-Friday World 1 Jul 2026
नई दिल्ली, 1 जुलाई 2026 – विश्व राजनीति का नाटक आजकल खुलेआम चल रहा है। मंच पर अमेरिका, रूस और चीन एक-दूसरे के विरुद्ध खड़े दिखते हैं, लेकिन पर्दे के पीछे उनका गठजोड़ सत्ता और संसाधनों को तीन हिस्सों में बाँटकर दुनिया पर अपना वर्चस्व बनाए रखने का सूक्ष्म खेल है। आज की यह स्थिति मध्यकालीन राजाओं की विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं से अलग नहीं है। लोकतंत्र, समाजवाद या साम्यवाद के आधुनिक आवरण में छिपे ये महाशक्तिशाली खिलाड़ी प्रजा के नाम पर अपनी सत्ता को मजबूत करने के लिए बाहरी दुश्मन गढ़ते हैं और युद्धों का सहारा लेते हैं।
आधुनिक विश्व में मध्यकाल की वापसी
आज विश्व में कहीं यूक्रेन में युद्ध चल रहा है, तो कहीं ताइवान के आसपास तनाव, मध्य पूर्व में संघर्ष, अफ्रीका में संसाधन युद्ध और दक्षिण चीन सागर में दावेदारियाँ। ये सब संकेत दे रहे हैं कि 21वीं सदी में भी शक्ति का खेल वैसा ही है जैसा मध्यकाल में राजाओं के बीच प्रादेशिक प्रभुत्व के लिए होता था।
चाहे अमेरिका हो, जो खुद को “विश्व का लोकतंत्र रक्षक” बताता है, रूस जो अपनी “ऐतिहासिक सुरक्षा” की बात करता है, या चीन जो “शांतिपूर्ण उदय” का नारा देता है – तीनों ही विस्तारवाद और साम्राज्यवाद की राह पर चल रहे हैं। जाहिरा तौर पर वे एक-दूसरे के विरोधी हैं, लेकिन वास्तव में वे एक-दूसरे के विस्तार को मौन समर्थन देते हैं। इससे सत्ता का त्रिकोणीय संतुलन बना रहता है और कोई भी एक अकेला विश्व पर पूर्ण नियंत्रण नहीं स्थापित कर पाता।
अमेरिका: वैश्विक पुलिसमैन या साम्राज्यवादी शक्ति?
अमेरिका अपने आपको विश्व की सबसे पुरानी लोकतांत्रिक शक्ति बताता है, लेकिन उसकी विदेश नीति बार-बार साम्राज्यवादी चरित्र उजागर करती है। वेनेजुएला पर आर्थिक दबाव, क्यूबा पर दशकों लंबा प्रतिबंध, इराक और अफगानिस्तान में सैन्य हस्तक्षेप, मध्य पूर्व में गुप्तचर गतिविधियाँ – ये सभी घटनाएँ मात्र सुरक्षा की जरूरत नहीं, बल्कि वैश्विक प्रभुत्व बनाए रखने की रणनीति हैं।
अमेरिका डॉलर की ताकत, NATO जैसे सैन्य गठबंधनों और टेक्नोलॉजी पर नियंत्रण के जरिए दुनिया को अपनी शर्तों पर चलाना चाहता है। जब भी कोई देश अमेरिकी हितों के खिलाफ जाता है, तो “लोकतंत्र और मानवाधिकार” का झंडा उठा लिया जाता है। लेकिन जब वही अमेरिकी कंपनियाँ सऊदी अरब या अन्य तानाशाही व्यवस्थाओं के साथ तेल के सौदे करती हैं, तो लोकतंत्र की बात गायब हो जाती है।
रूस: ऐतिहासिक महानता का दावा
रूस यूक्रेन युद्ध के माध्यम से अपनी “क्षेत्रीय सुरक्षा” और “स्लाव सभ्यता” की रक्षा करने का दावा करता है। सोवियत संघ के विघटन के बाद खोई हुई महानता को वापस पाने की कोशिश में रूस ने अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन किया है। क्रीमिया, जॉर्जिया, सीरिया और अब यूक्रेन – रूस का विस्तारवादी रवैया स्पष्ट है।
रूस ऊर्जा संसाधनों (तेल और गैस) को हथियार की तरह इस्तेमाल करता है। यूरोप को गैस सप्लाई बंद करके वह अपनी शर्तें मनवाने की कोशिश करता है। चीन के साथ उसका रणनीतिक साझेदारी भी इसी खेल का हिस्सा है। दोनों देश मिलकर अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती देते हैं, लेकिन अपने-अपने क्षेत्रों में विस्तार जारी रखते हैं।
चीन: आर्थिक साम्राज्यवाद का नया चेहरा
चीन दुनिया का सबसे बड़ा कारखाना और आर्थिक महाशक्ति बन चुका है। “वन बेल्ट वन रोड” पहल के जरिए वह एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में बंदरगाह, सड़कें, रेलवे और बुनियादी ढाँचे बना रहा है। लेकिन कई देशों में यह “ऋण जाल कूटनीति” साबित हो चुकी है। श्रीलंका का हम्बनटोटा बंदरगाह इसका ज्वलंत उदाहरण है।
