Breaking

यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Sunday, 12 July 2026

ट्रंप के सबसे करीबी सहयोगी लिंडसे ग्राहम का निधन: 500% टैरिफ वाली धमकी से लेकर यूक्रेन कूटनीति तक, एक विवादित सफर का अंत

ट्रंप के सबसे करीबी सहयोगी लिंडसे ग्राहम का निधन: 500% टैरिफ वाली धमकी से लेकर यूक्रेन कूटनीति तक, एक विवादित सफर का अंत
- Friday World Jul 13 2026 
अमेरिका की राजनीति में एक युग का अंत

वॉशिंगटन से आई खबर ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया है। डोनाल्ड ट्रंप के सबसे भरोसेमंद साथियों में गिने जाने वाले वरिष्ठ रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम का 71 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। साउथ कैरोलिना से लगातार चार बार सीनेट में चुने गए ग्राहम पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे और अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था।

रिपब्लिकन पार्टी के नेताओं ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा कि "लिंडसे एक योद्धा थे, एक सच्चे देशभक्त थे। अमेरिका ने आज अपना एक सबसे मजबूत आवाज खो दी है।"

कीव से लौटने के बाद धीमी पड़ी थी सक्रियता

निधन से कुछ हफ्ते पहले ही लिंडसे ग्राहम यूक्रेन की राजधानी कीव के दौरे पर गए थे। वहां उन्होंने राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की से मुलाकात की और रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर अमेरिका की नीति पर चर्चा की।

कीव में दिए अपने आखिरी बड़े बयान में ग्राहम ने कहा था कि अगर शांति वार्ता में व्लादिमीर पुतिन को सीधे शामिल किया जाए और चीन मध्यस्थता की भूमिका निभाए, तो इस वैश्विक संघर्ष का समाधान जल्दी निकल सकता है। इस बयान के बाद वह सार्वजनिक मंचों पर बहुत कम दिखाई दिए। जानकारों का मानना है कि उसी समय उनकी तबीयत बिगड़नी शुरू हो गई थी।

"भारत पर 500% टैरिफ" वाला बयान और कच्चे तेल को लेकर टकराव

लिंडसे ग्राहम हमेशा अपनी आक्रामक विदेश नीति के लिए चर्चा में रहे। खासकर भारत को लेकर उनका रुख बेहद सख्त माना जाता था।

रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान उन्होंने संसद में और मीडिया में कई बार कहा था कि अगर भारत रूस से कच्चा तेल खरीदना बंद नहीं करता है, तो अमेरिका को भारत की अर्थव्यवस्था पर कड़ा दबाव बनाना चाहिए। इसी दौरान उन्होंने एक बार यहां तक कह दिया था कि भारत पर 500 प्रतिशत तक का टैरिफ लगाया जा सकता है।

उनका तर्क था कि भारत सस्ता रूसी तेल खरीदकर अप्रत्यक्ष रूप से रूस की मदद कर रहा है और यह अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ है। भारत सरकार ने हमेशा इस तरह के बयानों का जवाब संतुलन और ऊर्जा सुरक्षा के आधार पर दिया।

ग्राहम के इस बयान के बाद भारत-अमेरिका संबंधों में कुछ समय के लिए तनाव भी देखा गया था, लेकिन द्विपक्षीय व्यापार और रणनीतिक साझेदारी आगे बढ़ती रही।

एयरफोर्स से सीनेट तक: एक लंबी राजनीतिक यात्रा

लिंडसे ग्राहम का जन्म 9 जुलाई 1955 को साउथ कैरोलिना के सेंट्रल शहर में हुआ था। राजनीति में आने से पहले वह पेशे से वकील थे और अमेरिकी वायुसेना में भी सेवा दे चुके थे। फौज में रहते हुए उन्होंने जज एडवोकेट जनरल के रूप में काम किया।

2002 में वह पहली बार अमेरिकी सीनेट के लिए चुने गए। इसके बाद 2008, 2014 और 2020 में वह लगातार जीतते गए। 2019 से 2021 तक उन्होंने सीनेट की न्यायपालिका समिति के अध्यक्ष के रूप में काम किया। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट में कई महत्वपूर्ण नियुक्तियों में उनकी भूमिका अहम रही।

ग्राहम को रिपब्लिकन पार्टी के भीतर "ट्रंप के करीबी" के रूप में देखा जाता था, लेकिन वह पार्टी लाइन से हटकर भी बोलने के लिए जाने जाते थे। विदेश नीति, रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा उनके सबसे मजबूत मुद्दे थे।

मध्य-पूर्व और ईरान पर पैनी नजर

ग्राहम वैश्विक कूटनीति में मध्य-पूर्व को सबसे संवेदनशील क्षेत्र मानते थे। वह अक्सर कहते थे कि अमेरिका को इजरायल, सऊदी अरब और अन्य सहयोगियों के साथ खड़ा रहना चाहिए।

अपने अंतिम दिनों में भी उन्होंने ईरान को लेकर चिंता जताई थी। उन्होंने कहा था कि होर्मुज जलडमरूमध्य को खुला रखने के लिए ईरान का राजी होना अच्छी बात है, लेकिन ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उस पर होने वाली बातचीत को लेकर अमेरिका को सतर्क रहना होगा। उनका मानना था कि ईरान और अमेरिका के वार्ताकारों के दावे अलग-अलग हैं, इसलिए किसी भी समझौते से पहले पूरी जांच जरूरी है।

