-Friday World Jul 16 2026
आजम खान का ड्रीम प्रोजेक्ट संकट में, रामपुर विकास प्राधिकरण ने जारी किया ध्वस्तीकरण नोटिस, हजारों छात्रों के भविष्य पर सवाल
उत्तर प्रदेश के रामपुर में स्थित मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी एक बार फिर सुर्खियों में है। कभी "माइनॉरिटी के बच्चों के लिए उच्च शिक्षा का सपना" कहकर शुरू की गई यह यूनिवर्सिटी अब कानूनी और प्रशासनिक घेरे में फंसती नजर आ रही है। रामपुर विकास प्राधिकरण यानी आरडीए ने यूनिवर्सिटी परिसर में बने 40 भवनों में से 38 भवनों को गिराने का आदेश जारी कर दिया है।
प्राधिकरण का तर्क साफ है: ये सभी भवन बिना स्वीकृत नक्शे के बनाए गए हैं और उत्तर प्रदेश नगर योजना एवं विकास अधिनियम 1973 का उल्लंघन करते हैं। इस आदेश के बाद न सिर्फ आजम खान के इस ड्रीम प्रोजेक्ट का भविष्य अधर में लटक गया है, बल्कि यहां पढ़ रहे हजारों छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों के सामने भी अनिश्चितता खड़ी हो गई है।
मामला क्या है
रामपुर विकास प्राधिकरण ने हाल ही में जौहर यूनिवर्सिटी परिसर का निरीक्षण कराया था। निरीक्षण रिपोर्ट में सामने आया कि परिसर के भीतर बने अधिकांश भवनों के पास आरडीए से पास नक्शा नहीं है। नियमों के अनुसार किसी भी शैक्षणिक, आवासीय या व्यावसायिक भवन का निर्माण शुरू करने से पहले स्थानीय विकास प्राधिकरण से नक्शा पास कराना अनिवार्य होता है।
आरडीए के उपाध्यक्ष ने रिपोर्ट के आधार पर 38 भवनों को अवैध घोषित करते हुए ध्वस्तीकरण का आदेश जारी किया। आदेश में कहा गया है कि सात दिन के भीतर यूनिवर्सिटी प्रबंधन को अपना पक्ष रखना होगा। अगर संतोषजनक जवाब नहीं मिला तो बुलडोजर की कार्रवाई शुरू कर दी जाएगी।
जिन भवनों को निशाने पर लिया गया है उनमें कुछ हॉस्टल, क्लासरूम ब्लॉक, प्रशासनिक भवन और अन्य सहायक संरचनाएं शामिल हैं। सिर्फ 2 भवन ऐसे पाए गए जिनके कागज नियमानुसार पूरे थे।
जौहर यूनिवर्सिटी का सफर
मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी की नींव 2006 में रखी गई थी। इसे समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और रामपुर से कई बार विधायक व मंत्री रहे आजम खान का ड्रीम प्रोजेक्ट माना जाता है। यूनिवर्सिटी का नाम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और प्रसिद्ध विद्वान मौलाना मोहम्मद अली जौहर के नाम पर रखा गया।
शुरुआत में इसे एक निजी विश्वविद्यालय के रूप में विकसित किया गया जिसका उद्देश्य अल्पसंख्यक समुदाय के छात्रों को सस्ती और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना था। समय के साथ यहां इंजीनियरिंग, मेडिकल, लॉ, आर्ट्स और अन्य संकाय शुरू किए गए। परिसर सैकड़ों एकड़ में फैला है और इसमें मस्जिद, लाइब्रेरी, खेल परिसर और आवासीय सुविधाएं भी हैं।
2019 में योगी सरकार के आने के बाद यूनिवर्सिटी की जमीन, निर्माण और फंडिंग को लेकर कई जांचें शुरू हुईं। आरोप लगे कि कृषि भूमि को गलत तरीके से यूनिवर्सिटी के नाम किया गया, सरकारी योजनाओं का दुरुपयोग हुआ और कई निर्माण मानकों को ताक पर रखा गया। आजम खान को इन मामलों में जेल भी जाना पड़ा और बाद में उन्हें जमानत मिली।