दक्षिण चीन सागर में कृत्रिम द्वीप बनाकर चीन अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून की अनदेखी कर रहा है। ताइवान पर दबाव, भारत की सीमा पर घुसपैठ और ऑस्ट्रेलिया, जापान जैसे देशों के साथ तनाव – ये सब चीन की विस्तारवादी महत्वाकांक्षा को दर्शाते हैं।
चीन आर्थिक ताकत को सैन्य ताकत में बदल रहा है। उसका “नो लिमिट्स” पार्टनरशिप रूस के साथ और अमेरिका के साथ व्यापार युद्ध – सब कुछ सत्ता के त्रिकोण को बनाए रखने का हिस्सा है।
पर्दे के पीछे की मिलीभगत
सबसे दिलचस्प यह है कि तीनों महासत्ताएँ सार्वजनिक रूप से विरोध करती हैं लेकिन व्यावहारिक स्तर पर एक-दूसरे को जगह देती हैं।
- रूस-चीन ऊर्जा और सैन्य सहयोग बढ़ाते हैं।
- अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वॉल्यूम अरबों डॉलर का है।
- यूक्रेन युद्ध में भी कुछ देशों के माध्यम से अप्रत्यक्ष व्यापार जारी है।
यह “नियंत्रित विरोध” सत्ता के केंद्र को तीन हिस्सों में बाँटकर स्थिरता बनाए रखता है। यदि कोई एक महाशक्ति बहुत मजबूत हो जाए तो पूरा संतुलन बिगड़ सकता है। इसलिए वे एक-दूसरे को मजबूत होने से रोकते हुए खुद को भी मजबूत बनाते रहते हैं।
लोकतंत्र का मुखौटा और प्रजा का शोषण
आज के चुने हुए या तानाशाही नेता भले ही “जनता की सेवा” और “विकास” की बातें करें, लेकिन वास्तविकता अलग है। युद्ध, सैन्य खर्च और बाहरी दुश्मन गढ़कर वे आंतरिक समस्याओं से ध्यान भटकाते हैं।
अमेरिका में चुनावी फंडिंग बड़े निगमों से आती है। रूस में पुतिन का लंबा शासन और चीन में शी जिनपिंग की असीमित सत्ता – तीनों जगह सत्ता का केंद्रियकरण हो रहा है। प्रजा को राष्ट्रवाद और सुरक्षा का नशा देकर असली मुद्दों (महँगाई, बेरोजगारी, असमानता) पर चर्चा नहीं होने दी जाती।
आम लोगों पर क्या असर?
ये महाशक्तियों के खेल आम नागरिकों की जिंदगी को सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं।
- यूक्रेन युद्ध से वैश्विक खाद्य और ऊर्जा संकट।
- ताइवान तनाव से इलेक्ट्रॉनिक्स और चिप्स की सप्लाई चेन प्रभावित।
- मध्य पूर्व अस्थिरता से पेट्रोल की कीमतें बढ़ती हैं।
हर युद्ध में हजारों निर्दोष मारे जाते हैं, अर्थव्यवस्थाएँ बर्बाद होती हैं और विकास रुक जाता है। फिर भी सत्ता के खिलाड़ी अपने स्वार्थ में लगे रहते हैं।
भविष्य की राह: क्या कोई विकल्प संभव है?
विश्व को इस त्रिकोणीय सत्ता संघर्ष से बाहर निकलने के लिए बहुपक्षीय संस्थाओं को मजबूत करना होगा। संयुक्त राष्ट्र, G20, BRICS जैसे मंचों को सच्चे सहयोग का माध्यम बनाना चाहिए। छोटे और मध्यम देशों को भी अपनी स्वतंत्र आवाज रखनी चाहिए।
भारत जैसे देश इस खेल में संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। “विश्व गुरु” की बजाय “विश्व मित्र” बनने की नीति ज्यादा व्यावहारिक साबित हो सकती है।
अमेरिका, रूस और चीन की महासत्ताएँ सत्ता और संपत्ति के लिए जो खेल खेल रही हैं, वह नया नहीं है। बस खिलाड़ी और हथियार बदले हैं। लोकतंत्र का आवरण ओढ़कर भी वे मध्यकालीन राजाओं वाली मानसिकता से ऊपर नहीं उठ पाए हैं।
जब तक आम जनता जागरूक नहीं होगी और सच्चे वैश्विक सहयोग की माँग नहीं करेगी, तब तक ये खेल जारी रहेगा। इतिहास गवाह है – अंत में हमेशा जनता ही सबसे बड़ी शक्ति होती है।
समय आ गया है कि हम “सत्ता के खेल” को पहचानें और “मानवता की भलाई” को प्राथमिकता दें।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 1 Jul 2026