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Wednesday, 5 August 2026

"50 डिग्री की तपती धूप में खड़े अरबईन के खामोश रक्षक — हश्द अल-शाबी के जवान”

"50 डिग्री की तपती धूप में खड़े अरबईन के खामोश रक्षक — हश्द अल-शाबी के जवान”
-Friday World 6 Aug 2026
की तपिश में ईमान की छाँव: हश्द अल-शाबी के जवान और अरबीन के चुपचाप रक्

जब दुनिया भर से करोड़ों श्रद्धालु अरबीन के मौके पर नजफ़ से कर्बला की ओर निकलते हैं, तो उनके दिलों में एक ही नाम गूँजता है — इमाम हुसैन (अ.स.)। लगभग 80 किलोमीटर लंबा यह रास्ता सिर्फ एक सड़क नहीं, बल्कि आस्था का एक बहता दरिया है। इसमें आँसू, नारे, नंगे पाँव और अटूट विश्वास बहते हैं। लेकिन इस दरिया के किनारे कुछ ऐसे चुपचाप खड़े रक्षक होते हैं, जिनकी ओर शायद ही किसी का ध्यान जाता हो।

फोटोग्राफ में नजर आने वाले ये हश्द अल-शाबी फोर्स के जवान हैं। ये युवा और अनुभवी सिपाही आयतुल्लाह उल-उज्मा सैय्यद अली सिस्तानी की निगरानी और मार्गदर्शन में अपनी जिम्मेदारियाँ निभाते हैं। वही सड़क जिस पर आप नजफ़ से कर्बला तक इत्मीनान से सफर करते हैं, उसी रास्ते पर ये जवान 50 डिग्री से भी ज्यादा की तपिश में खड़े रहते हैं। आग की तरह सुलगते रेगिस्तान में, गर्म हवाओं और जलती रेत के बीच वे डटे रहते हैं। उनका मकसद सिर्फ एक है — अरबीन-ए-इमाम हुसैन (अ.स.) के जायरीन की हिफाजत करना, ताकि कोई बदनीयत निगाह उनकी तरफ उठने की जुर्रत न कर सके।
ये सिर्फ फौजी ड्यूटी नहीं है। ये एक तरह की इबादत है, एक खामोश सेवा। जब लाखों लोग पैदल चल रहे होते हैं — बूढ़े, बच्चे, महिलाएँ, युवा — तब ये जवान धूप में खड़े होकर उनकी सुरक्षा की दीवार बन जाते हैं। सुबह की पहली किरण से लेकर रात की गहरी अँधेरी तक, वे अपने पोस्ट पर डटे रहते हैं। पसीना उनके माथे से बहता है, लेकिन उनकी निगाहें तेज और होश पूरी तरह जागृत रहते हैं।

हश्द अल-शाबी, जिसे पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्सेज भी कहा जाता है, इराक की सुरक्षा व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। आयतुल्लाह सिस्तानी के फतवे और मार्गदर्शन के बाद ये फोर्स बनी और विकसित हुई। उन्होंने न सिर्फ आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ी, बल्कि पवित्र स्थलों और जायरीन की सुरक्षा को भी अपना पहला फर्ज माना। अरबीन के दिनों में नजफ़-कर्बला मार्ग दुनिया के सबसे व्यस्त पैदल रास्तों में से एक बन जाता है। लाखों लोग एक साथ चलते हैं। ऐसे में व्यवस्था बनाए रखना और सुरक्षा सुनिश्चित करना आसान काम नहीं।

गर्मी इतनी तीव्र होती है कि सामान्य व्यक्ति कुछ मिनट भी खुले में खड़े रहने पर बेहाल हो सकता है। लेकिन ये जवान घंटों खड़े रहते हैं। उनके जूते गर्म रेत में धँस जाते हैं, वर्दी पसीने से भीग जाती है, फिर भी वे मुस्कुराते या कम से कम शांत रहते हुए अपनी ड्यूटी निभाते हैं। कई बार वे जायरीन को पानी भी देते हैं, रास्ता बताते हैं या मुश्किल में फँसे लोगों की मदद करते हैं। उनकी उपस्थिति सिर्फ सुरक्षा नहीं, बल्कि भरोसे का एहसास भी देती है।

अरबीन सिर्फ एक याद नहीं है। यह इमाम हुसैन (अ.स.) के बलिदान, उनके संदेश और अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने की याद है। जब करोड़ों लोग “लबbaik या हुसैन” कहते हुए पैदल चलते हैं, तो वे सिर्फ एक जगह पहुँचने नहीं जाते। वे इतिहास को दोहराते हैं, अत्याचार के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा लेते हैं और इंसानियत के सबक सीखते हैं। ऐसे में उन जवानों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है जो इस यात्रा को सुरक्षित बनाते हैं।

बहुत से लोग अरबीन की तस्वीरों में सिर्फ काली झंडियाँ, रोते हुए चेहरे और पैदल चलते कारवाँ देखते हैं। लेकिन उन तस्वीरों के पीछे खड़े ये सुरक्षाकर्मी अक्सर अनदेखे रह जाते हैं। वे न तो कैमरे के सामने आना चाहते हैं, न ही तारीफ के भूखे। वे बस अपना काम करते हैं — आस्था की रक्षा। आयतुल्लाह सिस्तानी की देखरेख में काम करते हुए वे समझते हैं कि यह सेवा सिर्फ देश की नहीं, बल्कि आस्था की भी है।

रेगिस्तान की तपिश में खड़े ये जवान हमें याद दिलाते हैं कि बड़े-बड़े आयोजन सिर्फ श्रद्धा से नहीं चलते। उनके पीछे व्यवस्था, सुरक्षा और बलिदान भी होता है। जब आप नजफ़ से कर्बला की सड़क पर इत्मीनान से चल रहे होते हैं, तो याद रखिए कि किसी जगह पर कोई जवान 50 डिग्री की गर्मी में आपकी सुरक्षा के लिए खड़ा है। उसकी निगाहें चारों तरफ घूम रही हैं, ताकि कोई खतरा आपके करीब न आने पाए।

यह अरबीन का वह रुख है जिसकी तरफ शायद ही लोगों का जहन जाता हो। लेकिन यही रुख यात्रा को संभव और सुरक्षित बनाता है। इन जवानों का खामोश खड़ा रहना भी एक तरह का नारा है — “हम यहाँ हैं, ताकि तुम सुरक्षित पहुँच सको।”

इराक की तपती धरती पर आस्था की यह छाँव इन्हीं रक्षकों की वजह से बनी रहती है। जब जायरीन कर्बला पहुँचकर इमाम हुसैन (अ.स.) की जियारत करते हैं, तो उनका सफर सुरक्षित पूरा होने में इन हश्द अल-शाबी के जवानों का बड़ा हाथ होता है। वे न सिर्फ सीमाओं की रक्षा करते हैं, बल्कि आस्था के कारवाँ की भी हिफाजत करते हैं।

अगली बार जब आप अरबीन की किसी तस्वीर या वीडियो को देखें, तो सिर्फ चलते हुए कारवाँ को ही न देखें। उन खामोश चेहरों को भी देखें जो धूप में खड़े होकर सबकी रक्षा कर रहे हैं। वे अरबीन के असली, अनदेखे नायक हैं।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 6 Aug 2026

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