आरडीए का आदेश और कानूनी आधार
रामपुर विकास प्राधिकरण ने अपने नोटिस में तीन मुख्य बिंदु उठाए हैं:
1. बिना नक्शा निर्माण: 38 भवनों का निर्माण आरडीए से नक्शा पास कराए बिना किया गया।
2. भू-उपयोग परिवर्तन: कुछ जगहों पर कृषि भूमि का उपयोग शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए किया गया, जिसकी अनुमति प्रक्रिया पूरी नहीं थी।
3. सुरक्षा मानकों की अनदेखी: भवनों में फायर सेफ्टी, पार्किंग और अन्य बुनियादी मानकों का पालन नहीं मिला।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार धारा 27 और धारा 28 के तहत प्राधिकरण को अधिकार है कि वह अवैध निर्माण को गिराने का आदेश दे। हालांकि अंतिम कार्रवाई से पहले सुनवाई का अवसर देना जरूरी होता है। इसी प्रक्रिया के तहत यूनिवर्सिटी प्रबंधन को अपना जवाब देने के लिए समय दिया गया है।
यूनिवर्सिटी प्रबंधन का पक्ष
जौहर यूनिवर्सिटी प्रशासन ने अब तक आधिकारिक तौर पर विस्तृत बयान नहीं दिया है। सूत्रों के अनुसार प्रबंधन का कहना है कि यूनिवर्सिटी को राज्य सरकार से मान्यता प्राप्त है और उच्च शिक्षा विभाग की अनुमति के बाद ही निर्माण कार्य शुरू हुए थे। उनका तर्क है कि कुछ तकनीकी कमियां हो सकती हैं जिन्हें दस्तावेज जमा करके दूर किया जाएगा।
यूनिवर्सिटी से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि हम सभी कागज इकट्ठा कर रहे हैं। आरडीए के सामने अपना पक्ष मजबूती से रखा जाएगा। छात्रों की पढ़ाई बाधित न हो यह हमारी प्राथमिकता है।
छात्रों और अभिभावकों में चिंता
इस आदेश के बाद परिसर में पढ़ रहे करीब 5000 से अधिक छात्रों और उनके अभिभावकों में बेचैनी है। कई छात्र अन्य जिलों और राज्यों से यहां पढ़ने आए हैं। हॉस्टल गिराने की बात सामने आने के बाद सवाल उठ रहा है कि अगर कार्रवाई हुई तो इन छात्रों का क्या होगा।
एक छात्र ने कहा कि हमारा सेशन बीच में है। अगर क्लासरूम और हॉस्टल पर असर पड़ा तो हमारी पढ़ाई का क्या होगा। अभिभावक भी फीस और भविष्य को लेकर चिंतित हैं।
शिक्षक संगठनों ने मांग की है कि सरकार और प्राधिकरण छात्रों के हित को ध्यान में रखकर कोई बीच का रास्ता निकाले।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
इस मुद्दे पर राजनीति भी तेज हो गई है।
समाजवादी पार्टी: सपा नेताओं का कहना है कि यह कार्रवाई राजनीतिक द्वेष के कारण की जा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि आजम खान को टारगेट करने के लिए उनके ड्रीम प्रोजेक्ट को निशाना बनाया जा रहा है। सपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि अगर कागजों में कोई कमी है तो उसे पूरा करने का मौका दिया जाना चाहिए, सीधे ध्वस्तीकरण ठीक नहीं।
भाजपा: सत्ताधारी दल का कहना है कि कानून सबके लिए बराबर है। अगर नियमों का उल्लंघन हुआ है तो कार्रवाई जरूरी है। भाजपा प्रवक्ता ने कहा कि शिक्षा के नाम पर अवैध निर्माण को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
