों से "सावधानी" बरतने को कहा है।
दुनिया देख रही है कि शोक बड़ा है या राजनीति।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 7 Jul 2026