ट्रंप प्रशासन में भूमिका

डोनाल्ड ट्रंप के पहले और दूसरे कार्यकाल में लिंडसे ग्राहम व्हाइट हाउस के सबसे भरोसेमंद सलाहकारों में से एक थे। वह अक्सर ट्रंप के साथ गोल्फ खेलते, नीतियों पर चर्चा करते और कांग्रेस में ट्रंप के एजेंडे को पास कराने में मदद करते थे।

आर्थिक नीतियों में वह टैरिफ और "अमेरिका फर्स्ट" के समर्थक थे। रक्षा नीति में वह रूस और चीन दोनों को अमेरिका के लिए बड़ी चुनौती मानते थे। यूक्रेन को सैन्य मदद देने के वह सबसे बड़े समर्थकों में से थे।

विवाद और प्रशंसा दोनों साथ चले

लिंडसे ग्राहम का राजनीतिक जीवन विवादों से खाली नहीं था। भारत पर 500% टैरिफ की धमकी, रूस पर कड़े प्रतिबंध, चीन के खिलाफ मुखर बयान और आप्रवासन नीति पर सख्त रुख के कारण वह अक्सर आलोचना का शिकार भी हुए।

लेकिन उनके समर्थक उन्हें एक सच्चा देशभक्त मानते थे जो बिना डरे अपनी बात रखता था। डेमोक्रेट नेता भी मानते थे कि ग्राहम व्यक्तिगत रूप से मिलनसार थे और द्विदलीय काम करने में विश्वास रखते थे।

भारत-अमेरिका संबंधों पर क्या असर पड़ेगा

ग्राहम के निधन के बाद भारत-अमेरिका संबंधों को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। वह उन नेताओं में से थे जो व्यापार और ऊर्जा को कूटनीति का हथियार बनाकर इस्तेमाल करने के पक्ष में थे।

विशेषज्ञों का कहना है कि ग्राहम की जगह लेने वाला नेता शायद उतना मुखर नहीं होगा। भारत और अमेरिका के बीच रक्षा, तकनीक और क्वाड जैसे मंचों पर सहयोग पहले से मजबूत है। ऐसे में आने वाले समय में संबंध और व्यावहारिक दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

हालांकि ऊर्जा सुरक्षा को लेकर अमेरिका के अंदर बहस जारी रहेगी। रूस से तेल खरीद का मुद्दा अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

सहयोगियों की प्रतिक्रिया

साउथ कैरोलिना के गवर्नर ने कहा कि "लिंडसे ने अपने राज्य और देश के लिए 20 साल से ज्यादा सेवा की। वह एक सच्चे सिपाही थे।"

यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने भी शोक जताते हुए कहा कि "ग्राहम यूक्रेन के बड़े मित्र थे। उन्होंने लोकतंत्र के लिए आवाज उठाई।"

रिपब्लिकन पार्टी के कई नेताओं ने कहा कि सीनेट में अब एक खालीपन महसूस होगा जिसे भरना आसान नहीं होगा।

एक जटिल विरासत

लिंडसे ग्राहम की विरासत को एक लाइन में समेटना मुश्किल है। वह एक तरफ ट्रंप के सबसे वफादार साथी थे, दूसरी तरफ अपनी पार्टी के भीतर अलग राय रखने वाले नेता भी थे।

वह युद्ध और शांति दोनों की बात करते थे। वह मुक्त व्यापार के समर्थक थे लेकिन जरूरत पड़ने पर टैरिफ की धमकी भी देते थे। वह भारत के साथ दोस्ती चाहते थे लेकिन ऊर्जा नीति को लेकर सख्त भी थे।

इसी विरोधाभास ने उन्हें अमेरिकी राजनीति का एक अहम चेहरा बना दिया था।

आगे का रास्ता

अब साउथ कैरोलिना में उनकी सीट के लिए उपचुनाव होगा। रिपब्लिकन पार्टी को एक ऐसा उम्मीदवार ढूंढना होगा जो ग्राहम जैसी पकड़ और प्रभाव रख सके।

वहीं विदेश नीति के मोर्चे पर अमेरिका को यह तय करना होगा कि रूस-यूक्रेन युद्ध, चीन, ईरान और भारत जैसे मुद्दों पर आगे कैसे बढ़ा जाए।

ग्राहम के जाने से वॉशिंगटन में एक ऐसी आवाज खामोश हो गई है जो हमेशा तेज, स्पष्ट और कभी-कभी विवादित होती थी।

लिंडसे ग्राहम का जाना सिर्फ एक सीनेटर का निधन नहीं है। यह अमेरिकी राजनीति में उस दौर के अंत का प्रतीक है जहां विदेश नीति, व्यापार और सुरक्षा को एक साथ जोड़कर देखा जाता था।

भारत के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण मोड़ है। आने वाले महीनों में अमेरिका की नई सीनेट नेतृत्व यह तय करेगी कि भारत के साथ संबंधों को किस दिशा में ले जाना है।

फिलहाल पूरी दुनिया एक ऐसे नेता को याद कर रही है जो बिना लाग-लपेट के बोलता था, जो दोस्ती और दुश्मनी दोनों को खुलकर परिभाषित करता था।

ट्रंप के सबसे करीबी सहयोगी, एयरफोर्स के पूर्व अधिकारी, चार बार के सीनेटर लिंडसे ग्राहम अब नहीं रहे। लेकिन उनके बयान, उनकी नीतियां और उनका प्रभाव अमेरिकी राजनीति में लंबे समय तक गूंजता रहेगा।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World Jul 13 2026