स्थानीय लोग: रामपुर के कई स्थानीय लोगों की राय बंटी हुई है। कुछ लोग मानते हैं कि यूनिवर्सिटी से शहर को पहचान और रोजगार मिला। वहीं कुछ का कहना है कि नियमों का पालन होना ही चाहिए।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
शहरी नियोजन के विशेषज्ञ डॉ. राकेश वर्मा बताते हैं कि किसी भी बड़े शैक्षणिक संस्थान में नक्शा पास कराना सिर्फ औपचारिकता नहीं है। इससे भवन की मजबूती, सुरक्षा और भविष्य में विस्तार की योजना तय होती है। अगर शुरुआत में ही प्रक्रिया पूरी नहीं की गई तो बाद में दिक्कतें आना तय है।
कानून के जानकार अधिवक्ता सैयद फरहान का कहना है कि प्राधिकरण के पास ध्वस्तीकरण का अधिकार है लेकिन उसे नेचुरल जस्टिस के सिद्धांत का पालन करना होगा। यानी पहले सुनवाई, फिर आदेश। कोर्ट भी अक्सर छात्रों के भविष्य को देखते हुए तुरंत ध्वस्तीकरण पर रोक लगा देती है।
अब आगे क्या होगा
फिलहाल गेंद यूनिवर्सिटी प्रबंधन के पाले में है। अगले सात दिनों में उन्हें आरडीए के सामने सभी दस्तावेज और स्पष्टीकरण देने हैं। इसके तीन संभावित रास्ते हैं:
1. कागज पूरे करना: अगर यूनिवर्सिटी साबित कर दे कि निर्माण नियमानुसार है या कंपाउंडिंग फीस देकर नियमित किया जा सकता है तो बड़ी कार्रवाई टल सकती है।
2. कोर्ट जाना: अगर आरडीए अपना आदेश वापस नहीं लेता तो प्रबंधन हाईकोर्ट में चुनौती दे सकता है और स्टे की मांग कर सकता है।
3. आंशिक ध्वस्तीकरण: कुछ भवनों को नियमित कर कुछ को गिराने का समझौता भी संभव है।
सरकार पर भी दबाव है कि वह छात्रों की पढ़ाई प्रभावित न होने दे। शिक्षा विभाग ने भी मामले पर रिपोर्ट मांगी है।
बड़ा सवाल: विकास बनाम नियम
जौहर यूनिवर्सिटी का मामला सिर्फ एक भवन का नहीं है। यह सवाल खड़ा करता है कि विकास के बड़े प्रोजेक्ट में नियमों की अनदेखी कहां तक जायज है। एक तरफ शिक्षा और रोजगार का लक्ष्य है, दूसरी तरफ शहरी नियोजन और कानून का पालन।
रामपुर जैसे शहर में एक बड़े विश्वविद्यालय का होना गर्व की बात है। लेकिन अगर वह कानूनों को दरकिनार करके बना है तो उसका टिक पाना मुश्किल होगा। विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे मामलों में सरकार, प्राधिकरण और संस्थान तीनों को मिलकर समाधान निकालना चाहिए ताकि छात्रों का नुकसान न हो।
रामपुर विकास प्राधिकरण का ध्वस्तीकरण आदेश जौहर यूनिवर्सिटी के लिए एक बड़ा झटका है। 40 में से 38 भवनों पर तलवार लटकने से न सिर्फ आजम खान के राजनीतिक करियर से जुड़ा यह प्रोजेक्ट संकट में है, बल्कि हजारों छात्रों का भविष्य भी दांव पर लग गया है।
अगले कुछ दिन बेहद अहम हैं। यूनिवर्सिटी प्रबंधन क्या दस्तावेज पेश करता है, आरडीए क्या रुख अपनाता है और कोर्ट क्या फैसला देता है, इन सब पर पूरे प्रदेश की नजर है।
फिलहाल इतना तय है कि शिक्षा के मंदिर में कानून की घंटी बज चुकी है। अब देखना यह है कि यह घंटी समाधान की तरफ ले जाएगी या टकराव की तरफ।
Sajjadali Nayani ✍
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